भैरव चालीसा

चौपाई
जय भैरव! काशीपुर स्वामी!
करतल-सुलभ-सिद्धि! बहुनामी!१
त्रिभुवन-निलय !श्वान-असवारा!!
कलि-मल-संहारक! फणि-हारा!२
कापालिक! दिगवसन! अघोरा!
श्यामल गौर स्वरूप किशोरा!!३

» Read more

भैरव आरती

दोहा
पुर-काशी-वासी! बटुक!, अविनाशी! चख-लाल!
खर्पराशि! सुखराशि! विभु, नाशी भय भ्रम-जाल!!१

भैरव! भयहर! भूतपति!, रुद्र! वेश-विकराल!!
दास जानि करियो दया, व्योमकेश! दिगपाल!!२

भैरव-आरती
आरती! मधुर उचारती, भारती! भैरवनाथ तिहारी!
दुर्धर-रव! खप्पर कर! अभीरव! जय शमशान विहारी!!१[…]

» Read more

काव्य एवं इतिहास का सुभग सुमेल: गजन प्रकास

प्राक्कथन

राजस्थान वीर प्रसविनी धरा के रूप में विश्वविदित है। इसे धारा तीर्थ के धाम के रूप में जाना जाता है। जहाँ शूरमाओं ने केशरिया कर शाका किए वहीं वीरांगनओं ने अपने स्वाभिमान की रक्षार्थ जौहर की अग्नि में स्नान कर अपनी कुलीन परम्पराओं को अक्षुण्ण रखा। यहाँ के वीरों ने मातृभूमि के मान-मंडन व अरियों के दर्प खंडन हेतु रणांगण में वीरगति प्राप्त करने में मरण की सार्थकता मानकर यह घोषित किया कि ”मरणो घर रै मांझियां, जम नरकां ले जाय।[…]

» Read more

कारगिल युद्ध – डॉ. शक्तिदान कविया

।।छंद नाराच।।
लड़े लड़ाक धू धड़ाक जंग पाक जोवता।
किता कजाक व्हे हलाक हाक बाक होवता।।
धुवां धमाक झीकझाक रुद्र डाक रूंसणा।
बज्राक हिन्द जुद्ध वीर धाक शत्रु धूंसणा।।
जी धाक रिम्म धूंसणा[…]

» Read more

श्री हडुमानजी रौ अष्टक – डॉ. शक्तिदान कविया

।।छन्द रोमकंद।।
अतुळीबळ झेल भुजां ब्रिद ऊजळ, सायर लंघ उझेल सची
गजठेल प्रजाळण लंक तणौ गढ़, मारुत नन्दण हेल मची।
नित तेल सिंदूर चढ़ै कपिनायक, भाव अपेल सुं होय भली।
अजरेल जयो हड़ुमांन अणंकळ, बेल करे बजरंग बली।।१[…]

» Read more

श्री हिंगलाज मनावत होरी

मत्तगयंद सवैया
लाल हि चूनर, कोर ‘रु लाल हि लाल हि कंचुकि लाल हि डोरी!
सिंदुर लाल सुबिंदी कपाल , ‘रु लाल हि भाल सुकुंकुम रोरी!
लालमलाल उछाल कियौ नभ भोर रु सांझ समे रंग ढोरी!
थाल अबीर गुलाल लिए कर,श्री हिंगलाज मनावत होरी! १

» Read more

चंडी चालीसा

।।दोहा।।
दुर्गे! दुर्गतिनाशिनी, वासिनी गिरिकैलास!
मंदहास! मृदुभाषिणी!, माॅं! काटौ यमपाश!

।।चौपाई।।
जयति! जयति! जगदंब भवानी!
शिवा! सांभवी! भवा! मृडानी!! १[…]

» Read more

करूं आरती थांरी मां!

।।आरती-सरलार्थ सहित।।

आरतजन अवलंबन अंबा! भुजलंबा! भयहारी! मां!
जय जगदंबा! कृपा कदंबा! सदासुमंगलकारी! मां! १
करूं आरती थांरी मां! (२)
आर्त दु:खी जनों की अवलंबन (सहारा) हे अंबा! भुजलंबा! भय को हरने वाली मां! आप ही कृपा का कदंब वृक्ष हो! आप सदैव सुमंगल करने वाली हो! हे मां मै आपकी आरती करता हूंँ!१![…]

» Read more

तूंकारो कवि ज्यूं तवै

कवि नै शास्त्रां में स्वयंभू अर निरंकुश मान्यो गयो। यानी कवि रो दर्जो ऊंचो मानीज्यो है। आपां राजस्थानी रो काव्य मध्यकाल़ सूं लेयर आज तांई रो, वो काव्य पढ़ां जिणमें नायक रै गुणां-अवगुणां री चर्चा है तो आ बात सोल़ै आना सही है कै कवि नायक नै तूंकारै सूं ई संबोधित कियो है। काव्य रो नायक, भलांई कोई गढपति हुवो कै भलांई गडाल़पति। उण, उणांनै तूंकारै सूं ई संबोधित कियो है। डिंगल़ कवियां तो अठै तक कैयी है कै जे तमाखू में घी रल़ायर चिलम पीवोला तो जैर हुय जावैला अर जे कविता में नायक नै जी सूं संबोधित कर रैया हो तो कविता में दूषण मान्यो जावैला-[…]

» Read more

सूंधाराय रा छंद

।।छंद – त्रिभंगी।।
सूंधै सुरराई ओपत आई, गिर गूंजाई गणणाई।
कीरत कंदराई धर पसराई, संत किताई सरणाई।
करवै कविताई उर उमँगाई, संकट माई काप सबै।
जय जय चामुंडा वैरि विखंडा, फरकत झंडा आभ फबै।।1[…]

» Read more
1 2 3 4 91