रघुवरजसप्रकास [5] – किसनाजी आढ़ा

— 73 — अथ गाथा उदाहरण गिरिस गिरा गौ गौरी, हर गिर हिम हंस हास सिस हीरा। सुसरि सेस सुरेसं ए, स्रीरांम क्रत आरख्यं।।१३० अथ गाथा गुण दोस कथन छंद बेअखरी निज आखै किव ‘किसन’ निरूपण, सुणौ गाहा गुण दोस सुलछण। सात चतुरकळ अंत गुरु सज्ज, देह छठे थळ जगण तथा दुज।।१३१ बांधव पूरब अरध एण बिध, यम हिज जांण जगण उत्तरारध। काय छठे थळ यक लघु कीजै, दुसट विखम थळ जगण न दीजै।।१३२ मत्त सतावन स्रब गाथा मह, कळातीस पूरबा अरध कह। वीस सात कळ उतर अरध विच, रेणव अेम छंद गाथौं रच।।१३३ पाय प्रथम पढ़ हंस गमण पर, […]

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रघुवरजसप्रकास [4] – किसनाजी आढ़ा

— 41 — अथ मात्रा व्रत्ति वरणण दूहा मत्त व्रत्त में सुकव मुण, मात्र प्रमांण मुकांम। आवै समता आखिरां, वरण व्रत्त जिण ठांम।।१ मत्त व्रत हिक अह मुणी, पढ़ि सौ च्यार प्रकार। मत्त छंद उप छंद पद, असम सुदंडक धार।।२ छंद चंद्रायणौ* लग मत्ता चौवीस छंद मत्त लेखजै। सुज यां अधिका मत उपछंद विसेखजै।। वरण मत सम नहीं असम पद जांणजै। बे छंदां मिळ दंडक मत्त बखांणजै।।३ अथ मात्रा छंद तंत्र गमक छंद पंच मत, गमक सत। सीत बर, रांम रर।।४ छंद बांम छ मात्रा छ मत ‘बांम’ समरि स्यांम। झूठ धंध, मन म बंध।।५ १. मुकांम-स्थान। आखिरां-अक्षरों में। ठांम-स्थान। […]

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रघुवरजसप्रकास [3] – किसनाजी आढ़ा

— 17 — अथ मात्रा स्थांन विपरीत कड़ौट फेर प्रस्तार लछण। दूहौ अंत गुरु तळ लघु धरौ, आगै पंत समांण। ऊबरे सौ गुरु लघु धरौ, पाछै एह प्रमांण।।५७ अथ मात्रा स्थांन विपरीत कौ प्रकारांतर। चौपई अंत निकट लघु सिर गुरु धरौ, अधर पंत सम अग्र विचारौ। ऊबरे सौ पाछै लघु आवै, कळा थांन विपरीत कहावै।।५८ अथ मात्रा संख्या विपरीत कौ प्रकारांतर दोनूं भेळा कहै छै। चंद्रायणौ आद अंत लघु संनिध तळ गुरु आंणजै। जेम प्रकारांतर गुरु सिर लघु जांणजै।। धुर सम पछ लघु गुरु लघू फिर कीजिये। संख्या बिहुं प्रकार उलट्ट सुणीजियै।।५९ वारता संख्या विपरीत का आद लघु का अंतकौ […]

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रघुवरजसप्रकास [2] – किसनाजी आढ़ा

— 1 — श्रीगणेशाय नमः श्रीगुरुगणपतीष्ट देवताभ्यो नमः * ॐ नमः श्रीसीतारामाय अथ आढ़ा किसनाजी क्रत पिंगळ रघुवरजसप्रकास लिख्यते ** श्रीगणेस स्तुति छप्पै कवित्त-भाखा मुरधर श्री लंबोदर परम संत बुद्धवंत परम सिद्धिबर। आच फरस ओपंत, विघन-बन हंत ऊबंबर। मद कपोल महकंत, मधुप भ्रामंत गंधमद। नंद महेसुर जन निमंत, हित दयावंत हद।। उचरंत ‘किसन’ कवि यम अरज, तन अनंत भगति जुगत। जांनकी-कंत अक्खण सुजस, एकदंत दीजै उगत।।१ प्रथम भ्रहंम मझ बेद, छंद मोरग दरसायौ। खग अग पिंगळनाग, ‘नागपिंगळ’ कर गायौ।। ‘काळिदास’, ‘केदार’, ‘अमरगिर’ पिंगळ अक्खे। भाखा ब्रज सुखदेव, ‘सुरतचिंतामण’ भक्खे।। लछ भाखा पिंगळ ग्रंथ लख, एकठ बोह मत आंणियौ। रघुबरप्रकास जस […]

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रघुवरजसप्रकास [1] – किसनाजी आढ़ा

— i — भूमिका संस्कृत साहित्य में छंदशास्त्र का विशेष स्थान है। वेद के छः अंगों (१ छंद, २ कल्प, ३ ज्योतिष, ४ निरुक्त, ५ शिक्षा और ६ व्याकरण) में छंदशास्त्र भी एक महत्वपूर्ण अंग है। इसका स्थान पाद (चरण) माना गया है। कारण कि इसके बिना गति-क्रिया किसी की सम्भव नहीं, अतः वेद में भी छन्दस्तु वेदपाद: कहा गया है। यह कहना कोई अत्युक्ति नहीं कि हमारे पूर्वाचार्यों ने काव्य-रचना में छंदशास्त्र की उतनी ही आवश्यकता मानी है जितनी व्याकरण की। कालान्तर में अनेक भाषाओं का प्रादुर्भाव संस्कृत भाषा से हुआ जैसे कि प्राकृत, अपभ्रंश आदि। इन भाषाओं के […]

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कान्हड़दे सोनगरा – डॉ. गोविन्द सिंह राठौड़

[…]कान्हड़दे के कठोर और साहस भरे जवाब को पाकर अलाउद्दीन भली प्रकार समझ गया कि वह मेरी सेना को उसके राज्य में से सही-सलामत आगे नहीं जाने देगा। अत: उसने अपनी सेना को मेवाड़ के मार्ग से गुजरात भेजी। अलाउद्दीन की सेना जब गुजरात से वापस दिल्ली की ओर लौट रही थी तब अलाउद्दीन ने एक सेना उलूगखाँ के नेतृत्व में कान्हड़दे के द्वारा मार्ग न दिये जाने के कारण उसे दण्डित करने के लिये भेजी।[…]

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मृगया-मृगेन्द्र – महाकवि हिंगऴाजदान जी कविया

।।मृगया-मृगेन्द्र।।

।।रचना – महाकवि कविया श्रीहिंगऴाजदानजी।।

अथ मृगया-मृगेन्द्र लिख्यते

।।आर्य्या।।
गंडत्थल मढ लेखा, रजत रोलंभराजि गुंजारन
शोभित भाल सुधान्सु, नमो मेनकात्मजा वन्दन।।1
पर्वतराज की पुत्री के पुत्र गणेश को नमस्कार है जिनके कपोलों पर बहते मद की सुगंध से आकृष्ट हुए भौरों की गुंजार सदा रहती है और जिनके ललाट पर चन्द्रमा सुशोभित है।

।।दोहा।।
गनपति गवरि गिरीश गुरु, परमा पुरुष पुरान।
श्री सरस्वती करनी सकति, देहु उकति वरदान।।2
गणेश, गौर(पार्वती), महादेव, लक्ष्मी, विष्णु, सरस्वती, करणी माता, शक्ति मुझे उक्ति (काव्य रचना) का वर दान दे।
[…]

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ફેંસલો (फैसलो) – કવિ દુલા ભાયા કાગ (कवि दुला भाया ‘काग’) – छंद झूलणा

॥ ઝુલણાં છંદ ॥

લેખ કાગળ લખ્યાં તાત પ્રહલાદ ને, કાળ ને જીતવા કલમ ટાંકી ;
વર્ષો ના વર્ષ વિચાર કરીને લખ્યું, માંગતા નવ રહ્યું કાંઇ બાકી.
દેવ સૌ પાળતા સહી વિરંચી તણી, દેવ નો દેવ એ જગત થાપે ;
રદ બન્યા કાગળો એક એવી ગતિ, ફેંસલો નાથ નરસિંહ આપે. ૦૧[…]

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मोरवड़ा मे सांसण की मर्यादा रक्षार्थ गैरां माऊ का जमर व 9 चारणों का बलिदान (ई. स.1921)

प्रसंग: सिरोही राज्य पर महाराव केशरीसिंह का शासन था। राज्य आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। राज्य की माली हालात सुधारने के नाम पर खजाना भरने की जुगत में दरबार ने कई नये कर लगाकर उनकी वसूली करने का दबाव बनाया। जिन लोगों को कर वसूल करने की जिम्मेदारी दी उन्होंने पुरानी मर्यादाओं और कानून कायदों की धज्जियां उड़ाते हुए उल्टी सीधी एवं जोर जबरदस्ती से कर वसूल करना शुरू कर दिया।

इसी कर-वसूली के लिए एक जत्था मोरवड़ा गाँव मे भी आया। मोरवड़ा गाँव महिया चारणों का सांसण मे दिया गाँव था। सांसण गांम हर प्रकार के कर से एवं राजाज्ञा से मुक्त होता है। ये बात जानते हुए भी दरबार के आदमियों ने आकर लोगों को इकठ्ठा किया और टैक्स चुकाने का दबाव बनाया। गाँव के बुजुर्गों ने उन्हे समझाया कि ये तो सांसण गांव है! हर भांति के कर-लगान इत्यादि से मुक्त, आप यहाँ नाहक ही आए! यहाँ सिरोही राज्य के कानून नहीं बल्कि हमारे ही कानून चलते हें और यही विधान है।[…]

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श्री मोरवड़ा जुन्झार जी – कवि रामदान जी

।।श्री जुन्झार जी।।

सिरोही राजा सोखियो, दुश्मण लीधो देख।
जद्ध किधो महियों जबर तन मन दही न टेक।।

अहि भ्रख भूपत आदरयो, कीध भयंकर कोम।
केशर नृप उन्धी करी, सिरोही रे सोम।।[…]

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