गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद-छटौ अध्याय
छटौ अध्याय – आत्मसंयमयोगः ।।श्लोक।। अनाश्रित: कर्मफलं कार्यं कर्म करोति य:। स संन्यासी च योगी च न निरग्निर्न चाक्रिय:।।१।। ।।चौपाई।। कर्म फलां री आस नि करणौ पर हित कर्म सु योगी बणणौ। पण योगी अगनी नै त्याजै तज किरिया योगी नीं वाजै।।१।। ।।भावार्थ।। भगवान श्री कृष्ण कैवै-हे अर्जुन! जकौ मिनख कर्म फलां रौ आश्रय नीं लै पण दूजां रै हित खातर कर्तव्य-कर्म करतौ रैवै वौ इज संन्यासी अर योगी कहावै है। मतलब इण तरह निर्लिप्त रैवतौ थकौ कर्म करण वाळौ इज सन्यासी है अर सुख दु:ख में सम रैवण वाळौ योगी है। पण फगत अग्नि रहित होवण सूं या क्रिया […]
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