चलना तेरा काम
पग-पग पर अवरोध मिलेंगे,
सुख-दुःख के युगबोध मिलेंगे।
विकट मोड़, गतिरोध मिलेंगे,
कुछ अनुनय अनुरोध मिलेंगे।
चलते जाना है तुमको बस, करके उन्हें प्रणाम। 1
जीवन पथ का तू राही मन!, चलना तेरा काम।।
…
» Read moreCharan Community Portal
पग-पग पर अवरोध मिलेंगे,
सुख-दुःख के युगबोध मिलेंगे।
विकट मोड़, गतिरोध मिलेंगे,
कुछ अनुनय अनुरोध मिलेंगे।
चलते जाना है तुमको बस, करके उन्हें प्रणाम। 1
जीवन पथ का तू राही मन!, चलना तेरा काम।।
…
» Read more
सजन सबै संसार नैं, चुगली हंदो चाव।
गजादान चुगली बिना, बंतळ बेरस साव।
बंतळ बेरस साव, हुई बिन हुई हथाई।
भरै पेट में गैस, रंच नहिं रितै रिताई।
निंदा-रस निठतांह, रस-नौका मझधार में।
शोध-बोध-संबोध, सुकवि कहै संसार नैं।।01।।[…]
बोयां कांटा बापजी, फळै न लागै फूल
जगबरती नैं जाणतां, भूल न करणी भूल
भूल न करणी भूल, इयां मत काढ़ो आंटा
बणी बणाई बात, बिगड़सी बोयां कांटा।[…]
जद बीज जमीं में गाडीज्यो,
अंतस अकुलायो दुख पायो।
बचबा रा गेला बंद देख
रोयो घबरायो पछतायो।
तद माटी उण सूं यूं बोली
रे बीज मती ना घबरावै।
जो जुड़ै जमीं सूं जड़ उणरी
कोई पण काट नहीं पावै।[…]
सठ बेच बजारन हीरन को,
मन मोल कथीर करावत है।
अस के बदले मुढ रासभ ले,
निज भाग अथाग सरावत है।
तड गंग सुचंग सों नीर तजै,
धस कीचड़ अंग पखारत है।
कवि गीध अमोलख मानव जीवन,
झेडर झुंड गमावत है।।[…]
राजस्थान री संस्कृति, प्रकृति, जीवनमूल्य, परंपरा अर स्वाभिमानी संस्कारां री अंवेर करण वाळो अंजसजोग छापो ‘रूड़ौ राजस्थान’ तर-तर आपरौ रूप निखारतो, सरूप सँवारतो, समै री माँग मुजब सामग्री परोटतो पाठकां री चाहत रो केंद्र बणतो जा रैयो है। इण ओपतै अर उल्लेखणजोग छापै रा सुधी-संपादक भाई श्री सुखदेव राव मायड़भाषा राजस्थानी अर मायड़भोम राजस्थान रै गौरवमय अतीत रा व्हाला विरोळकार है। इण रूड़ौ राजस्थान छापै रै दिसंबर, 2019 अंक में आपरै इण नाचीज़ मित्र रो एक आलेख छपियो है, इण सारू भाई सुखदेव जी राव रौ आभार अर आप सब मित्रां सूं अपेक्षा कै आज रै समै परवाण ‘संस्कारां रै संकट सूं जूझता रिश्ता’ री साच सोधण सारू ओ आलेख ध्यान सूं पढ़ण री मेहरवानी करावजो।[…]
» Read more
यह चिरंतन सत्य है कि समय निरंतर गतिमान है और समय की गति के साथ सृष्टि के प्राणियों का गहन रिश्ता रहता है। सांसारिक प्राणियों में मानव सबसे विवेकशील होने के कारण समय के साथ वह अपनी कदम ताल मिलाते हुए विकास के नवीनतम आयाम छूने के लिए प्रयासरत्त रहता है। समय के बदलाव के साथ व्यक्ति की सोच, उसकी आवश्यकताएं, अपेक्षाएं, मान्यताएं तथा वर्जनाएं बदलती हैं। इसी बदलाव में सामाजिक, आर्थिक, राजनैतिक, सांस्कृतिक, धार्मिक तथा अन्यान्य जीवनमूल्यों में परिवर्तन होता है।[…]
» Read more
राजस्थानी साहित्य, संस्कृति और चारण-राजपूत पारंपरिक संबंधों के मजबूत स्तंभ परम श्रद्धेय राजर्षि उम्मेदसिंह जी ‘ऊम’ धोल़ी आज हमारे बीच नहीं रहे।
आपके स्वर्गारोहण से उस एक युग का अवसान हो गया जिस युग में ‘चारण और क्षत्रिय’ के चोल़ी-दामण के संबंध न केवल माने जाते थे अपितु निर्वहन भी किए जाते थे।
आप जैसे मनीषी से कभी मेरा मिलना नहीं हुआ लेकिन आदरणीय कानसिंहजी चूंडावत की सदाशयता के कारण उनसे दो- तीन बार फोन पर बात हुई। फोन मैंने नहीं लगाया बल्कि उनके आदेशों की पालना में कानसिंहजी ने ही लगाया और कहा कि ‘धोल़ी ठाकर साहब आपसे बात करना चाहते हैं।”
जैसे ही मैं उन्हें प्रणाम करूं, उससे पहले ही एक 92वर्षीय उदारमना बोल पड़ा “हुकम हूं ऊमो! भाभाश्री म्हारा प्रणाम!“[…]
प्रशंसा बहुत प्यारी है,
सभी की ये दुलारी है,
कि दामन में सदा इसके,
खलकभर की खुमारी है।
फर्श को अर्श देती है,
उमंग उत्कर्ष देती है,
कि देती है ये दातारी,
हृदय को हर्ष देती है।[…]
इळ पर नहचै वो दिन आसी,
गीत रीत रा सो जग गासी,
राख याद घातां री रातां,
उर में मत ना लाय उदासी।
करमहीण रै संग न कोई,
काबो मिलै न मिलणी कासी।
पुरसारथ रो पलड़ो भारी,
इणमें मीन न मेख जरासी।[…]