एक झूठ को सभी ने बिना पड़ताल सच्च मान लिया

संदर्भचारणों का आउवा धरणा (सत्याग्रह)

जोधपुर के प्रतापी शासक मालदेवजी की महारानी सरूप दे झाली के दो पुत्र हुए। बड़े उदयसिंहजी व छोटे चंद्रसेनजी। महारानी ने उदयसिंहजी की उदंड प्रवृत्ति, अवज्ञाकारी स्वभाव को देखकर अपने छोटे पुत्र चंद्रसेनजी को अपने प्रभाव से उत्तराधिकार घोषित करवाकर सिवाणा की जागीर दिला दी थी।

जब काती सुदि 12 संवत् 1619 को मालदेवजी का देहावसान हुआ उस समय चंद्रसेनजी को सिवाणा से बुलाया गया। उन्होंने आते ही पहले तो अपनी मां सरूप दे के पैर पकड़े और सती होने से रोकते हुए कहा कि- ‘आप हम भाइयों को समझाइश करके जाओ। ताकि मारवाड़ में शांति बनी रहे।’

6 दिन सरूप दे जी पैरों पर बिना जल पिए खड़ी रही। उन्होंने उदयसिंहजी आदि को समझाया और चंद्रसेनजी को राजा बनाया तथा उदयसिंहजी को फलोदी देकर शांत किया। 6 दिन बाद मिगसर बदि 2, 1619 को मंडोवर में जाकर सत किया‌।

यह बात मारवाड़ के परगनां री विगत भाग1 पृष्ठ-66पर लिखी गई है कि-
‘राव मालदेव काऴ कीयौ तद चंद्रसेन सीवाणै हुतो सु काती सुद 13 रै दिन उगतां संवो आयो ‌झाली सरूपदे नुं बेटा बमझावण रै वासतै झाली राखी। नै ऊदैसिंघ नुं फऴोधी दिराय नै मंगसर वदि 2 सरूपदे बऴी, दिन 6 पाणी नहीं पीयो। ‘

राठौड़ां री ख्यात संपादक रघुवीर सिंहजी सीतामऊ, पृष्ठ-102 पर लिखा है कि-
‘राव मालदेवजी संवत् 1619 काती सुद 12 रात रां देवलोक हुवा ने चंद्रसेणजी ने समाचार मेलियो सो सिवाणा सूं सुद 13 रा दिन ऊगां आय ग्या ने झाली सरूपदेजी सत कियो ने चंद्रसेणजी निकऴण दे नहीं। कयो मनै भायां नै समझाय नै जावो। सो दिन छव तांई बहुजी पगां ऊपर ऊभा रया नै सारां कंवरां सरदार आय भेऴा हुवा। तिणां नै झालीजी समझाय नै टीको चंद्रसेणजी नै दिरायो ने झाली मंडोवर जाय मिगसर बद 2 नै बऴिया। ‘

यही बात मुरारिदान की ख्यात में लिखी है। संपादक ने हिंदी अर्थ करते हुए लिखा है कि-
‘राणी सरूपदे झाली जेता झाला की बेटी यह रावजी के साथ जलती सो राव चंद्रसेन ने हीरादे झाली का हाथ डलवाय जलने दी नहीं फिर मीगसर वदि 2 के दिन सती हुई। ‘

इन सभी पुस्तकों में स्पष्ट लिखा है कि मिगसर बदि 2, 1619 को सरूपदेजी ने अपने पति के साथ सत कर लिया-
अब मैं मूल बात पर आ रहा हूं-

लंबे संघर्ष और कष्टसाध्य जीवन में 1637 विक्रम में चंद्रसेन जी का देहावसान हो गया और जोधपुर पर उदयसिंहजी का अधिकार हो गया। ये यहां के राजा बन गए। उदयसिंहजी ने 6वर्ष बाद गोविन्दजी बोगसा का गांव चारणवाड़ा जिसे गोविंद गढ़वाड़ा भी कहा जाता है, जब्त कर लिया। यह गांव जब्त करने की जो कथा हम बचपन से सुनते आ रहें और आउवा धरणा पर पुस्तकें लिखने वाले सभी लेखकों ने उस कथा को उद्धृत किया है। वो संक्षेप में यह है कि चंद्रसेनजी अकबर की सेना से बचने और मुकाबला करने हेतु सुरक्षित स्थानों पर जाते समय चारणवाड़ गांव से निकल रहे थे कि उस समय उनकी मां सरूपदेजी की बैली का एक बैल थक गया। उस रथ को हांकने वाले ने राज मद में चारणवाड़ा के कुए जोता हुआ एक सीरवी का बैल खोल लिया। तब उस सीरवी ने कहा कि- ‘यह गांव चारणों का है और आप यहां से ऐसे बैल नहीं ले जा सकते!’

जब राजा के आदमी माने नहीं तो उसने जाकर गोविन्दजी से पूरी बात बताई। गोविंद जी को सांसण की मर्यादा भंग करने पर क्रोध आ गया और उन्होंने आते ही गाड़ी में जुते हुए बैल को खोल लिया ‌जिससे गाड़ी गिर गई और उसमें बैठी राजमाता सरूपदेजी का हाथ टूट गया। उस समय वे संकट में थे, इसलिए अपमान का घूंट पीकर रह गए। जब उदयसिंहजी राजा बने तो सरूपदेजी ने अपने अपमान का बदला लेने की हिदायत अपने पुत्र उदयसिंहजी को दी। उदयसिंहजी ने अपने आदमी भेजे लेकिन गोविन्दजी ने पहले ही तेलिया कर प्राण दे दिए।

अब प्रश्न उठता है कि उदयसिंहजी जोधपुर के के शासक बने विक्रम संवत 1640 भादवा सुद 15 को। यानी उनके शासक बनने से 21 वर्ष पूर्व ही महारानी सरूपदे इस नश्वर देह को त्याग यश देह धारण कर चुकी थी। चंद्रसेनजी के राजा बनते ही वो इस संसार को छोड़ चुकी थी‌। ऐसे में संकटकाल में वो चंद्रसेनजी के कैसे साथ रही होगी? ऐसे में उनकी बैली से बैल खोलना, उनका हाथ टूटना, एक बुद्धिमान चारण द्वारा उनका असहनीय अपमान करना, चंद्रसेन जी द्वारा उस अपमान को भूल जाना आदि बातें नितांत भ्रामक चल पड़ी। चली भी इस प्रकार से कि ‘आउवा धरणा’ पर लिखने वाले किसी भी विद्वान ने इन बातों पर विचार ही नहीं किया। दूसरों की क्या कहूं? मेरा भी कभी ध्यान इस ओर नहीं गया। मारवाड़ रै परगनां री विगत मैंने बीसियों बार पढ़ी है। उसमें सरूपदे जी का 1619 में सती होना स्पष्ट लिखा है पर मेरा ध्यान नहीं गया। इतिहास व संस्कृति के विज्ञ विद्वान आदरणीय सत्यदेव जी लाल़स ने संयोगवश एक दिन दूरभाष पर हथाई करते हुए यह बात बताई। बाद में मैंने जोधपुर का इतिहास, राठौड़ां री ख्यात, मुरारिदान री ख्यात, उदैभाण चांपावत री ख्यात आदि देखी तो बात समझ में आई कि हम एक सफेद गढ़े गए झूठ का पाप सदियों से हृदय पर ढोते रहें। हथाई में एक अपराधबोध आ ही जाता है कि राजमाता के हाथ तोड़ने में हमारे पूर्वजों की मूर्खता रही और उस कारण ही एक पुत्र ने चारण को दंडित किया तो इसमें अनुचित बात क्या है? लेकिन हमारा ध्यान कभी इस बात की ओर नहीं गया कि जो चारण तमाम विवाहिता क्षत्राणी को जगदंबा सदृश मानता है‌। आपातकाल में क्षत्रियों के सबसे विश्वसनीय साथी व संरक्षक रहें हैं-

सरब कबीला सूंप, भड़ चढ जाता भाखरां।
(ज्यांनै) रखता माता रूप, कवीजण नित सेवा करै।।

इतिहास के असंख्य ज्ञात-अज्ञात पृष्ठों पर चारणों पर स्वामीद्रोह का आरोप नहीं है‌। वे ऐसी भूल कैसे कर सकते हैं कि उनकी नादानी से एक राजमाता का हाथ टूट जाए? ऐसे में राजा कितने ही संकट में क्यों न हो। एक साधारण अपराधी को दंडित करने में उसे कौनसा सेनाबल चाहिए? मानलो उस समय राजमाता और राजा ने उस अपराध को क्षम्य मान लिया तो फिर थूककर चाटने की इस समाज में उस समय परिपाटी नहीं थी‌। अतः दंड देने की तो बात ही नहीं आ सकती।

मैंने जो ख्यातें व पुस्तकें पढ़ी हैं उनमें यही लिखा है कि उदयसिंहजी ने राव राम, कला, करण रामोत के दिए हुए सांसण जब्त किए‌। इस बात का विरोध उस समय के प्रभावी चारण यथा अखाजी, दुरसाजी, शंकरजी आदि ने किया‌। बात धीरे-धीरे विरोध में बढ़ती गई। चारणों ने धरणा दिया जिसे राजपूत सरदारों का भी नैतिक समर्थन मिला। जैसे-जैसे बात आसन्न मृत्यु की उत्पन्न हुई तो स्वार्थी व भीरू लोगों ने धरणा स्थल छोड़ना व धरणे से नैतिक समर्थन वापस लेना अपने हित में समझा। ऐसा नहीं है कि पहली बार किसी शासक ने पूर्ववर्ती शासक के गांव उथापे हो। उदयसिंहजी के पिता मालदेवजी ने भी नागौर के नवाब तारकीन के दिए गांव छीला, घूघरयाऴी, टोंकी आदि आसाजी बारठ से वापस लिए थे। तब आसाजी और इनके छ भाइयों व एक बहन देपू ने मालदेवजी पर गऴे खाई थी। यह बात मारवाड़ रै परगनां री विगत में स्पष्ट लिखी है। जिनको उमादेजी भटियाणी ने अपने समर्पण व सेवा से बचा लिया और अपने पति मालदेवजी को पाप से बचा लिया। गांव यथावत रहे। ऐसे और भी कई उदाहरण हैं।

उस समय गोविंदजी बोगसा ने उदयसिंहजी की इस बात का घोर विरोध किया था। तब उनका भी गांव जब्त कर लिया। इन चारणों को जिन-जिन ने नैतिक समर्थन दिया। उनके गांव जब्त होते गए। विरोध बढ़ता गया‌। असंवेदनशील राजहठ के कारण कितने ही स्वाभिमानी चारणों को अपने प्राण गंवाने पड़े।

उदयसिंहजी की नाराजगी केवल गोविन्दजी से हो ऐसी बात नहीं है। उदयसिंहजी की नाराज़गी अखाजी, शंकरजी लाल़स जुढिया, दुरसाजी आढ़ा आदि तमाम चारणों से थी‌। क्योंकि जब उदयसिंहजी व चंद्रसेनजी के बीच सत्ता संघर्ष चला, उस समय मारवाड़ के प्रभावी चारण चंद्रसेन जी के उत्प्रेरक बने रहे। अखाजी बारठ, दूदाजी आशिया, डूंगरसी रतनू, आशाजी बारठ, दुरसाजी आढा के गीतों की भाषा व भावों में चंद्रसेन जी के प्रति जो आदर था वो अंदर ही अंदर उदयसिंहजी को कचौट रहा था।

विरोध के और भी कारण हो सकते हैं। उन पर अनुसंधान की आवश्यकता है। लेकिन सरूपदेजी झाली का एक चारण की हठधर्मिता से हाथ टूटने की कथा नितांत झूठी है। यह एक कपोल कल्पित व भ्रामक कथा गढ़ी गई ताकि निरपराध सैंकड़ों चारणों के मरने के आरोप में राज व राजा के प्रति झूठी हमदर्दी बटोरी जा सके। इसके लिए किसी एक को दोषी नहीं ठहराया जा सकता‌। क्योंकि इस कथा का इतना प्रचार-प्रसार हुआ जिसमें हम सबने अज्ञानतावश भूमिका निभाई।
उस धरणे के बाद उदयसिंहजी की लोकनिंदा हुई। उन्हें शारीरिक व मानसिक वेदना से गुजरना पड़ा। उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा निरंतर गिरती गई। उन्होंने अपनी पुत्री मानबाई का शाहजादे सलीम के साथ विवाह किया। उसकी पूरे मारवाड़ में निंदा हुई। उनके भतीजे कला रायमलोत ने उग्र विरोध किया। फलस्वरूप उन पर राजाजी ने चढ़ाई की। वहां कलाजी ने साका किया। उनके अनन्य सहयोगी व सेनानायक शंकरजी लाऴस ने अपनी तलवार के तीखे प्रहार से राजाजी के हाथी की सूंड काट दी‌ थी-

शंकरिया सू़डाऴ, हाथाऴी तेजलहरा।
लाऴस व्रन लंकाऴ, गढपत आगे गोदवत।।

यह दुखद घटना भी इसी साल यानी 1643में ही घटी। महाकवि पृथ्वीराज जी राठौड़ लिखते हैं-

तूट छमंछर वरस तिंयाऴै।
वेद पड़्यो धर खेद विचाऴै।
उदोराव दुरंग उथाऴै।
रायमलोत दुरंग रुखाऴै।।

जिसके कारण विजयोपरांत राजाजी ने शंकरजी को देश निकाला दे दिया।

उदयसिंहजी का पूरा शासनकाल अपयश, लोकनिंदा, शारीरिक वेदना, में व्यतीत हुआ। बाद में उन्होंने बोगनयाई के मीसण मोटल को अनुनय विनय करके अपने यहां बुलाया और अपिया तोड़ने और उनके हाथों सांसण लेने हेतु मनाया। मोटल लालच में आकर उनके द्वारा दिया गया स्वर्ण कलश (तांबेड़ा) अपने सिर पर धर कर चला। वर्तमान तांबड़िया गांव में घुसते ही उनके सिर से वो तांबेड़ा गिर पड़ा। राजाजी ने तांबेड़ा के कारण इस गांव का नामकरण कर उन्हें यह तांबड़िया गांव सांसण कर दिया। परगनां री विगत में लिखा है-

‘राजा उदेसिंघजी रो दत्त, मीसण मोटल सारंगोत नुं हिमै महेस मोटलोत छै। चारण बसै कोहर नहीं, बधड़े पीवै। ‘

किंवदंती प्रसिद्ध है कि उस मोटल को कुष्ठरोग हो गया। उसी रोग से ग्रस्त होकर वो मरा। उदयसिंहजी को शारीरिक व मानसिक वेदना में कोई राहत नहीं मिली। लाहौर में बड़ी दुर्गति से उनका देहावसान हुआ।

उदयसिंहजी के अत्याचार के आगे नहीं झुकने वाले सत्याग्रही चारण आज भी लोकरसना पर अमर है। उनकी स्मृति में प्रति वर्ष चैत्र पूर्णिमा को आउवा में स्मृति दिवस मनाया जाता है।

~गिरधर दान रतनू, दासोड़ी

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