देवी विनय स्तुति
हिमगिरि-विन्ध्य-निवासिनी! नग-कोहला तव वास!
त्रिपुरसुंदरी! त्र्यंबके! त्वरित हरो यम-त्रास!!1
ब्रह्मचारिणी! भैरवी! करो दनुज का नाश!
सुर-नर-किन्नर-नाग-मुनि, खड़े लिए यह आश!!2
हरो द्वंद्व, छल-छंद, दुख, करो पाप का नाश!
चारु चंद्रघंटा! यही, एकमात्र अरदास!!3
दयामयी! उर दास के, निशि-दिन करो निवास!
मिटा अमावस-ह्रदय-तम, अंतस भरो उजास!!4
संशय-भ्रम-तम ने किया, मन निशि में गृहवास!
शशिघंटा! मुखचंद्र से, चहुँदिश करो प्रकाश!!5
तव चरणन के दास के, दासों का मैं दास!
कुष्मांडा करता विनय, दो पद-कमल निवास!!6
इस जड़ मन पर छा गया, संशय का खग्रास!
स्कंद-जननि! अब कीजिए, भ्रम-राहु का नाश!!7
कृपा करहु कात्यायनी! अंबुज-वदन-उजास!
दो चरणन की चाकरी, करो न जननि! निराश!!8
कालरात्रि! श्री कालिका! यह जगती तव ग्रास!
उत्पति-स्थिति-लय-कारिणी! करिए भ्रम-तम-नाश!!9
गौरी! न हमें बिसारिए, प्रति दिन रखिए पास!
मंद-मंद मुख-हास से, भरो हृदय उल्लास!!10
यश-वैभव-धन-मान-पद, की न अंब! है आस!
भक्ति देहि अनपायिनी, चले जहाँ तक साँस!!11
बीसभुजी! वरदायिनी! वदन-कमल कर वास!
दो प्रसाद में दास को, उक्ति काव्य अनुप्रास!!12
मनहर, मत्तगयंद गति, छंद-गीत-लय-प्रास!
अलंकार के आभरण, करे समर्पित दास!!13
श्रीश्यामा! शाकंभरी! माँ! मत करो निराश!
कवि-कल्याणी कीजिए, रसन-पटांगण रास!!14
कवि नरपत करता विनय, जय माँ! जगत-निवास!
रखिए मम मन-भ्रमर को, चरण-कमल के पास।।15
डा नरपत आशिया “वैतालिक”
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