बूडत है भवसिंधु में बेरो
(जगडू साह का करुण क्रंदन)
(कवि नरपत का आत्म निवेदन)
।।दोहा।।
दीन अकिंचन दास का, एक आसरा मात!
श्री करनी करूणामयी, विपदाहर विख्यात!!।।१।।
दीसत कोउ न राह माँ!, चहुँदिस वारि अथाह!
बाँह ग्रहो तुम बीसहथ!, कूकै जगडू साह!!2
फस्यौ भवोदधि के भँवर, जिम गज ग्रहियो ग्राह!
बेगि बचावहु बीसहथ!, संकट में है साह!!।।3।।
साहन की तुम साह माँ!, जंगल धर पतसाह!
बीसहथी! लाजै बिरद, रिधू! दिखावौ राह!।।4।।
तरणी भव जल बीच में, उतरै किहि विध पार!
करनी!अशरण की शरण!, बनना खेवन हार!5
रहे खिवैया रात दिन, मैया करनी मिंत!
नैया पार लगावनी, भैया रह निश्चिंत!!।।6।।
।।मत्तगयंद सवैया।।
कोंधत बीजु अकास भयंकर, आज अमावस रैन अँधेरो!
घोर घटा नभ में गरजै, जनु बाजत जुद्ध नगारन ढेरो!
डोलत है जलपोत, उठै जल-वीचि, ज्यूँ शृंग उतुंग घनेरो!
अंब! करूं अरदास उबारहु, बूडत है भवसिंधु में बेरो!!
श्री करनी! हर संकट मेरो।।1।।
छाँड़ि के गाँव, पिता-परिवार, सुता-सुत, नार, कुटुम्ब, बसेरो!
पंथ गह्यौ परदेस को, लक्ष करोड़ कमावन हौं बहुतेरो!
बीच प्रभंजन आनि फँस्यौ, यम-पाश की फाँस माँ त्रास निबेरो!
अंब! करुँ अरदास उबारहु, बूडत है भवसिंधु में बेरो!!
श्री करनी! हर संकट मेरो।।2।।
तूट गई पतवार, ‘रु हिम्मत हार गयो, जननी! अब हेरो!
रोवत केवट, दूर घनो तट, संकट में जलपोत है मेरो!
दीपक आस को मात बुझै नहि, साह को है दृढ-संबल तेरो!
अंब करूँ अरदास उबारहु, बूडत है भव सिंधु में बेरो!!
श्री करनी हर संकट मेरो!3
मूसलधार झरै नभ ते जल, भीम प्रभंजन देत थपेरो!
ना ध्रुव तारक व्योम में दीसत, घोर अँधेर, न होत सवेरो!
दीपक-थंभ दिखात न दूर लों, पंथ प्रदर्शक कोउ न मेरो!
अंब करुँ अरदास उबारहु, बूडत है भवसिंधु में बेरो!
श्री करनी हर संकट मेरो!!4
पोत पे चोट करे यूँ प्रभंजन, एरन ज्यूँ घन देत ठठेरो!
वीचि के व्याल उठाए महाफन, दंश समुद्धत है चहुँफेरो!
काल-बिडाल खड़ौ कर घात, कपोत ज्यूँ क्रंदत है मन मेरो!
अंब करूँ अरदास उबारहु, बूडत है भवसिंधु में बेरो!
श्री करनी हर संकट मेरो!5
साह की आह सुनो जननी! लखि कोटि गुनाह, न माँ!मुख फेरो!
राह न सूझत, बाँह ग्रहो, परवाह करो, हर संकट मेरो!
पुत्र कुपुत्र कहावत हों, तउ मात सनेह करे बहुतेरो!!
अंब करूँ अरदास उबारहु, बूडत है भव सिंधु में बेरो!
श्री करनी हर संकट मेरो!!6
दीसत कोउ न देव मुझै, जिह के ढिग जा, अपनो दु:ख टेरो!
काल अथाह या सागर बीच में, रोकि के राह खडौ ज्यूं लुटेरो!
बाँह पसारि बचावहु मातु, मुझे अवलंबन केवल तेरो!
अंब करूँ अरदास उबारहु!, बूडत है भव सिंधु में बेरो!
श्री करनी हर संकट मेरो!!7
म्है मतिमंद महाशठ मूरख, लालच लोभ को म्हौ मन डेरो!
द्वंद्व को फंद, ‘रु मोह बवंडर, आजु कियौ उर भीतर घेरो!
मैं भवसागर बीच फस्यौ, झट पार लगाहु करो तट नेरो!
अंब करूँ अरदास उबारहु, बूडत है भवसिंधु में बेरो!
श्री करनी हर संकट मेरो!!8
धारि कृपान, ह्वै सिंह सवार, चढो मम वार, करो पगफेरो!
संकट की निशि बेगि समेटहु, शीघ्र करो भुजलंब! सवेरो!
मैं भ्रम-जाल सरोज बंध्यौ अलि! मात छुडावहु बंधन मेरो!
अंब करूँ अरदास उबारहु, बूडत है भव सिंधु में बेरो!
श्री करनी हर संकट मेरो!!9
।।फलश्रुति।।
तूलि तरंग को संग लिए “नरपत्त” भयो है कवि तें चितेरो!
मत्तगयंद ‘मनोहर छंद में, साह-प्रबंध-चरित्त उकेरो!
माँ! अवलोकि ये चित्र-कवित्त मेरे मन में शुभ रंग बिखेरो!!
अंब करूँ अरदास उबारहु, बूडत है भवसिंधु में बेरो!!
श्री करनी हर संकट मेरो!10
।।दोहा।।
वाह!करनला! वाह! माँ!, सुनी साह की आह!
मझ समदर मल्लाह बन, पकरी शिशु की बाँह!!1
तार्यो जगडू साह को, जिहि विधि मात जहाज!
तिहि विधि पार उतारना, मेहाई महाराज!!2
©डा नरपत आशिया “वैतालिक”
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