पुस्तक समीक्षा – चारण चंद्रिका – महेंद्रसिंह सिसोदिया ‘छायण’

साहित्य अर इतिहास रै आभै में उजास करती ‘चारण चंद्रिका’ ~~महेंद्रसिंह सिसोदिया ‘छायण’ राजस्थान रौ इतिहास जितरौ लूंठौ अर गौरवमय हैं उतरौ ई अनूठौ अठै रौ साहित्य हैं। राजस्थानी साहित्य री डिंगळ परंपरा नै देखां तो लागै कै इणमें वीरां री अजरी वीरता रै वरणाव साथै सामाजिक अर सांस्कृतिक परंपरावां, रीति रिवाज अर लोक-जीवण री छिब साकार व्हैती निगै आवै। इणी ज डिंगळ साहित्य रौ ऊजळौ अध्याय हैं–चारण चंद्रिका। डिंगळ रै प्रख्यात कवि -निबंधकार गिरधरदान रतनू इण कृति नै जिण लगन अर निष्ठा सूं संपादित करी, इणरै लारै वांरी गै’री सोच अर वडेरां रै प्रति असीम श्रद्धा लखावै। संपादित कृति […]

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जेठवा री बात में कतिपय भ्रामक धारणाएं – श्री कैल़ाश दान उज्ज्वल आईएएस (रिटायर्ड)

‘चारण साहित्य का इतिहास’ नामक शोध ग्रन्थ लिख कर चारण साहित्य पर कालजयी व प्रणम्य कार्य करने वाले डॉ. मोहनलाल जिज्ञासु‘सौराष्ट्र नी रसधार’ के लेखक श्री झवेरचंद मेघाणी जैसे मनीषियों को सादर वंदन।
अस्तु इसी साहित्य इतिहास में एक बहुत बड़ी भूल हुई है – “ऊजळी-जेठवा री बात” इसमें ऊजळी को कवयित्री मानकर उसका परिचय तथा काव्य बांनगी भी दी गई है। यह भूल जिज्ञासुजी ने मेघाणीजी को आधार मानकर की थी। मेघाणीजी ने भी यह भूल जानबूझकर नहीं की अपितु विभिन्न कहानियों का संकलन करते समय अपवादस्वरूप हो गई।
इसी भूल पर राजस्थानी साहित्य के दिग्गज विद्वान श्रद्धेय कैलासदानजी उज्ज्वल ने शोध पत्रिका ‘विश्वंभरा’ अप्रैल-जून 1994 में एक शोध लेख लिखा था। जिसमें शोध के प्रतिमानों के आधार पर तथ्यात्मक दृष्टि से व्यापक प्रकाश डाला गया है।[…]

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पारख पहचाणीह !

मध्यकाल़ीन राजस्थान रो इतियास पढां तो कदै कदै ई आपांनै लागै कै केई वीरां अर त्यागी मिनखां साथै न्याय नीं हुयो। इण कड़ी में आपां मारवाड़ रो इतियास पढां तो महाराजा जसवंतसिंहजी प्रथम रो जद देवलोक हुयो अर उणांरै कुंवर अजीतसिंहजी नै क्रूर ओरंगजेब सूं बचावण अर दिल्ली सूं बारै सुरक्षित काढण री नौबत आई। उण बखत उठै कनफाड़ै जोगी रो रूप धार आपरी छाबड़ी में छिपाय अजीतसिंहजी नै छानै-मानै काढणियै जिण मिनखां रा नाम आपांरै साम्हीं आवै उणांमें एक नाम है मनोहरदास खीची अर दूजो नाम है मनोहरदास नांधू।[…]

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हाथ वीजा को पकड़जो!

मध्यकाल़ रो इतियास पढां तो एक बात साव चड़ूड़ निगै आवै कै उण बखत रा लोग आपरै सिंद्धांतां माथै जीवता अर मरता। जिणरो अन्नजल़ करता उणरै सारू आपरो माथो हथेल़ी में हाजर राखता। यूं तो उण समय स्वामीभक्ति अर स्वाभिमान ऐ दो ऐड़ा जीवणमूल्य हा जिणांनै लगैटगै सगल़ा मिनख कायम राखता पण जद आपां इण विषय रा चारणां सूं संबंधित दाखला पढां तो आपांनै लागै कै स्वामिभक्ति अर चारण एक दूजै रा पर्याय हा। ओ ई कारण हो कै मारवाड़ रा धणी मानसिंहजी निशंक कह्यो हो कै-

‘स्वामिभक्त सत्यवक्ता रू वचनसिद्ध।’[…]

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सींथल़-सुजस इकतीसी

।।दूहा।।
सुकवी संतां सूरमां, साहूकार सुथान।
सांसण सींथळ है सिरै, थळ धर राजस्थान।।1

वंश वडो धर वीठवां, गोहड़ भो गुणियाण।
जिण घर धरमो जलमियो, महि धिन खाटण माण।।2

धरमै रो बधियो धरम, भोम पसरियो भाग।
जांगल़पत गोपाल़ जो, उठनै करतो आघ।।3

धरमावत मेहे धरा, कीरत ली कवराव।
सांगट देव हमीर सा, आसै जिसा सुजाव।।4[…]

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सूरां मरण तणो की सोच?

राजस्थान नै रणबंकां रो देश कैवै तो इणमें कोई इचरज जैड़ी बात नीं है। अठै एक सूं बध’र एक सूरमा हुया जिणां आपरी आण बाण रै सारू मरण तेवड़ियो पण तणियोड़ी मूंछ नीची नीं हुवण दी। वै जाणता कै एक दिन तो इण धरती सूं जावणो ई है तो पछै लारै सुजस ई राख’र जावां कुजस क्यूं?

ओ ई कारण हो कै अठै नरां धरम, धरती अर स्त्री रै माण सारू आपरी देह कुरबान करती बखत मन चल़-विचल़ नीं करता बल्कि गुमेज रो विषय मानता-

ध्रम जातां धर पल़टतां, त्रिया पड़ंतां ताव।
तीन दिहाड़ा मरण रा, कहा रंक कहा राव।।[…]

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अबखी करी अजीत!

किणी राजस्थानी कवि कह्यो है कै बात भूंडी है कै भली, ओ निर्णय फखत विधाता रै हाथ है पण जैड़ी सुणी वैड़ी कवि नै तो कैवणी पड़ै-

भूंडी हो अथवा भली, है विधना रै हाथ।
कवि नै तो कहणी पड़ै, सुणी जिसी सह बात।।

अर्थात असली कवि वो ईज है जिको पखापखी बिनां निपखी बात कैवै। ऐड़ा ई एक निडर कवि हुया भभूतदानजी सूंघा (कैर)।[…]

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લોક સાહિત્યના કલાધરઃ શ્રી મેઘાણંદ ગઢવી

મેધાવી કંઠના સુપ્રસિદ્ધ વાર્તાકાર મેઘાણંદ ગઢવીનો જન્મ ઘેડ વિસ્તારના છત્રાવા ગામે ચારણ જ્ઞાતિની લીલા શાખના ખેંગાર ગઢવીને ત્યાં સંવત ૧૯૧૮માં થયો હતો.

લોકસાહિત્યના ક્ષેત્રમાં “લોકવાર્તા” આગવું સ્થાન ધરાવે છે. પહેલાના જમાનામાં આવી લોકવાર્તાઓ જામતી. કોઈ રાજદરબારે, પણ આતો જનસમાજની વાતું જનસમાજમાં સહુને સાંભળવી હોયને! પોતાની રત્ન સમી સંસ્કૃતિની ગાથાથી જનસમાજ કેમ વંચિત રહે? અને આમ મેઘાણંદ ગઢવી જેવા પ્રચંડકાય વીર વાર્તાકારના બુલંદ કંઠને આમજનતા સમક્ષ વહેતો મૂક્યો શ્રી ગોકળદાસ રાયચૂરાએ.[…]

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लेबा भचक रूठियो लालो

राजस्थान रो मध्यकाल़ीन इतियास पढां तो ठाह लागै कै अठै रै शासकां अर उमरावां चारण कवियां रो आदर रै साथै कुरब-कायदो बधाय’र जिणभांत सम्मान कियो वो अंजसजोग अर अतोल हो।

जैसल़मेर महारावल़ हरराजजी तो आपरै सपूत भीम नै अठै तक कह्यो कै ‘गजब ढहै कवराज गयां सूं, पल़टै मत बण छत्रपती।‘ तो महारावल़ अमरसिंहजी, कवेसरां रो जिणभांत आघ कियो उणसूं अभिभूत हुय’र कविराजा बांकीदासजी कह्यो- ‘माड़ेचा तैं मेलिया, आभ धूंवा अमरेस।‘[…]

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कवि सम्मान री अनूठी मिसाल

कवि मनमौजी अर कंवल़ै काल़जै रो हुवै। जिण मन जीत लियो कवि उणरो कायल। इण मामलै में वो छोटो कै मोटो नीं देखै। ओ ई कारण है कै वो निरंकुश कहीजै। बुधजी आसिया भांडियावास, कविराजा बांकीदासजी रा भाई पण उणां री ओल़खाण आपरी निकेवल़ी मतलब मनमौजी कवि रै रूप में चावा। एक’र बीमार पड़िया तो दरजी मयाराम उणां रा घणा हीड़ा किया। उणरी सेवा सूं रीझ’र बुधजी ‘दरजी मयाराम री बात‘ लिखी। आ बात राजस्थानी बात साहित्य री उटीपी रचनावां मांय सूं एक।[…]

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