फूंफी रासो – ठाकुर मुरारदान जी मण्डपी
दोहा
पति जयपुर जोधाण पत, भेळा होय दो भूप।
सांभर की किन्हीं सला, रच्यो राड़ को रूप।।1।।
कूरम भाखी कमधजां, असी करां उपाय।
उभयराज राखां अठै, आख्या चौड़े आय।।2।।
आप पति आमेर है, कही कमध कर जोड़।
मो आफत बीती हमे, रूस रह्या राठौड़।।3।।
तिण जागां इक तुरकड़ी, आई करण उपाय।
बहकाई दळ देखकर, जकी सुणाई जाय।।4।।
जयपुर दळ आयो जबर, हारो मत अब धीर।
ताण दिया तम्बु बड़ा, नळियासर की तीर।।5।।
शेख समद काजी मुगल, सुण सारा समचार।
मदद बुलायो मीर खां, धीरज मन में धार।।6।।
आठ दिवस आयो नहीं, मुगलन को बो मोड़।
सा सांभर खाली करो, कच्छावन राठौड़।।7।।
हँसते हिंदू नगर में, नोपत लगे घुरान।
मैं जाकर मस्जिद में, कैसे पढ़ूं कुरान।।8।।
मसळै आंख्यां मुगल सब, आंसू पड़ै अपार।
खुदा आज खोटी करी, बण बैठे बेकार।।9।।
मन में सोची मीर खां, सुण सांभर की बात।
काजी कागद बांचकर, कियो कूच परभात।।10।।
लड़बा लाग्यो मीर खां, भाग्यो भूप अगूण।
आय गये उण दिवस ही, बगरू और बिचूण।।11।।
उणियारो आयो अवस, ल्यायो बिंठा लार।
दरसायो चोड़ै दगो, मुगल हटायो मार।।12।।
कोप चढ्या कूरम कटक, पटक मूंछ पर हाथ।
गिद्ध मांस गहरो गटक, रटक उड़ी दिन रात।।13।।
गुण शब्दि
राठौडो इन कच्छावो ने, कैसा जुलम किया है।
नळियासर की तीर उपर, तम्बू ताण दिया है।।1।।
फूफी कह सांभर की बातां, पगड़ी खोस लई घर आतां. . . . . . .
मियां कै सिर खाट गूदड़ा, बीबी कै सिर राली।
तोबा तोबा करै तुरकड़ी, दो राजन की घाली।।2।।
दीपक डिग्गी पचेवर दुदू, बोरा बांच बखाणो।
आया ऐ सारां सू पैली, पूरी रीत पिछाणौ।।3।।
जेता सुत जगमाल सिंह का, तेता मूछां ताणै।
भिड़ियो आय भलो करवायो, नामी भूप नराणै।।4।।
गागरणु रैल्याणु लड़बा, सांभर शहर सिधाया।
चढतै दल चाळीस जणा नै, मुगल दोय मचकाया।।5।।
मूंछ हाथ धर कहै मीर खां, हिंदू सब हट जाणा।
मुगलां तेज हटेगा नाहीं, कर में रखां कृपाणा।।6।।
पूछ्यो जाय पारली ठाकर, बिरथा बात बखाणै।
क्या जाणै क्या होय मीर खां, तुरक मूंछ मत ताणै।।7।।
साली अर सांखूण सिरोही, मीर बिरंगी जाणो।
सर में सेल कटार्यां राळी, धर्यो विप्र को बानो।।8।।
मांगी सिंह मंगराणै ठाकर, म्है घबराया गाढ़ा।
मरवै ठाकर घणा मिजाजी, आसी बै कद आडा।।9।।
छेड़ बात छर्र को ठाकर, चौड़े चुगली खावै।
सांभर में सारा दुख पावै, मरवो मौज उड़ावै।।10।।
मुरलीपुरा का मूळ सिंह जी, ऊबा जाणै तूती।
तुरक पकड़ मुंडै कर लिन्हा, कठै गई रजपूती।।11।।
सीकर का श्योसिंह जी ठाकर, झट दे बीड़ो उठायो
भागै छै तो भाग रांड का, शेखा पणो लजायो।।12।।
सीकर और खेतड़ी सागै, भिड़ी बिसाऊ आकर।
खूड़ ठिकाणै बाट्यां खावै, बैठ्या जायल ठाकर।।13।।
कोठी सींचै कड़ब कटावै, गाजर खावै घर की।
ऐ तरवार कठै सु बाहता, गलत खांप गिरधर की।।14।।
साली आळो संख बजावै, सांखूण को सांगी।
दड़बड़ दौड़ नळा में बड़गो, दांता वाळो दांगी।।15।।
धूळै राव दगो कर आयो, बायो एक दुधारो।
पैखानो पैली भर दिन्हो, बोल्यो नहीं बिचारो।।16।।
दूणी राव देख तुरकां नै, भर्या रीस में भारी।
आया घर ऐड्यां उचकाता, कांई न लागी कारी।।17।।
मुगलां चरख चढाई तोपां, हिंदू दळ अब हार्या।
इसरदो अचरोळ जकै दिन, काळख किलै पधार्या।।18।।
चौमु और सामोद सरीखा, जका रीत नहीं जाणी।
भिक्षुक होकर भाग्या सारा, नामी भूप नायाणी।।19।।
ड्योढ़ी कोढी मंढो भादवो, जोबनेर का सारा।
ऐ तरवार कठै सू बाता, माता तणा पुजारा।।20।।
भूल करी भादवै ठाकर, भिड़तां पैली भाग्या।
ढालां का तो कर्या ढोकरा, लूण काढबा लाग्या।।21।।
आकोदो उणियारो दोन्यू, करली एक कमेठी।
तम्बू बाळ दिया तुरकां का, सारी फौज समेटी।।22।।
बागपरा का ठाकर बोल्या, म्है झगड़ा का मांझी।
दड़बड़ दौड़ धस्या दरगाह में, खड़ग खोस ली खांजी।।23।।
काजी कहै सुणो सब हिन्दू, झटपट खाणा खाओ।
मुगल आज मारेगा तुमको, अपणै घर को जाओ।।24।।
मरबा खातिर आया मरद सब, घोड़ां पाखर घाल्यो।
मूरख बात करै मत फीटी, काळख पति दकाल्यो।।25।।
खाग लेय खूड़ को ठाकर, मानू मूंछ मरोड़ै।
हिम्मत हार घरा नहीं जाऊँ, कह दरसाई चौड़ै।।26।।
मिंडो और मारोठ गिणीजै, गोड़ाटी का राजा।
लुकता छिपता लियो लूणवो, सात भायां का साझा।।27।।
ड्योढ़ी बांधै पागड़ी, लाम्बा पहरै जोड़ा।
भागी भेड़ भादवा वाळी, घर का देगी घोड़ा।।28।।
साठ हाथ की पाग बांधतो, अस्सी हाथ को गरणो।
भिड़तां पैली भाग गयो ओ, काळख वाळो करणो।।29।।
हाथ्यां पीठ नोपतां कसली, तंदर मूछां ताणी।
माकड़ ज्यू मालफ्फा मांड्या, खाचर्यास खान्यांणी।।30।।
नीमी और बेरी धणकोली, मोटी कूक मचाई।
तीन रात तोसीणै ठाकर, रहगा मरता लाई।।31।।
कुरब लियां कुचामण ठाकर, जका जुद्ध में आया।
तुरकां का तम्बू में बड़गा, मुंढाया मुरझाया।।32।।
एकट करी आंऊवै ठाकर, भूंडो लांछण लाग्यो।
मान घटाय मीठड़ी ठाकर, भाकर सामो भाग्यो।।33।।
साज बाज समर में छोड्या, आधी रात अकेला।
राजाई कित गई रांड का, खोटा राज खंडेला।।34।।
लेडी और लाडनू देखो, भेळा होय दो भाई।
गिंगोली सु गया गाँव नै, सांप्रत शर्म गंवाई।।35।।
रियां और रामपुर ठाकर, बगड़ी जाय बिराज्या।
जावां कियां जोधपुर मांही, भूप छोड़कर भाज्या।।36।।
भकरी और जावलो दोनों, निलज्जा बेईज्जता।
मेड़तिया घर मांही बैठ्या, नार्यां जैम न रीता।।37।।
ले घोड़ा चाल्यो लड़बा नै, मांड्यो कबडी पाळो।
तुरंग छोड़ तैतीसा देगो, खेंट खेतड़ी वाळो।।38।।
कई बार तुरक मिल सारा, करली सब करतूती।
भाग्या नहीं बूड़सू ठाकर, राख लई रजपूती।।39।।
सोमवार सतरा सो सावण, बंधी राव कै राखी।
मुरारदान मिंडपी को बारठ, देखी जिसड़ी दाखी।।40।।
दोहा
मरै मुगल हिंदू हटै, फटै फोज दहुं और।
रटै खुदा रघुनाथ नै, कटै बगत रा कोर।।41।।
भूंडी हो अथवा भली, है विधना रै हाथ।
कवि नै तो कहणी पड़ै, सुणी जसी सह बात।।42।।
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