अपसूंण – चंद्रप्रकास देवल

सईकां लांबी
उण धा काळी रात रै सूटापै
सैचन्नण चांनणै
नाचण रै कोड सूं पग मांडिया ई हा
मादळ रओ आटौ थेपड़ियौ हौ आलौ कर
थाळी सारू डाकौ सोध्यौ हौ
के चांणचक म्हे-
आजादी रै मंगळ परभात
अमंगळ व्हैग्यौ ।

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आ राजस्थानी भासा है – शक्तिदान कविया

इणरौ इतिहास अनूठो है, इण मांय मुलक री आसा है ।
चहूंकूंटां चावी नै ठावी, आ राजस्थानी भासा है ।

जद ही भारत में सताजोग, आफ़त री आंधी आई ही ।
बगतर री कड़ियां बड़की ही, जद सिन्धू राग सुणाई ही ।
गड़गड़िया तोपां रा गोळा, भालां री अणियां भळकी ही ।
जोधारां धारां जुड़तां ही, खाळां रातम्बर खळकी ही ।
रड़वड़ता माथा रणखेतां, अड़वड़ता घोड़ा ऊलळता । […]

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श्री सुरेन्द्र सिंह रत्नू

सुरेन्द्र सिंह रत्नू पुत्र श्री हिंगलाज सिंह जी रत्नू प्रपोत्र श्री गंगा सिंह जी रत्नू गाँव जिलिया चारणवास (ज़िला नागोर) का जन्म २२ अक्टूबर १९५१ को गाँव सेवापुरा में हुआ। स्टैट बैंक ओफ़ बीकानेर एण्ड जयपुर में मैनेजर के पद से रिटायर सुरेन्द्र सिंह जी ने श्री बांगड कॉलेज डीडवाना से साइंस मेथ्स में स्नातक किया तथा इंडियन इंस्टीट्यूट ओफ़ बेंकर्स, मुंबई से C.A.I.I.B. करने के अतिरिक्त कम्प्यूटर की शिक्षा भी प्राप्त की। संगीत का शोक आपको शुरू से ही था। आपने गायकी में भातखंडे संगीत विद्यापीठ, लखनऊ से तीन वर्ष का डिप्लोमा भी किया। चिरजा गायन में आप एक […]

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स्वाभिमानी कवि नरुजी बारहट का आत्म बलिदान

दिल्ली पर बादशाह ओरंगजेब का राज था।  औरंगजेब बहुत ही कट्टर शासक हुआ।  जिसके राज्य में हज़ारों मंदिरों को तोड़ कर मस्जिदों में बदल दिया गया। इससे भी संतुष्टि नहीं हुई तो औरंगजेब ने विक्रम संवत 1736 की वैशाख सुदी द्वितीया (2 अप्रैल 1679) को एक फरमान जारी कर के हिन्दुओ पर जजिया नामक कर लगा दिया। वह कर बड़ी ही कठोरता से वसूल किया जाने लगा,  जिसके फलस्वरूप अन्दर ही अन्दर हिन्दू प्रजा में इसके विरोध में आग सुलगने लगी, पर खुले रूप में इसका विरोध करने का साहस किसी ने नही किया।  इस विकट परिस्थिति में महाराणा राजसिंह प्रथम ने पहल करते हुए जजिया के विरोध में एक पत्र […]

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जब ठाकुर साहब ने की कविराज की चाकरी

संवत १७४० के आसपास मेवाड़ के सूळवाड़ा नामक गांव में चारण जाति के कविया गोत्र में कवि करणीदान जी का जन्म हुआ वे राजस्थान की डिंगल भाषा के महाकवि तो थे ही साथ ही पिंगल, संस्कृत व ब्रज भाषा के भी विद्वान थे इन भाषाओँ में उन्होंने कई ग्रन्थ लिखे। उनके लिखे “सुजस प्रकास” व “बिडद सिणगार” ग्रन्थ बहुत ख्यात हुए। उस जमाने में लोगों के जातिय ढोंग व आचरण देख उन्होंने “जतोरासो” नामक ग्रन्थ लिखा जिसमे समाज के ऊपर तीखे कटाक्ष थे, पर एक साधू के कहने पर वो ग्रन्थ उन्होंने खुद ही जला डाला। उस वक्त की राजनीती […]

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निर्भीक कवि और शक्तिशाली सर प्रताप

सर प्रतापसिंह जी जोधपुर के महाराजा तख़्तसिंह जी के छोटे पुत्र थे, वे जोधपुर के राजा तो नहीं बने पर जोधपुर राज्य में हुक्म, प्रतिष्ठा और रोबदाब में उनसे आगे कोई नहीं था। उनके जिन्दा रहते जोधपुर के जितने राजा हुए वे नाम मात्र ही थे असली राज्य सञ्चालन तो सर प्रताप ही करते थे थे वे जसवंतसिंह जी से लेकर महाराजा उम्मेदसिंह जी तक जोधपुर के चार राजाओं के संरक्षक रहे। जर्मनी के युद्ध में उन्हें अदम्य वीरता दिखा बहुत नाम कमाया था। सर प्रताप खुद अनपढ़ थे पर मारवाड़ राज्य में उन्होंने शिक्षा व समाज सुधर के लिए […]

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जब कवि ने शौर्य दिखाया

जोधपुर के महाराजा मानसिंह का कव्यानुराग, विद्याप्रेम, कलाप्रियता, दानशीलता, गुणग्राहकता, गुरुभक्ति, स्वतान्त्र्यप्रेम के साथ शासक के तौर पर कठोर दंड व्यवस्था में निर्दयी दंडात्मक विधियाँ लोकमानस में आज भी जनश्रुतियों के रूप में काफी लोकप्रिय व प्रचलित है। उनके आचरण के दोनों रूप – पहला प्रतिकारी हिसंक रूप और दूसरा प्रशंसा और आभार प्रदर्शन का रूप “रीझ और खीझ” नाम से प्रसिद्ध है। “रीझ” मतलब खुश होना जिस पर प्रसन्न हो गए उनको आकाश में बिठा देना और “खीझ” मतलब नाराजगी, जिससे नाराज हो गए उसका अस्तित्व ही मिटा डालते। उनके इसी रीझ व खीझ वाले स्वभाव को एक चारण […]

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निर्भीक कवि वीरदास चारण (रंगरेलो) और उनकी रचना “जेसलमेर रो जस”

राजस्थान में राजपूत शासन काल में चारण जाति के एक से बढ़कर एक कवि हुए है, इन चारण कवियों व उनकी प्रतिभा को राजपूत राजाओं ने पूर्ण सम्मान व संरक्षण दिया। पर ज्यादातर लोग इन कवियों द्वारा राजाओं के शौर्य व उनकी शान में कविताएँ बनाने को उनकी चापलूसी मानते है पर ऐसा नहीं था इन कवियों को बोलने की राजपूत राजाओं ने पूरी आजादी दे रखी थी, ये कवि जैसा देखते थे वैसा ही अपनी कविता के माध्यम से बिना किसी डर के निर्भीकता से अभिव्यक्त कर देते थे, यही नहीं कई मौकों पर ये कवि राजा को किसी […]

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हरिरस (भक्त कवि महात्मा ईसरदास प्रणीत)

।।मंगलाचरण।।
पहलो नाम प्रमेश रो जिण जग मंड्यो जोय !
नर मूरख समझे नहीं, हरी करे सो होय।।१

!! छंद गाथा !!
ऐळेंही हरि नाम, जाण अजाण जपे जे जिव्हा !
शास्त्र वेद पुराण, सर्व महीं त‍त् अक्षर सारम्।।२

!! छंद अनुष्टुप !!
केशव: क्लेशनाशाय्, दु:ख नाशाय माधव !
नृहरि: पापनाशाय, मोक्षदाता जनार्दनः।।३[…]

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देवियांण (भक्त कवि महात्मा ईसरदास प्रणीत)

( छंद अडल )
करता हरता श्रीं ह्रींकारी, काली कालरयण कौमारी
ससिसेखरा सिधेसर नारी, जग नीमवण जयो जडधारी….१
धवा धवळगर धव धू धवळा, क्रसना कुबजा कचत्री कमळा
चलाचला चामुंडा चपला, विकटा विकट भू बाला विमला….२
सुभगा सिवा जया श्री अम्बा, परिया परंपार पालम्बा
पिसाचणि साकणि प्रतिबम्बा, अथ आराधिजे अवलंबा….३[…]

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