रघुवरजसप्रकास [6] – किसनाजी आढ़ा
— 105 — अथ चौटीबंध छप्पै लछण दूहौ आद कहै सौ अंत में, नांम गणत नरबाह। सिरै कवित बंधै सिखा, चौटीबंध सराह।।२४६ अथ चौटीबंध छप्पै उदाहरण सूरजपणौ सतेज, स्रवण अम्रत हिमकर सम। उर दाहक सम आग, तौर सुर-राज राज तिम।। सत हरचंद समांन, प्रगट दरियाव अथघपण। सुर तर आस सपूर, जांण पारस सेवक जण।। रवि अमी आग इंद चंद हरि, दूध सुरतरमण आद ले। परभाव आठ निज कांम पर, एक रांम तन ऊझळै।।२४७ अथ हीराबेधी छप्पै लछण दूहौ एकण हीरौ विहरियां, दूजौ हीरौ थाय। हीराबेधी कवित जिम, दोय अरथ दरसाय।।२४८ अथ हीराबेधी छप्पै उदाहरण नारंगी संसार नीम, ऊंबर कर अंबह। […]
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