ठिरड़ै रा ठाट

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।। ई जल्लै तो मारिया ई है!।।

ठिरड़ै रै एक ठावकै मिनख रो ब्याव मंडियो। उणरै एक बेली हो सो उणरी आदत मसकरी री। उण मिनख अर बेली रै बेलीपो ठावको पण बेली माथै विश्वास पण कम। तोई बात आ कै काणो मांटी सुहावै नीं अर काणो बिनां नींद आवै नीं। जद जान वहीर हुवण लागी जणै बेली आयो अर जान हालण री बात करी जणै वो ठावको मिनख जान ले जावण सूं आ कैय’र नटग्यो कै- “भइया तूं मांझो ब्याव बिगाड़ै पो। इयै कारण तनां जान नीं ले जाऊं।”[…]

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इण घर आई रीत!!

रजवट रै रुखाल़ै गोपाल़दासजी चांपावत रै वंशजां रो ठिकाणो हरसोल़ाव। इण ठिकाणै में महावीर बलूजी री वंश परंपरा। इण परंपरा नै पाल़णिया कई आंकधारी अर अखाड़ाजीत नर रत्न हुया, जिणां आपरै पुरखां री कीरत आपरी वीरत रै पाण कदीमी कायम राखी।
इणी ठिकाणै रै छुट भाइयां में महाराजा मानस़िहजी री बखत करणसिंहजी चांपावत(सालावास) आपरी आदू रीत अर तरवार सूं प्रीत पाल़णिया राजपूत हुया। […]

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तूं झल्लै तरवार!

राजस्थान रै इतिहास में जोधपुर राव चंद्रसेनजी रो ऊंचो अर निकल़ंक नाम है। अकबर री आंधी सूं अविचल़ हुयां बिनां रजवट रो वट रुखाल़ण में वाल़ां में सिरै नाम है चंद्रसेनजी रो। राष्ट्रकवि दुरसाजी आढा आपरै एक गीत में लिखै कै उण बखत दो आदमी ई ऐड़ा हा जिणां रो मन अकबर रो चाकर बणण सारू नीं डिगियो। एक तो महाराणा प्रताप अर दूजा राव चंद्रसेनजी जोधपुर-

अणदगिया तुरी ऊजल़ा असमर,
चाकर रहण न डिगियो चीत।
सारां हिंदूकार तणै सिर,
पातल नै चंद्रसेण पवीत।।[…]

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भगवती तेमड़ाराय नै दिया शाकाहारी रहने का सुभग संदेश

चौपासणी गांम रतनू गेहराजजी को भीम राठौड़ ने दिया था। इन्हीं गेहराजजी की संतति में आगे चलकर रतनू चांपोजी हुए जो तेमड़ाराय के अनन्य भक्त थे। एकबार वे तेमड़ाराय के दर्शनार्थ जैसलमेर स्थित तेमड़ाराय के थान जा रहे थे। जब निर्जन वन के बीच पहुंचे तो पानी समाप्त हो गया, इन्हें अत्याधिक प्यास लग गई। करे तो क्या करे!! हारे को हरि नाम ! इन्होंने भगवती को याद किया-

चांपो नगर चौपासणी, राजै रतनू राण।
बात ख्यात अर विगत री, जाझी साहित जाण।।1

गढवी गिरवरराय री, धुर उर भगती धार।
दूथी टुरियो दरसणां, करण मनोरथ कार।।2[…]

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रतनू सलिया रंग!!

महाकवि सूर्यमल्लजी मीसण रो ओ दूहो–

हूं बलिहारी राणियां, जाया वंश छतीस।
सेर सलूणो चूण ले, सीस करै बगसीस।।

मध्यकालीन राजस्थान में घणै सूरां साच करर बतायो। उणां री आ आखड़ी ही कै किणी रो लूण हराम नीं करणो अथवा अवसर आया लूण ऊजाल़णो।

यूं तो ई पेटे घणा किस्सा चावा हुसी पण चाडी रै रूपावत खेतसिंहजी री लूण रै सटै नींबाज ठाकुर सुरताणसिंहजी रै साथै प्राण देवण री बात घणी चावी है—

चाडी धणी पखां जल़ चाढै,
रूपावत रण रसियो।
वर आ अपछर नै बैठ विमाणां,
विसनपुरी जा वसियो।।[…]

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राण मिल़ै किम राजसी?

राण मिल़ै किम राजसी?‘ आ एक ऐतिहासिक छप्पय री छूटती झड़ है। इण छप्पय रै रचणहार कवि रै रूप में भूलवश किणी कम्माजी आसिया तो किणी कम्मजी दधवाड़िया तो किणी भल़ै कीं लिखियो है पण दरअसल इण छप्पय रा रचणहार कवि कम्माजी नाई हा।

कम्माजी ‘जिल्या चारणवास’ रा रैवणवाल़ा हा। ‘जिल्या चारणवास’ कुचामण रै पाखती आयो थको रतनू चारणां री जागीर रो गांम हो।

ठावकै मिनखां री बस्ती हो जिल्या चारणवास। अठै रतनुवां रो सम्मान पाखती रा राजपूत सिरदार घणो राखता। […]

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विजयी एवं पराजयी मानसिकता

युवाओं के हृदय सम्राट एवं भारतीय मनीषा के महनीय आचार्य स्वामी विवेकानन्द के साहित्य का अध्ययन करने पर सार रूप में यह समझ आया कि व्यक्ति की हार एवं जीत में उसकी मानसिकता का अहम योगदान रहता है। कबीर ने भी ‘मन के हारे हार है, मन के जीते जीत‘ कह कर इस तथ्य को पूर्व में ही स्वीकृति दी है। स्वामीजी के अनुसार मानव समाज में दो तरह की मानसिकताएं सदैव साथ-साथ काम करती है। एक ही काम, एक ही व्यक्ति एवं एक ही विषय पर हमारी अलग-अलग राय के पीछे ये मानसिकताएं ही काम करती है। ये हैं – 1. विजयी मानसिकता एवं 2. पराजयी मानसिकता। इसे हम सकारात्मक एवं नकारात्मक भी कह सकते हैं तो आशावादी एवं निराशावादी मानसिकता भी कह सकते हैं।[…]

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अरे भइया ! आ तो गधा गाल़णी धरती है!

एकर एक थल़ी रो बासण घड़णियो कुंभार आपरै गधे माथै ढांचो मेलियो अर उणमें पारी, चाडा, तामणिया, कुल़डकी, चुकली, भुड़की आद घाल’र पोकरण कानी निकल़ियो।

पोकरण पूगो पण उण सोचियो कै गांमड़ां में मजूरी ठीक हुसी सो उवो पोकरण सूं दिखणादी-आथूणी कूंट में निकल़ियो।
थोड़ोक आगै निकल़ियो तो उणनै सुणिज्यो कै लारै सूं कोई मिनख हेलो कर रह्यो है। उवो हेलो सुण’र ठंभियो। हेलो करणियो मिनख नैड़ो आयो अर खराय’र साम्हैं जोवतै पूछियो-
“कयो(कौन) है रे!”

कुंभार कह्यो – “बा ! हूं तो थल़ी कानलो फलाणो कुंभार हूं।”[…]

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भरिया सो छल़कै नहीं

राजस्थानी साहित्य, संस्कृति और चारण-राजपूत पारंपरिक संबंधों के मजबूत स्तंभ परम श्रद्धेय राजर्षि उम्मेदसिंह जी ‘ऊम’ धोल़ी आज हमारे बीच नहीं रहे।
आपके स्वर्गारोहण से उस एक युग का अवसान हो गया जिस युग में ‘चारण और क्षत्रिय’ के चोल़ी-दामण के संबंध न केवल माने जाते थे अपितु निर्वहन भी किए जाते थे।
आप जैसे मनीषी से कभी मेरा मिलना नहीं हुआ लेकिन आदरणीय कानसिंहजी चूंडावत की सदाशयता के कारण उनसे दो- तीन बार फोन पर बात हुई। फोन मैंने नहीं लगाया बल्कि उनके आदेशों की पालना में कानसिंहजी ने ही लगाया और कहा कि ‘धोल़ी ठाकर साहब आपसे बात करना चाहते हैं।”
जैसे ही मैं उन्हें प्रणाम करूं, उससे पहले ही एक 92वर्षीय उदारमना बोल पड़ा “हुकम हूं ऊमो! भाभाश्री म्हारा प्रणाम!“[…]

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वीर प्रसूता चारणी

….कहते हुये उनकी आँखें भर आयी, सुनते हुये मेरी भी। फिर कहा, “तुम जानती हो, उसे वीर चक्र मिला। उसने अपना वादा तब भी निभाया। जिस सम्मान का हकदार वो था, मेरे ही हाथों से लिया गया। पीएम के हाथों मेडल लेते हुये मुझे गहरा खालीपन भी दिखता तो गर्व कर जाती। पर मैं क्या करूँ बेटा …तब मुझे देपाल का चेहरा दिख गया …याद आ गया ..सब सूना था ….सब कुछ ही खाली ..। शहीद होकर भी मेरी जिम्मेदारी उम्रभर की उसने ही ले रखी है। पेंशन के पैसे जब भी हाथ में उठाती हूँ, तब-तब गला रुँध जाता है। […]

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