गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद-सातवौ अध्याय
सातवौ अध्याय – ज्ञानविज्ञानयोगः ।।श्लोक।। मय्यासक्तमना: पार्थ योगं युञ्जन्मदाश्रय:। असंशयं समग्रं मां यथा ज्ञास्यसि तुच्छृणु।।१।। ।।चौपाई।। घणा प्रेम घण भाव जतावै हे अर्जुन थूं योग निभावै। म्हैं सगळा गुण रूप बताऊँ सुण बिन संशय भरम मिटाऊँ।।१।। ।।भावार्थ।। भगवान् श्रीकृष्ण कैवै-हे अर्जुन! अनन्य प्रेम सूं म्हारा में आसक्तचित्त अर अनन्य भाव होयोड़ौ योग में लागियोड़ौ थूं जिण तरह रौ सगळा बलां युक्ति, ऐश्वर्य गुणा सूं सराबोर सगळां रौ आत्म रूप म्हैं थनै बिना संशय रै बताऊं ला वौ सुण। ।।श्लोक।। ज्ञानं तेऽहं सविज्ञानमिदं वक्ष्याम्यशेषत:। यञ्ज्ञात्वा नेहि भूयोऽन्यञ्ज्ञातव्यमवशिष्यते।।२।। ।।चौपाई।। तत्व ग्यान विग्यान सुणाऊँ तुझ खातर म्हैं सब समझाऊँ। जाणण जोग कर्म पहिचाणौ […]
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