लख नव लोवडियाळ
जद आवड जी महाराज री मन में कल्पना आवै तद मन कृष्ण रे विराट रूप ज्यू उण री कल्पना करे अर एक अनंत चितराम खडो हुवै। मां नें आपे विराट वपु धारणी चारणी जगतारणी कह सकां। उणमें छपन क्रोड चामुंड नव लख लोवडियाळ अर चौरासी चारणी रो एकीकृत अवतार समझ सकां। गर छपन क्रोड नवलाख अर चौरासी वपु धारणी आवड मां आप रा उतरा मुख सूं मां सुभाषीष देवै। उणसूं दुगणी आंख सूं पुरा जगत रा चराचर जीव ने देख सके।उण सूं बीस गुणा हाथ (बीस हथी) सूं सबने आसीस दे सके अर उण री सब आंगळी सूं जगत रा […]
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