हे पंथी! यह संदेश तेजमाल भाटी को कह देना।
आज का संदर्भ-जाओ मोदी को बता देना।
हम पढ़ते, कहते और सुनते भी है कि काश्मीर हमारा भारत का मुकुट मणि है। लेकिन हर दूसरे दिन ऐसी दिल दहलाने वाली घटनाओं के विषय में सुनते और पढ़ते हैं तो लगता नहीं कि कश्मीर हमारा है।
कविराज बद्रीदानजी कविया ने कश्मीर पर कुछ दोहे लिखे तो उनमें से एक यह था कि-
लड़ पंजाबी बंगाल ली, सातूं लीनी सिंध।
काश्मीर लेवण कसै, हार हुई कै जयहिंद।।
कल पहलगाम में दुर्दांत आतंकवादियों ने निर्दोष उन भारतीयों को धर्म का पूछ-पूछकर मारा जो, भारत में स्वर्ग यहीं हैं, के आत्मविश्वास में नरक में उन अधमियो के बीच आ गए थे। जो दया, करुणा, और संवेदना को अपने हृदय से कोसों दूर रखकर केवल बर्बरता व आसुरी वृत्ति की ही शिक्षा लेते हैं। यह ऐसा कौन-सा ग्रंथ पढ़ते हैं, और किस धर्म की शिक्षा लेते हैं? जो अधर्म की तरफ इन्हें ले जाता है।
इस दुखद और निंदनीय घटना में एक आतंकवादी ने कर्नाटक के शिवमोगा की सैलानी पल्लवी के पति की उनके सामने हत्या कर दी। इस हृदयविदारक दृश्य को देखकर पल्लवी ने उस दुर्दांत से कहा कि ‘फिर मुझे भी मार दो। ‘
इस पर उस अधम ने दुस्साहस के साथ कहा कि-जाओ तुझे छोड़ता हूं, तुम यह बात मोदी को जाकर बताओ। ‘
हमारे यशस्वी प्रधानमंत्री तक यह बात तीव्र गति से पहुंच गई। इन आतंकवादियों के साथ क्या होगा, क्या नहीं होगा। इस पर टिप्पणी करने का मुझमें सामर्थ्य नहीं है। लेकिन मैं इस दुस्साहसिक वाक्य के संदर्भ में एक दो बात करूंगा।
मध्यकालीन बात है। जैसलमेर धरा के भाटी रामसिंहजी के एक पुत्र का नाम तेजमालजी था। वे साहसी, निडर, धर्मरक्षक व जीवनमूल्यों को जीने वाले व्यक्ति थे।
एक बार चार चारण सिंध की तरफ से जैसलमेर आ रहे थे। उनमें दो रतनू और दो वरसड़ा जाति के थे। बीच में एक मुस्लिम आतंकवादी रहता था। जिसका नाम हीलो जंत था। उसका इतना भय था कि माएं अपने शिशुओं को सुलाने के लिए उसका नाम हीलो!हीलो! हीलो! कहकर डराकर सुलाया करती थी। आथूणै राजस्थान में तो आज भी यह हीलो! हीलो! लघु लोरी का रूप बन चुका है। खैर
जैसे ही वे चारण हीलो की सरहद में आए। उस दुष्ट ने उनसे धन छीन लिया और मारने के लिए तलवार उठाई। उन चारों ने कहा कि आपने धन खोस लिया है, अब हमारे पास प्राण। अब हमें मारो मत। लेकिन उस निर्दयी ने एक नहीं सुनी और चारों को अपने स्तर पर मोत के घाट उतार दिया। संयोग एक रतनू मरा नहीं, बल्कि मृत्यु और जीवन के बीच संघर्षरत था। तभी उधर से एक घुड़सवार निकलता हुआ उस रतनू को दिखाई दिया। उसने उसे दुहाई देकर एक दोहा सुनाया-
दो चींचा दो वरसड़ा, रणखेतां रहियाह।
पंथी एक संदेसड़ो, तेजल ने कहियाह।।
हे पंथिक! दो चींचा यानी रतनू और दो वरसड़े इस प्रकार रणखेत में मृत्यु को प्राप्त हुए। तूं यह बात जाकर तेजल भाटी को कह देना
पंथिक सतधारी था। वो सीधा तेजमालजी के पास पहुंचा और पूरी बात मांड बताई। उस कुलीन क्षत्रिय के सुनते ही भंवारे तन गए, मूंछें बट आ गई, भुजाएं फड़कने लगी। उन्होंने उसी समय कहा कि मरते हुए मेरे एक आत्मीयजन ने यह कहा तो मैं यह पाग उतार रहा हूं। यह हीले को मारकर ही बांधुंगा। उन्होंने यही किया उस स्वाभिमानी क्षत्रिय ने हीले को ललकार कर मारा और उसका सिर उस रतनू की मां के पांवों में लाकर पटकते हुए कहा कि ‘मैं आपके पुत्र को तो नहीं ला सकता लेकिन उस दुष्ट का सिर आपकी ठोकरों में है। ‘
हमारे प्रधानमंत्री इनके साथ क्या करेंगे ? मुझे इतना ज्ञान नहीं है लेकिन हमारे यहां के नर नाहरों ने अपने प्रति विश्वास को बनाएं रखने हेतु अपने प्राणो की भी परवाह नहीं की।
ऐसा ही एक किस्सा मुझे याद आ गया। जब 1600वि में शेरशाह सूरी ने मारवाड़ पर हमला किया और गिररी-सुमेल के मैदान में दोनों सेनाओं के डेरे हुए। उस समय मालदेवजी सरदारों के धोखे की अफवाह से मैदान छोड़कर जोधपुर रवाना हो गए। उस सेना के यशस्वी सेनानायक कूंपा-जेता द्वंद्व की स्थिति में गिररी गांव के कुएं पर अपने घोड़ो को पानी पिलाने रुके। उन्होंने देखा की गांव की किशोरियां मुसलमानों के भय से उन्मुक्त होकर पानी भर रही है। तब उन्होंने कहा कि ‘बायां सूरी की सेना आई हुई। विधर्मी लोग हैं आपके साथ कोई भी ऊंच नीच हो सकती है। फिर भी इतनी भयमुक्त होकर खुले में पानी भर रही हो?’तब उन बालाओं ने सहजता से कहा-‘क्या आप बता सकते हैं कि जेतो-कूंपा मरग्या कै जीवता है? अगर वे जीवित है तो फिर डर किस बात का?’
उन्होंने देखा कि जो बालाएं हमें जानती नहीं, फिर भी हमारे प्रति इतना जन विश्वास! तब उन महावीरों ने मैदान छोड़ने का मानस त्याग देश व महिला सम्मान हेतु मरना श्रेयष्कर समझा-
गिररी थारै गौरवैं, लंबी बधी खजूर।
जेतै कूंपो आखियोइ, स्रग (स्वर्ग) नैड़ो घर दूर।।
फिर उनकी वीरता से भयभीत भीरू शेरशाह ने जो कहा वो इतिहास में अमर है।
इतिहास में सांवतसी झोकाई, अमरसिंहजी बीकानेर, ईसर मोयल मीठड़ी जैसे अनेक महावीरों के गौरवशाली किस्से गुंफित है। बात लंबी हो जाएगी। इसलिए एक अंतिम बात लिख रहा हूं।
जनता में राज का विश्वास होना चाहिए। अगर राजा पर जन विश्वास डगमगा जाता है तो फिर कहने को कुछ बचता ही नहीं है।
राजा पर जन विश्वास की अंतिम बात।
जैसलमेर पर महारावल जवाहर सिंहजी का राज था। एक दिन वे भेष बदलकर गांवों की तरफ अकेले निकले। उन्होंने देखा कि एक मुस्लिम बाला जो छक जवानी में होने के साथ अनद्य सुंदर भी थी। जंगल में अकेली बेफिक्री से अपने गंतव्य की तरफ बढ़ रही थी। महारावलजी ने घोड़े के ऐड़ी देते हुए उनके पास पहुंचे और पूछा कि-‘बाई!थूं इण रिंधरोही में एकली!थनै किणी रो डर नीं लागै?तब उस बाला उसी बेफिक्री से अपना एक हाथ पसारते हुए कहा कि ‘भइया!जंवारै काकै रै पग मी जूत इतरो लंबो आवैं। पछै डर की बात रो?
जवाहर सिंहजी ने कहा कि-‘व्हाला! थारो ज्वारों काको तो जैसलमेर में है, अर थूं ऐथ रोही में, तो जूत की काम रो?’
उस तरूणी ने उसी उन्मुक्त भाव से कहा कि-‘म्हनै डराणियो जाए किथ? उवै नां कितीक भां दीसै? ‘ज्वारो काको उवै नै कुएं मीं ई छड्डै!’
इतना सुनते ही महारावल प्रसन्न भाव से आगे निकल गए।
यह होत है राज के प्रति विश्वास।
काश; हमारे संवेदनशील प्रधानमंत्री इन देशद्रोहियों व आतंकवादियों में इतना डर भरदे कि वे नींद में भी झिझक पड़ै-
माई ऐड़ा पूत जण, जैड़ा राण प्रताप।
अकबर सूतो ओझकै, जाण सिराणै सांप।।
मैंने महावीर तेजमालजी भाटी पर काफी पहले एक गीत लिखा था। आज प्रसंगवश पुनः साझा कर रहा हूं
गीत भाटी तेजमालजी रांमसिंहोत रो–
इमां अथग आतंक रो घालियो अवन पर,
चहुवल़ घोर अनियाव चीलो।
बहता जातरू घरां में बाल़पण,
हियै सुण बीहता नांम हीलो।।1
असुर उण हीलियै बीहाया अनेकां,
कितां नै लूंटिया सीस कूटै।
घणां रा खोसनै मार पण गीगला,
लखां नै उजाड़्या लियै लूंटै।।2
पथिकां सतातो राह में पापियो,
गरीबां मारतो जवन घाती।
हीलै रै नांम सूं दिसा हर हेक में,
जांणजो धूजती सरब जाती।।3
माड़ रा पात दोइ दो मुरधर तणा,
रतनू अनै वरसड़ा वाट राजी।
बहता आपरै घरां दिस विलमता,
पमंग चढ घेरिया आय पाजी।।4
माल सब छीन नै मार पण नांखिया,
ईहग धर बापड़ा अर्ध चेतै।
मोत सूं जूंझता माग पण हेरता,
आवियो पथिक इक वाट ऐतै।।5
पथिक नै संदेशो पठायो पुकारां,
चारण रतनू अनै गोत चींचा।
हीलियै निखूना घेरनै हेतवां,
काढिया अमां रा तुरक कींचा।।6
तेज रांमेण रो तपै तपधारियो,
माड में एक माड़ेच मांटी।
उवै नै जाय नै कहजै ऐहड़ी,
वीदगां मरंता विपद वांटी।।7
संदेशो पातवां तणो सतधारियै,
तेज नै दियो खड़ तुरंग तातै।
भंवारां तणी नै तणी गी भ्रगुटी,
रोस सूं अंखियां हुई रातै।।8
मरण रो सोच नह कियो तिल मात ही,
लेस पण बीह नह रिदै लायो।
उग्राहण वैर नै चितारी ऊंडपण,
अंग में उफणतो जोस आयो।।9
जीण कस पमंग री लेय झटसारियां,
मरण मनधारियां बुवो मांटी।
परापर प्रीत नै प्राथमी पोखवा,
अरी रै जाय दी घरै आंटी।।10
हेक ही घाव सूं मारियो हीलियो,
सीस पण काट नै लियो साथै।
सूंपियो ईहगां आयनै सूरमै,
हेत सूं अमर आ भेंट हाथै।।11
वाह रै तेज रांमेण रा वीरवर,
भोम पर वाह नित कोम भाटी।
वाल़ियो वैर तैं रतनुवां वडमपण,
खरै पण कीरती खाग खाटी।।12
धिनोधिन करमेती हुई उ धरण पर,
जांमणी तूझ सो पूत जायो।
जगत में दिखाई वीरता जेहड़ी,
ऐहड़ी गल्लां सुण अंजस आयो।।13
चाढियो सूरमै नीर पख च्यार ही,
रीत रजवाट री गुमर राखी।
सनातन प्रीत रो प्रागवड़ सूकतो,
सींचियो हेत रै सुजल़ साखी।।14
रंग रजपूत तो तेज रांमेण रा,
जगत में रंग तो जबर जाती।
गीधियो कहै कव निभायो घरूपो,
वीरता दीपसी अमर बाती।।15
~~गिरधरदान रतनू दासोड़ी
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