संकरिया सूंडाल़

किरता अपणै हाथ सूं, तोलै सबै करम्म।
सौ सुक्रत इक पाल़णै, एको साम धरम्म।।

ऐड़ो ई एक स्वामीभक्ति रो किस्सो है जुढिया रा लाल़स शंकरजी रो। शंकरजी लाल़स, लाल़स लूणैजी री वंश परंपरा में गोदोजी लाल़स सपूत अर तेजाजी रा पोता हा। जुढियो मा सैणी रो सुथान। जिण विषय में ओ दुहो चावो-

तखत दोनूं तड़ोबड़ै, जुढियो नै जोधाण।
बठै राजावां बैठणो, (अठै) सैणी तणो सुथान।।

लाल़स शंकरजी, महावीर कल्ला रायमलोत रै मर्जीदानां में सींवाणै रैवै। महावीर कल्लो अडर, साहसी अर स्वाभिमानी राजपूत हो। जिणरै विषय में महाकवि पृथ्वीराजजी राठौड़ लिखियो है-कल्लो भल्लो रजपूत कहीतो!![…]

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डिंगल़ गीतां मांय चारण कवेसरां रो सूरापण

इण महाभड़ां रै टाल़ टीकमजी कविया बिराई, लूणोजी रोहड़िया सींथल, हरखोजी नगराजोत मूंजासर, भैरजी मीसण ओगाल़ा, अरजनजी किनिया सुवाप, मेहर दानजी सिंढायच माड़वा, करनीदानजी रतनू लूंबा रो गांम जोधजी बारठ तड़ला, धनजी लाल़स आकली, हणुवंतसिंह पदमावत सींथल़, विसन दानजी खिड़िया आद सतवादियां असत रै खिलाफ तत्कालीन शासक वर्ग द्वारा कियै समाज विरोधी कामां रै प्रतिकार सरूप घणी बहादुरी बताय तेलिया अर कटार कंठां कर जातीय गौरव नै अखी राखियो।
जैसलमेर महारावल़ रणजीतसिंह रै शासनकाल़ में चारणां सूं दाण लेवण रै विरोध में मेहरदानजी सिंढायच आपरो जिको आपाण बतायो बो आज ई चावो है-

जाय जैसाणै ऊपरै, जुड़ियो महिपत जंग।
अमलां वेल़ा आपनै, रेणव महरा रंग।।[…]

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म्हांरै कन्नै देवण नै फगत माथो है!!

सिरोही माथै महाराव केशरीसिंह रो राज। सिरोही राज रा आर्थिक हालात माड़ा। राज री माली हालात सुधारण अर कीं खजानो भरण री जुगत में दरबार कई नवा कर लगाय कर उगरावण रो दबाव बणायो। जिण लोगां नै कर उगरावण री जिम्मेदारी दी, उणां पुराणै कानून कायदां री धज्जियां उडावतां आडैकट उगराई शुरू कर दीनी।

इणी उगराई सारू एक जत्थो मोरवड़ै गांम ई ढूकियो। मोरवड़ा गांम महिया चारणां रो सांसण गांम। सांसण गांम हर प्रकार री लाग सूं मुक्त। आ बात जाणतां थकां ई दरबार रै आदम्यां आय लोगां नै भेल़ा किया अर टैक्स चुकावण री ताकीद करी। गांम रै मौजीज लोगां कैयो कै ओ तो सांसण गांम है! हरभांत री लाग-वाग सूं मुक्त, अठै आप इण पेटै हकनाक आया हो! अठै राज रा कानून नीं अठै म्हांरा ईज कानून चालै। आवणिया ई राज रा आदमी हा, उणां कैयो कै अबै इण भोपा डफरायां में कीं नीं धरियो है, टैक्स सादी सलाह में भरो जणै तो ठीक है नींतर राजरै हुकम सूं म्हांनै लैणो आवै।[…]

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चारणों की आपसी मसखरी ! – राजेंद्र सिंह कविया

एक बार गांव हणूतिया मे आस पङोस के सभी सजातिय व अन्य सज्जनों का एक पर्व पर आने का संयोग हुआ हथाई का मेऴा मंडा चौक के पा स में कुआ बना था उसमें रस्सी से बालटी लगा कर भूणी पर से रस्सी को खेंच कर पाणी निकालने की प्रक्रिया चल रही थी भूणी जिसे चाकला भी कहते हैं आवाज कर रहा था पाणी भरकर बालटी या चङस बाहर आते समय आवाज धीमी व अलग होती है वापसी में खाली चङस वेग से जाता है तो आवाज अलग होती है।

वहां विराजित एक कवि ने प्रस्ताव किया कि सब कवि कल्पना करो किः…..
“यौ चाकलौ कांई कह रैयो छै”[…]

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पितृहंता नरेश नै साच री आरसी दिखावणियो कवि, दलपत बारठ

आज आपां लोकतंत्र में आपां रै बैठायोड़ै प्रतिनिधि नै साच कैवता अर बतावता शंको खावां हां तो आप अंदाजो लगावो कै राजतंत्र री निरंकुशता सूं मुकाबलो करणो कितो खतरनाक हो? पण जिका साच नै साच कैवण री हिम्मत राखै बै डांग माथै डेरा राखै। बै नी तो घणो आबाद रैवण रो कोड करै अर नी उजड़ण सूं भय खावै। ऐड़ो ई एक किस्सो है बारठ दलपत ई़दोकली रो।
उण दिनां मारवाड़ माथै महाराजा अजीतसिंह शासन करै हा। पुख्ता होवण रै छतापण उणां आपरै उत्तराधिकारी अभयसिंह नै राज नी सूंपियो। इण सूं अभयसिंह नै ओ भय रैयो कै किणी कारणवश राज नी मिलियो तो ठीक नी रैवैला। सो कीकर ई राज लियो जावै। उणां आपरै भाई बगतसिंह नै कैयो कै “म्हारो तो हमे राज करण री इच्छा रैयी नी, जे तूं राजा बणणो चावै तो कीकर दरबार नै हटा देअर राजा बणज्या। म्हारी आ सलाह है।” राज रै लालच में आय बगतसिंह आपरै पिता अजीतसिंह नै धोखै सूं मार नाखियां।[…]

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कवि का विलक्षण व लाजवाब उत्तर !

एक बार श्रीमान हिंगऴाजदान जी कविया सेवापुरा को एक सजातिय चारण सरदार ने काव्यात्मक रूप से निम्न स्तर की रचना भेज दी जो कि शोभायमान नहीं थी, उसमें भेजने वाले कवि महोदय का दम्भ अभिमान व अनुशासनहीनता परिलक्षित प्रकट हो रही थी। उसे पहली बार देख कर।

क्षमा बड़न को चाहिए छोटन को उत्पात

के अपने उच्च सिध्दान्त को निर्वहन करते हुए कविया साहब ने क्षमा कर दिया। भेजने वाले कवि ने अपनी मनोदशा में इसे हिंगऴाजदान को डरा हुआ मान लिया व अपने स्वभावगत दूसरी बार फिर निम्नस्तर कविता महाकवि को इंगित करते हुए भेज दी। हिंगऴाजदान जी ने उत्तर देना आवश्यक मान कर उसे जो उत्तर लिख कर भेजा वह आप को लिखकर मैं प्रैषित कर रहा हूँ।

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મોજમાં રેવું – તખ્તદાન રોહડિયા ‘દાન અલગારી’ (ઉદયન ઠક્કર દ્વારા કવિતા નો આસ્વાદ)

મોજમાં રેવું, મોજમાં રેવું, મોજમાં રેવું રે…
અગમ અગોચર અલખધણીની ખોજમાં રેવું રે… મોજમાં રેવું…

કાળમીંઢ પાણાના કાળજાં ચીરીને કૂંપળું ફૂટે રે,
આભ ધરા બીચ રમત્યું હાલે, ખેલ ના ખૂટે રે,
આ લહેર આવે લખલાખ રત્નાકરની લૂંટતા રેવું રે… મોજમાં રેવું

કાળ કરે કામ કાળનું એમાં કાંઈ ન હાલે રે,
મરવું જાણે મરજીવા ઇ તો રમતા તાલે રે,
એનો અંત આદિ નવ જાણ્ય તારે તો તરતા રેવું રે… મોજમાં રેવું

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अजै मेड़तिया मरणो जाणै!!

जद जोधपुर महाराजा अभयसिंहजी बीकानेर घेरियो उण बगत बीकानेरियां जयपुर महाराजा जयसिंहजी नै आपरी मदत सारु कैयो। जयसिंहजी फौज ले जोधपुर माथै चढाई करी। आ बात अभयसिंहजी नै ठाह पड़ी तो उणां बीकानेर सूं जोधपुर जावणो ई ठीक समझियो। जोधपुर उण बगत जयपुर रो मुकाबलो करण री स्थिति में नीं हो। राजीपै री बात तय हुई अर 21लाख जयपुर नै फौज खरचै रा दैणा तय होया, जिणमें 11लाख रो गैणो अभयसिंहजी री कछवाही राणी रो दियो अर बाकी रुपियां मौजीज मिनखां री साख में लैणा किया। जद किणी जयसिंहजी नै कैयो कै “हुकम ओ गैणो तो बाईजी राज रो है अर आप लेय रैया हो!!” जयसिंहजी कैयो कै “अबार ओ गैणो जयपुर री राजकुमारी रो नीं है अपितु जोधपुर री राणी रो है सो ले लियो जावै!!”
समझौतो होयां जयपुरियां री भर्योड़ी तोपां पाछी जयपुर रवाना होई।[…]

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अंतस रा आखर

बात उण टेम री है जद म्हारी बाई (माताजी) आज सूं डेढ साल प्हैली अजुवाळी चवदस रा देशणोक म्हारै नानाणां सूं आप रा दूजा संगी साथी अर संबंधियों रे साथै देशणोक दरसण करवा रवाना हुवी। उण टेम म्है एक दूहौ मन में बणायौ के

ओरण माणस ऊमड्या, फेरी देवा काज।
आयी चवदस आपरी, मेहाई महराज।।

औ दूहौ बणियौ जद म्है औ सोचियौ के इण तरे रा चौथा चरण वाळा दोहा आज तांई किणी नी बणाया है। अर मौलिक चरण री वजह सूं अगर कोशिश करी जाय तो नामी फूटरा दूहा बण सके। इण रे बाद मां भगवती मेहाई री किरपा सूं एक पछै एक दुहा बणता गिया। म्है ऐ दुहा म्हारा सोसियल मिडिया रा ग्रुप “डिंगळ री डणकार” अर “थार थळी” मैं लगातार एक पछै एक पोस्ट करतौ रियौ।[…]

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प्रस्तावना

राजस्थान री धरा सूरां पूरां री धरा। इण धरा रे माथे संत, सती, सूरमा, सुकवि अर साहुकारां री ठावकी परंपरा रेयी है। जग रे पांण राजस्थान आखै मुलक में मांण पावतो अर सुजस लेवतो रेयौ है। डॉ शक्तिदान जी कविया रे आखरां में-

संत, सती अर सूरमा, सुकवि साहूकार।
पांच रतन मरूप्रांत रा, सोभा सब संसार।।

इण मरू रतनां रे सुजस री सोरम संचरावण वाळौ अठेरो साहित पण सजोरो। शक्ति, भक्ति अर प्रकृति रो त्रिवेणी संगम। शक्ति जाति वीरता रो वरणाव वंदनीय तो प्रकृति सूं प्रेम पढण वाळै नें हेम करे जेडौ तो इणी गत भक्ति काव्य भक्त ह्रदय सूं निकळण बाळी गंगधार। इणी गंग धार में नहाय आपरे जीवण रो सुधार करण रा जतन करणिया अठे रा कवेसर पूरै वतन में निकेवळी ओळखाण राखै। भक्ति काव्य री परंपरा घणी जूनी अर जुगादि। राम भक्ति काव्य कृष्ण भक्ति काव्य रे साथै साथै अठै तीसरी भक्ति धारा ई संपोषित ह्वी अर समान वेग सूं चाली। अर बा है देवी भक्ति काव्य धारा।[…]

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