रघुवरजसप्रकास [7] – किसनाजी आढ़ा
— 137 — छंद भुजंगप्रियात निभौ रांम जेणं तरी भ्रम्ह नारी। यं हीं ताड़का मार बांणां उधारी।। सुबाहं कियौ खंड खंडं सरंखे। निमौ च्यारसै कोस मारीच नंखे।। करी ज्याग स्याहाय मूनेस कज्जं। दखे जै जया बोल आंनेक दुज्जं।। चितं चाय सीता सपीता अचूकं। कियौ चाप भूतेसरौ टूक-टूकं।। ‘किसन्नेस’ आखै अरज्जी कविंदं। बडौ आसरौ रांम पादारब्यंदं।।९४ छंद लक्ष्मीधर (र. र. र. र. ) रांम वांळी रजा सीस ज्यां रै रहै। कूंण त्यांनै हुवा हीण मांणं कहै।। वीसरै जीवहूं जेह सीतावरं। न्यायहीण मदां होय तेता नरं।।९५ दूहौ च्यार स तोटक च्यार तह, कह सारंग सुतत्थ। च्यार ज मुत्तीय दांम चव, च्यार भ […]
» Read more