सूर्यमल्ल जी मीसण रा मरसिया – रामनाथ जी कविया

मिल़तां काशी माँह, कवि पिंडत शोभा करी।
चरचा देवां चाह, सुरग बुलायौ सूजडौ।।१।।

निज छलती गुण नाव, मीसण छौ खेवट मुदै।
अब के हलण उपाव, सुकवी भरतां सूजडौ।।२।।

करता ग्रब कविराज, मीसण नित थारौ मनां।
सुरसत दुचित समाज, सुकवी मरतां सूजडौ।।३।।[…]

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स्वामी गणेशपुरी कृत सूर्यमल्ल स्तुति

।।भाषा गुरु मिश्रण चारण सूर्यमल्ल स्तुति।।
।।मनोहर छंद।।
मित्र सनमान, सत्यवान, स्वर ज्ञान मध्य,
इक्क न समान, कहौं का सम करेरो में?।।
प्राकृत, पिसाची, सौरसेनि, अपभ्रंस पूर्न,
होसु हैं न, ह्वैं न हर हायन लौं हेरो मैं।।
देख्यो मुहि दीन विद्या दीन्ह त्यौं विवेक दीन्ह,
दिग्घ बर दीन्ह, घन आनंद को घेरो मैं।।
बारन बदन बर चारन बरन बीच,
तारन तरन रविमल्ल चर्न चेरो मैं।। […]

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दुव सेन उदग्गन – वंश भास्कर

।।छंद दुर्मिला।।
दुव सेन उदग्गन खग्ग समग्गन अग्ग तुरग्गन बग्ग लई।
मचि रंग उतंगन दंग मतंगन सज्जि रनंगन जंग जई।।१।।
लगि कंप लजाकन भीरु भजाकन बाक कजाकन हाक बढी।
जिम मेह ससंबर यों लगि अंबर चंड अडंबर खेहू चढी।।२।।

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महादेव स्तुति – महाकवि सूर्यमल्ल मीसण (वंश भास्कर)

जय जय महेस संकर जडाल, कन्दर्ब जलंधर त्रिपुर काल।
गंगाकिरीट जय जय गिरीस, अजएक महानट अखिल ईस।।
रचनाप्ररोह जय संभु रूद्र, सिव जय अनादी करुणासमुद्र।
दुरितादिदलन जय बामदेव, दिवपट जय परिजितकामदेव।।
जय गरलकंठ विभु गहन जोग, भव भर्ग्ग भीम जय त्यक्तभोग।
लय सर्ग चरित जय उर्द्धलिंग, प्रभु जय मित्रीकृत एक पिंग।।[…]

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ऐसा छोड़ने वाला नहीं मिलेगा

महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण जितने महान कवि थे उतना ही तेज उनका मिजाज था, झट से बिगड़ जाता था। राजकुमार भीमसिंह की बारात में बांसवाडा गए वहां बूंदी के आमात्य बोहरा रतनलाल की किसी बात पर नाराज़ हो गए और तुरंत वहां से प्रस्थान  का मन बनाया। राजा रामसिंह ने मना किया मगर रूठ कर रवाना हो गए। जब रास्ते में रतलाम के राजा बलवंत सिंह ने यह सुना कि सूर्यमल्ल लौट रहे हैं तो उन्होंने पांच मील की दूरी तक सामने आकर महाकवि की अगुवाई की। मीसण को पुरी मान मनोव्वल के साथ राजा रतलाम लाये और बड़े सत्कारपूर्वक अपने […]

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