राज बदळियां के होसी

कांई फरक पड़ै कै राज किण रो है ?
राजा कुण है अर ताज किण रो है ?
फरक चाह्वो तो राज नीं काज बदळो !
अर भळै काज रो आगाज नै अंदाज बदळो !
फकत आगाज’र अंदाज ई नीं
उणरो परवाज बदळो !
आप – आप रा साज बदळो
न्यारा – न्यारा नखरा अर नाज बदळो !
इत्तो बदळ्यां पछै चाह्वो
तो राजा बदळो
चाह्वै राज बदळो‘र
चाह्वै समाज बदळो ।[…]

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*समय को पहचानो*

हे मित्र! समय को पहचानो,
बस इतना सा कहना मानो,
आलस से यारी मत करना,
ज्यादा होंशियारी मत करना।

ये क्षण में सबको छलता है,
पल पल में रूप बदलता है।
ये टाले से नहीं टलता है,
अपनी ही गति से चलता है।[…]

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बालक हूं बुद्धू मत मानो

इक दिन उपवन में आयुष जब,
घूम रहा था मस्ती करता,
कलियों-पुष्पों से कर बातें,
कांटों पर गुस्सा सा करता।

तभी अचानक उसके कानों,
इक आवाज पड़ी अनजानी,
बचा-बचाओ मुझे बचाओ,
बोल रही थी कातर बानी।[…]

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जाती रही – गजल

हाथ जब थामा उन्होंने, हड़बड़ी जाती रही।
जिंदगी के जोड़ से फिर, गड़बड़ी जाती रही।

‘देख लूंगा मैं सभी को’ हम भी कहते थे कभी,
आज अनुभव आ गया तो, हेंकड़ी जाती रही।

जो दिलों को जोड़ती थी स्नेह बन्धन से सदा,
घात का आघात खाकर, वो कड़ी जाती रही।[…]

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बुद्धि के दाता:गणपति

हुई जब हौड़ नापे कौन जग दौड़,
सारे काम धाम छोड़ बड़े भ्राता बोले ध्यान दे।
मूषक सवार देख धरा को पसार,
तो से पड़ेगी ना पार क्यों न खड़ी-हार मान ले।
एकदंत एकबार कर ले पुनः विचार,
छोड़ अहंकार याके सार को तु जान ले।
‘शक्तिसुत’ षडानन-गजानन बीच ऐसे,
हुई थी जो हौड़ वाको कहूँ सुनो कान दे।।[…]

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छात्रसंघ-निर्वाचन

नेतृत्व का चयन प्रबंधन,
की प्रामाणिक धूरी है।
कैसे कह दें छात्रसंघ, निर्वाचन गैर जरूरी है।

कोई भी हो तंत्र तंत्र का,
अपना इक अनुशासन है
अनुशासन के लिए तंत्र में
अलग-अलग कुछ आसन है।
आसन पर आसीन कौन हो,
इसकी एक व्यवस्था है।
जहाँ व्यवस्था विकृत-बाधित,
हाल वहीं के खस्ता हैं।
साँप छोड़ बाँबी को पीटे,
समझो अक्ल अधूरी है।
कैसे कह दें छात्रसंघ, निर्वाचन ग़ैर-जरूरी है।[…]

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दादाजी (बालकाव्य)

दादाजी का कमरा जिसमें बच्चे मौज मनाते हैं।
नित्य नई बातें बच्चों को, दादाजी बतलाते हैं।

इक दिन दादाजी ने बोला, आज पहेली पूछूँगा।
जो भी उत्तर बतलाएगा, उसको मैं टॉफी दूँगा।

गणित विषय का ज्ञाता है वो, झटपट जोड़ बताता है।
घर बैठे हमको दुनियां की, सरपट सैर कराता है।
नाम बताओ उसका है जो, टीचर गाईड ओ ट्यूटर।
सारे बच्चे बोल उठे वो, अपना प्यारा कम्प्यूटर।।
वाह बेटा वाह वाह वाह जी, बोल उठे यूँ दादाजी।
हम बच्चों से बातें करके, होते राजी दादाजी।[…]

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दौरेजहाँ का दर्द

ये षड्यंत्री दौर न जाने,
कितना और गिराएगा।
छद्म हितों के खातिर मानव,
क्या क्या खेल रचाएगा।

ना करुणा ना शर्म हया कुछ,
मर्यादा का मान नहीं।
संवेदन से शून्य दिलों में,
सब कुछ है इंसान नहीं।।[…]

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गुरु अमृत की खान

है वही जो ज्ञान के आलोक को जग में फैलाता।
है वही जो आदमी को आदमी बनना सिखाता।
जो सभी को  प्रेम का संदेश देता है सदा,
उस गुरु के श्रीचरण में लोक अपना सिर झुकाता।। (शक्तिसुत)

‘गुरु’ नाम उस शक्ति का है जो व्यक्ति को सही-गलत, असली-नकली, अच्छे-बुरे, उच्च-निम्न, उत्कृष्ट-निकृष्ट, उचित-अनुचित, प्रासंगिक-अप्रासंगिक, पवित्र-अपवित्र, ग्रहणीय-त्याज्य के बीच फर्क करना ही नहीं सिखाता वरन सत्य के वरण एवं असत्य के क्षरण का विवेक एवं साहस प्रदान करता है। वह ज्ञान रूपी प्रकाश से अज्ञान रूपी तमस को […]

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