स्वातंत्र्य चेतना के प्रखर चिंतक: कविराजा बांकीदासजी आशिया

साहित्य की परिभाषा ही सब का हित संधान करने वाली होती है तो फिर इसका सृजक चाहे वो किसी भी जाति, समुदाय अथवा धर्म का क्यों न हो वो व्यष्टिपरक हितसंधान की बात कैसे सोच सकता है? क्या कबीर, रहीम, ईशरदास बारहठ आदि मनीषी केवल अपने धर्म तक ही सीमित रहे या उन्होंने उस क्षुद्र बंधनों को तोड़ा!!

इसी बात को मध्यनजर रखकर मैंने कविराजा बांकीदासजी आशिया को अनेकों बार पढ़ा। जब हम डिंगल कवि के बतौर बांकीदास जी को पढ़तें हैं तो जो आरोप डिंगल कवियों पर लगाए जाते रहें हैं वे सारे के सारे निर्मूल सिद्ध होते हैं।[…]

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करणीजी रा  छप्पय

बसुधा बीकानेर, जको जग जाहर जांणै।
सको इल़ा नम सेव, देव राजो देसांणै।
मगरै में महमाय, दाय कीधी दासोड़ी।
तूं राजै थल़राय, जेथ नवलख जुथ जोड़ी।
समरियां सदा आवै सगत, लाखी ओढण लोवड़ी।
दासोड़ी दास गिरधर दखै, मया रखै तूं मावड़ी।।1[…]

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पुस्तक विमोचन, उत्कृष्ट सेवा एव साहित्य सम्मान समारोह

श्री केसरीसिह बारहठ चारण सेवा संस्थान के तत्वावधान में 31 अगस्त 2017 को मिनी ऑडिटोरियम सूचना केन्द्र जोधपुर में कवि गिरधर दान रतनू “दासोड़ी” लिखित पुस्तक “ढऴगी रातां ! बहगी बातां !” तथा जनकवि श्री वृजलाल जी कविया द्वारा रचित पुस्तक “विजय विनोद” के विमोचन का भव्य आयोजन हुआ। मंच पर अध्यक्ष के रूप में तकनीकी वि.वि. कोटा के डीन डॉ हाकमदानजी चारण, मुख्य अतिथि उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति पुष्पेन्द्र सिंहजी भाटी, विशिष्ट अतिथि राजर्षि ठाकर नाहरसिंह जी जसोल, डिंगल़ के शिखर पुरुष श्रद्धेय डॉ शक्तिदानजी कविया, इतिहासज्ञ प्रो जहूर खां मेहर, डिंगल के दिग्गज कवि डूंगरदानजी आशिया, समालोचक व राजस्थानी के लोकप्रिय श्रेष्ठ कवि डॉ आईदानसिंह जी भाटी, लोकसाहित्य के मर्मज्ञ विद्वान डॉ सोहनदानजी चारण, राजस्थानी भाषा आंदोलन के पुरोधा लक्ष्मण दानजी कविया एवं डूंगर मा.वि.बीकानेर की राजस्थानी विभागाध्यक्ष डॉ प्रकाश अमरावत आसीन थे।[…]

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डूंगरराय री आरती

ऊँ जय मामड़याल़ी मा जय मामड़याली।।
चारण वंश उजाल़ण चंडी,
पाल़ण प्रतपाल़ी।
आवड़ रूप अवतरी अंबा,
सातूं सतवाली।।
ऊँ जय मामड़याल़ी।।१[…]

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ईसाणंद म्हारा आदेश

आसा ईशर अवन उण, प्रगट्या मोटा पात।
भोम अहो भादरेस री, विमल़ चहुदिस बात।।

।।गीत वेलियो।।
आयो कुळ जात उजाळण अवनी
भायो भोम नमो भादरेस,
सूरै भाग सरायो सारां।
ईसर पायो पूत आदेस।।1[…]

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पुस्तक समीक्षा – पखापखी विहुणी निरख-परख

साहित्य सिरजण रै सीगै बात करां तो सगल़ां सूं अबखो अर आंझो काम है आलोचना रो। आलोचना रै पेटै काम करणियो नामचीन ई हुवै तो बदनाम ई। इण छेत्र में तो वो ई काम कर सकै जिणरै मनमें “ना काहू सों दोस्ती, ना काहू सों बैर “री भावना हुवै। हकीकत में आज इणरै ऊंधो हुय रह्यो है, आज तो आलोचना ई मूंडो काढर तिलक करण री परंपरा में बदल़ रह्यी है।
राजस्थानी आलोचना री बात करां तो आपां रै सामी आलोचकां रा नाम कमती अर पटकपंचां रा नाम ज्यादा अड़थड़था लखावै। यूं भी आलोचना करणो कोई बापड़ो विषय नीं है जिको हर कोई धसल़ मार देवै। आलोचना करणो खांडै री धार बैवणो है। जिण खांडै री धार माथै सावजोग रूप सूं बैवणो सीख लियो वो आलोचना रै आंगणै आपरी ओपती ओल़खाण दिराय सकै कै थापित कर सकै।[…]

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छंद करनीजी रा

।।छंद – रोमकंद।।
दुसटी कल़ु घोर हुवो दुख देयण, रेणव जात सुमात रटी।
महि गांम सुवाप पिता धिन मेहज, पाप प्रजाल़ण तूं प्रगटी।
इल़ जात उजाल़ण पातव पाल़ण, बात धरा पर तो वरणी।
धिन लोहड़याल़िय लाल धजाल़िय, तूं रखवाल़िय संत तणी।।1

प्रजपाल़ तुंही सरणाणिय पोखण, रोकण राड़ बिगाड़ रसा।
सबल़ापण हाकड़ धाकड़ सोखण, जोगण काज बखांण जसा।
जुध मांय अरी सिर वीजड़ झोखण, हेकण हाथ जमात हणी।
धिन लोहड़याल़िय लाल धजाल़िय, तूं रखवाल़िय संत तणी।।2[…]

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कीरत गिरधर आ कत्थी

।।छंद – रेंणकी।।
हरणी हर कष्ट समरियां हर दिन, करणी तूं हर काज करी।
सरणी नर रटै सबर रख, सांप्रत, खबर जैण री जबर खरी।
झरणी नित नेह बाळकां, जरणी, वरणी जस इळ बीसहथी।
तरणी कळु नीर डूबती, तारण, भीर करै मा भगवती।।१

फसियो इळ पाप बहू विध फंदन, बंधन कितरा है ज वळै।
विसर्यो पड़ दोख तिहाळो वंदन, भाळो मंदन बुद्ध भळै।
इम आप तणो अवलंब, ईसरी, जाप नेम री नह जुगती।
तरणी कळु नीर डूबती, तारण, भीर करै मा भगवती।।२[…]

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सब बातन को सार

बड़ो को सनमान अरूं छोटो को स्नेह धार,
लाग लपटान बिनां खरी खरी कहबो।
झूठ जँजाल अरूं छदम को पँपाल त्याग,
हक की हजार लेय बेहक को तजबो।

आडंबर वेश नहीं धूर्त को आदेश नहीं,
कथनी रू करनी में भेद बिनां रहबो।
अरे भाई ! गीध सब बातन को सार यही,
सज्जन सों प्रीति अरूं नीति मग बहबो।।[…]

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लाखो फूलाणी लछो!!

“ठगीजै सो ठाकर” री बात कुड़ी नीं है। हथाई रो कोड हुवै उण नै दमड़ा खरचणा पड़ै। ओ काम कोई मोटै मन रो मानवी ई कर सकै। इण में कोई जात रो कारण नीं है। ऐड़ै ई एक मोटै मन रै मिनख रो किस्सो चावो है।

पोकरण रै पाखती गांव लालपुरो। रतनूवां रै जागीरी रो गांम। इण गांम रै रतनू भोजराज री उदारता विषयक ओ दूहो घणो चावो-

लायक रतनू लालपुर गिरवर सुत बड गात।
कवि भोजै री कोटड़ी रहै सभा दिन रात।।

उल्लेखणजोग है कै सिरूवै में रतनू तेजमालजी हुया। जिणांरा माईत बाल़पणै में ई गुजरग्या हा। नेनप पड़गी। इणां रो नानाणो भाखरी रै मिकसां रै अठै। तेजमालजी री मा तेजमालजी नै लेय आपरै पीहर भायां कनै आयगी। दिन लागां तेजमालजी मोटा हुया। भाग बारो दियो। घोड़ां रा मोटा वौपारी हुया। एकर चांदसमा ठाकुर लालकरनजी इणां सूं एक घोड़ो लियो पण रकम ऊभघड़ी हुई नीं जणै ठाकुरां तेजमालजी नै कह्यो कै “आप सिरूवै क्यूं रैवो? म्हारै कनै रैवो। आवण-जावण रो पंपाल़ मिटै।”[…]

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