माँ गंगा की स्तुति – महाकवि सूर्यमल्ल मिश्रण

संदर्भ: वंशभास्कर
॥भुजङ्गप्रयातम् गीर्वाणभाषा॥
पूर्वकथा: मुनि वसिष्ठ की गाय नंदिनी एक गहरे गड्ढे में गिर गई। मुनि ने जब अपनी गाय को असहाय स्थिति में देखा तब कातर स्वर में सहायता के लिए माँ गंगा की स्तुति करने लगे।
नमस्ते नमस्ते नमो देवि गङ्गे,
नमो जह्नुजे पूतपाथस्तरङ्गे।
नमस्ते कपर्दासने भर्गजाये,
नमस्ते ज्वलत्सम्बरे मूलमाये॥१॥
हे देवी गंगा! जह्नु की पुत्री, पवित्र जल की तरंगवाली, जटा के आसनवाली, महादेव की स्त्री, उज्ज्वल जलवाली, आप महामाया हैं।
नमः सर्वसूरर्च्यजङ्घालनीरे,
नमो मुक्तिसोपानभूतेऽच्छतीरे।
अवेव त्वमैन्द्रीरमोंमादिभूते,
नमस्तेऽघंसंहारिके भास्वदूते॥२॥
सबको उत्पन्न करने वाली, अतिवेगवान् जल जिसका पूजनीय है, ऐसी मोक्ष की सीढ़ी रूप सुंदर तटवाली, तेरे अर्थ नमस्कार है। तू यहाँ पर आकर रक्षा कर। हे इन्द्र की शक्ति लक्ष्मी! पार्वती आदि में रहने वाले पापों का नाश करने वाली, आपका प्रवाह देदीप्यमान है।
नमस्ते सुपर्वापगे शुद्धभावे,
नमस्तेऽस्तु संसारपाथोधिनावे।
नमस्ते तटिन्नयुत्तमे तुङ्गकूले,
नमोऽस्त्वम्ब ते सागरोद्धारमूले॥३॥
ऐसी देवगंगा शुद्धभाववाली, संसाररूपी समुद्र की नाव, उत्तम नदी ऊंचे किनारों वाली, माता! आयासगर वंश का उद्धार करने वाली है।
नमस्ते स्वभक्ताय कैवल्यदायै,
नमो हेलयैवाऽघशैलापहायै।
नमस्ते सुवर्णाऽद्रिकूटस्रवलन्त्यै,
नमो मेनकेशादगादुच्छलन्त्यै॥४॥
अपने भक्तों को मुक्ति देने वाली, अपनी लीला से ही पापरूपी पहाड़ों का नाश करने वाली, सुमेरु पर्वत से बहने वाली, और हिमालय पर्वत से उछलने वाली है।
नमो जन्मभेत्र्यै नमो विष्णुपद्यै,
नमोऽनूननेत्र्यै नमो नाकनद्यै।
इमां नन्दिनीमुद्धराऽशु त्वमार्ये,
नमस्ते नमस्तेऽस्त्वकूपारभार्ये॥५॥
जन्म–मरण को काटने वाली, विष्णु के पद से निकली हुई विशाल स्वर्गनदी, हे आर्या! तू शीघ्र इस नन्दिनी को निकाल।
नमोस्तुर्मिचञ्चद्ध्रुवस्थानमीने, नमस्तारकामण्डलाऽऽस्फाललीने।
नमस्त्र्यध्वगे भर्म्मभूभृत्पताके,
नमः पीतसिक्पत्तडित्वद्वलोके॥६॥
हे समुद्र की स्त्री! तरंगों से उज्ज्वल आकाश को नापने वाली, आकाश मण्डल को लांघकर छिप जाने वाली, स्वर्ग, भूमि, पाताल तीनों मार्गों को जाने वाली, सुमेरु पर्वत की ध्वजा, पीताम्बर धारण करने से बिजली वाले मेघ में बुगले के समान जिसके चरण शोभित हैं। ऐसी गंगा को नमस्कार है!
।।दोहा।।
सुनि नीलिंपतटिनी सुजस,
मुनि वशिष्ठ सों एम।
प्रकट अवट मध्यहि भई,
श्रोत विरचि सह प्रेम॥
देव नदी गंगा ने मुनि वशिष्ट के मुंह से अपना यह सुयश सुनकर इस भयंकर गड्ढे से अपना प्राकट्य किया और वह अपनी पावन धारा सहित प्रकट हुई।गंगा के इसी प्रवाह में तैरती हुई सुरभि पुत्री नंदिनी गाय सुखपूर्वक उस खड्डे से बाहर आई और गंगा अपना नदी रूप धरकर सागर से मिलने को गई।
![]()
शानदार स्तुति! बहुत ही अद्भुत भुजंग प्रयात ❤️
अद्भुत अतुल्य अनमोल गंगा स्तुति! कोटिश नमन !