उण काल़ नैं दुरकार काढ्यो
आंधियां अटारी
खैंखाट करती
आवती
वैर साजण
मुरधरा सूं
गैंतूल़ लेयर धूड़ रा।
अर धूड़ जिण तो
आंखियां
हर एक री
भर दिया रावड़
दीवी कावड़[…]
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आंधियां अटारी
खैंखाट करती
आवती
वैर साजण
मुरधरा सूं
गैंतूल़ लेयर धूड़ रा।
अर धूड़ जिण तो
आंखियां
हर एक री
भर दिया रावड़
दीवी कावड़[…]
कवि मनमौजी अर कंवल़ै काल़जै रो हुवै। जिण मन जीत लियो कवि उणरो कायल। इण मामलै में वो छोटो कै मोटो नीं देखै। ओ ई कारण है कै वो निरंकुश कहीजै। बुधजी आसिया भांडियावास, कविराजा बांकीदासजी रा भाई पण उणां री ओल़खाण आपरी निकेवल़ी मतलब मनमौजी कवि रै रूप में चावा। एक’र बीमार पड़िया तो दरजी मयाराम उणां रा घणा हीड़ा किया। उणरी सेवा सूं रीझ’र बुधजी ‘दरजी मयाराम री बात‘ लिखी। आ बात राजस्थानी बात साहित्य री उटीपी रचनावां मांय सूं एक।[…]
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–9–
।। ई जल्लै तो मारिया ई है!।।
ठिरड़ै रै एक ठावकै मिनख रो ब्याव मंडियो। उणरै एक बेली हो सो उणरी आदत मसकरी री। उण मिनख अर बेली रै बेलीपो ठावको पण बेली माथै विश्वास पण कम। तोई बात आ कै काणो मांटी सुहावै नीं अर काणो बिनां नींद आवै नीं। जद जान वहीर हुवण लागी जणै बेली आयो अर जान हालण री बात करी जणै वो ठावको मिनख जान ले जावण सूं आ कैय’र नटग्यो कै- “भइया तूं मांझो ब्याव बिगाड़ै पो। इयै कारण तनां जान नीं ले जाऊं।”[…]
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ग़ज़ल – सांई
जीत दो या हार सांई!
है मुझे स्वीकार सांई!
फूल हो या ख़ार सांई!
आप का है प्यार सांई!
आप जाकर दूर बैठे,
सात सागर पार सांई![…]
रजवट रै रुखाल़ै गोपाल़दासजी चांपावत रै वंशजां रो ठिकाणो हरसोल़ाव। इण ठिकाणै में महावीर बलूजी री वंश परंपरा। इण परंपरा नै पाल़णिया कई आंकधारी अर अखाड़ाजीत नर रत्न हुया, जिणां आपरै पुरखां री कीरत आपरी वीरत रै पाण कदीमी कायम राखी।
इणी ठिकाणै रै छुट भाइयां में महाराजा मानस़िहजी री बखत करणसिंहजी चांपावत(सालावास) आपरी आदू रीत अर तरवार सूं प्रीत पाल़णिया राजपूत हुया। […]
राजस्थान रै इतिहास में जोधपुर राव चंद्रसेनजी रो ऊंचो अर निकल़ंक नाम है। अकबर री आंधी सूं अविचल़ हुयां बिनां रजवट रो वट रुखाल़ण में वाल़ां में सिरै नाम है चंद्रसेनजी रो। राष्ट्रकवि दुरसाजी आढा आपरै एक गीत में लिखै कै उण बखत दो आदमी ई ऐड़ा हा जिणां रो मन अकबर रो चाकर बणण सारू नीं डिगियो। एक तो महाराणा प्रताप अर दूजा राव चंद्रसेनजी जोधपुर-
अणदगिया तुरी ऊजल़ा असमर,
चाकर रहण न डिगियो चीत।
सारां हिंदूकार तणै सिर,
पातल नै चंद्रसेण पवीत।।[…]
चौपासणी गांम रतनू गेहराजजी को भीम राठौड़ ने दिया था। इन्हीं गेहराजजी की संतति में आगे चलकर रतनू चांपोजी हुए जो तेमड़ाराय के अनन्य भक्त थे। एकबार वे तेमड़ाराय के दर्शनार्थ जैसलमेर स्थित तेमड़ाराय के थान जा रहे थे। जब निर्जन वन के बीच पहुंचे तो पानी समाप्त हो गया, इन्हें अत्याधिक प्यास लग गई। करे तो क्या करे!! हारे को हरि नाम ! इन्होंने भगवती को याद किया-
चांपो नगर चौपासणी, राजै रतनू राण।
बात ख्यात अर विगत री, जाझी साहित जाण।।1
गढवी गिरवरराय री, धुर उर भगती धार।
दूथी टुरियो दरसणां, करण मनोरथ कार।।2[…]
कौन किसकी बात को किस अर्थ में ले जाएगा
यह समूचा माजरा तो वक्त ही कह पाएगा।
आसमां में भर उड़ानें आज जो इतरा रहे हैं,
वक्त उनको भी धरातल का पता बतलाएगा।
जिंदगी की चाह वाले मौत से डरते नहीं,
कौन कहता है परिंदा आग से डर जाएगा?[…]