असही सही न जाय!

एक जमानो हो जद लोग चीकणी रोटी जीमता पण चीकणी बात करण सूं परहेज राखता। हर भजण अर हक बोलण में विश्वास राखता। अजोगती बात करणियो कोई धंतरसिंह क्यूं नीं हुवै, उणनै ई साच कैवता नीं संकीजता। आज जद आपां हर नाजोगी बात देख’र अथवा सुण’र बेहिचक कैय देवां कै – “बल़णदे नीं आपांरो कांई लेवै या आपां क्यूं किणी सूं बिनां लाभ खरगसो बांधां।”[…]

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डूंगरां ऊपरै छांह डाकी

कविवर नाथूसिंहजी महियारिया सही ई लिख्यो है कै भगती अर वीरता वंशानुगत नीं हुय’र फखत करै जिणरी हुवै-

जो करसी जिणरी हुसी, आसी बिन नूंतीह।
आ नह किणरै बापरी, भगती रजपूतीह।।

क्यूंकै फखत शस्त्र धारण सूं सूर अर गैणो पैरण सूं कोई हूर नीं हुवै-

भेख लियां सूं भगत नीं, होय न गैणै हूर।
पोथी सूं पंडित नहीं, नहीं शस्त्र सूं सूर।।[…]

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सूरां मरण सांम ध्रम साटै!!

राजस्थान रै मध्यकाल़ीन इतियास नै निष्पक्ष भाव सूं देखण अर पुर्नलेखन री दरकार है। क्यूंकै आज जिणगत युवापीढी में जीवणमूल्यां रै पेटे उदासीनता वापर रैयी है वा कोई शुभ संकेत री प्रतीक नीं है।
उण बखत लोग अभाव में हा पण एकदूजै सूं भाव अर लगाव अणमापै रो राखता। ओ वो बखत हो जद स्वामीभक्ति अर देशभक्ति एक दूजै रा पूरक गिणीजता हा। जिणांरै रगत में स्वामीभक्ति रैयी उणांरै ईज रगत में देशभक्ति रैयी। भलांई आपां आज इण बात नै थोड़ी संकीर्ण मानतां थकां व्यक्तिवाद नै पोखण वाल़ी कैय सकां पण आ बात तो मानणी ईज पड़सी कै उण मिनखां में त्याग, समर्पण, अर मरण नै सुधारण री अद्भुत ललक ही। इणी ललक रै पाण उवै आज ई खलक में आदरीजै।[…]

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वां संतां थांनै आदेस!

आपां केई बार पढां कै सुणां हां कै ‘जात सभाव न मुच्यते’ यानी जात रो स्वभाव कदै ई जावै नीं। इणनै ई ‘तुखम तासीर’ कैवै।

ऐड़ा घणा ई दाखला लोक री जीभ माथै मिलै जिणसूं ई बात री पुष्टि हुवै कै मिनख भलांई कैड़ी ई परिस्थितियां में रैवो पण अवसर आयां आपरी जात रो रंग अवस बतासी। ऐड़ो ई एक किस्सो है। संत हीरादास अर उणांरै चेले दामोदरदास रो।[…]

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कांई धरती माथै अजै राठौड़ है?

एक बारोटियो नाहरखान हो। किण जातरो राजपूत हो ओ तो ध्यान नीं पण हो राजपूत। उवो आपरै लाव-लसकर साथै सिंध रै इलाके में धाड़ा करतो अर मौज माणतो। इणी दिनां मेवाड़ सूं आय एक रामसिंह मेड़तियो ई इणरै दल़ में भेल़ो हुयो।रामसिंह मन रो मोटो अर साहस रो पूतलो। डील रो डारण अर खाग रो धणी हो सो नाहरखान इणनै धाड़ै में मिनखां दीठ पांती दैणी तय कर राखियो।[…]

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भगू पारस भेट

यूं तो साख (रिश्ता, रक्त-संबंध) सोनो अर प्रीत पीतल़ मानीजै। इण विषय में ओ कैताणो चावो है- ‘साख सोनो अर प्रीत पीतल़।’ आ ई बात देवकरणजी बारठ ईंदोकली आपरी रचना ‘साख-प्रीत समादा’ में कैयी है–

साख कहै सुण प्रीत सयाणी,
लड़तां थनै न आवै लाज।
सोनो साख प्रीत पीतल सुण,
इल़ पर चलै कहावत आज।।

साख रो ओ ओल़भो सुण’र प्रीत जिको पड़ुत्तर दियो उवै उल्लेखणजोग है-[…]

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पारख पहचाणीह !

मध्यकाल़ीन राजस्थान रो इतियास पढां तो कदै कदै ई आपांनै लागै कै केई वीरां अर त्यागी मिनखां साथै न्याय नीं हुयो। इण कड़ी में आपां मारवाड़ रो इतियास पढां तो महाराजा जसवंतसिंहजी प्रथम रो जद देवलोक हुयो अर उणांरै कुंवर अजीतसिंहजी नै क्रूर ओरंगजेब सूं बचावण अर दिल्ली सूं बारै सुरक्षित काढण री नौबत आई। उण बखत उठै कनफाड़ै जोगी रो रूप धार आपरी छाबड़ी में छिपाय अजीतसिंहजी नै छानै-मानै काढणियै जिण मिनखां रा नाम आपांरै साम्हीं आवै उणांमें एक नाम है मनोहरदास खीची अर दूजो नाम है मनोहरदास नांधू।[…]

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हाथ वीजा को पकड़जो!

मध्यकाल़ रो इतियास पढां तो एक बात साव चड़ूड़ निगै आवै कै उण बखत रा लोग आपरै सिंद्धांतां माथै जीवता अर मरता। जिणरो अन्नजल़ करता उणरै सारू आपरो माथो हथेल़ी में हाजर राखता। यूं तो उण समय स्वामीभक्ति अर स्वाभिमान ऐ दो ऐड़ा जीवणमूल्य हा जिणांनै लगैटगै सगल़ा मिनख कायम राखता पण जद आपां इण विषय रा चारणां सूं संबंधित दाखला पढां तो आपांनै लागै कै स्वामिभक्ति अर चारण एक दूजै रा पर्याय हा। ओ ई कारण हो कै मारवाड़ रा धणी मानसिंहजी निशंक कह्यो हो कै-

‘स्वामिभक्त सत्यवक्ता रू वचनसिद्ध।’[…]

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सूरां मरण तणो की सोच?

राजस्थान नै रणबंकां रो देश कैवै तो इणमें कोई इचरज जैड़ी बात नीं है। अठै एक सूं बध’र एक सूरमा हुया जिणां आपरी आण बाण रै सारू मरण तेवड़ियो पण तणियोड़ी मूंछ नीची नीं हुवण दी। वै जाणता कै एक दिन तो इण धरती सूं जावणो ई है तो पछै लारै सुजस ई राख’र जावां कुजस क्यूं?

ओ ई कारण हो कै अठै नरां धरम, धरती अर स्त्री रै माण सारू आपरी देह कुरबान करती बखत मन चल़-विचल़ नीं करता बल्कि गुमेज रो विषय मानता-

ध्रम जातां धर पल़टतां, त्रिया पड़ंतां ताव।
तीन दिहाड़ा मरण रा, कहा रंक कहा राव।।[…]

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अबखी करी अजीत!

किणी राजस्थानी कवि कह्यो है कै बात भूंडी है कै भली, ओ निर्णय फखत विधाता रै हाथ है पण जैड़ी सुणी वैड़ी कवि नै तो कैवणी पड़ै-

भूंडी हो अथवा भली, है विधना रै हाथ।
कवि नै तो कहणी पड़ै, सुणी जिसी सह बात।।

अर्थात असली कवि वो ईज है जिको पखापखी बिनां निपखी बात कैवै। ऐड़ा ई एक निडर कवि हुया भभूतदानजी सूंघा (कैर)।[…]

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