આઈ સુંદર આઈ નો પ્રસંગ – પીંગળશીભાઇ.મેધાણંદભાઇ.ગઢવી

🌹🌹 આઇ સુંદરબાઇ માતાજી🌹🌹
🌹 દીકરી આઇ સતબાઇ માતાજી 🌹

અફીણના વાઢ જેવી સોરઠ ધરામાં ભાદર નદીના દખણાદા કાંઠા ઉપર ધૂળિયા ટીંબા માથે છત્રાવા નામનું ગામડું.આ ગામની સીમમાં ઉપરવાસના પ્રદેશમાંથી જમીનનો બધો રસક્સ ચોમાસાનો છેલપાણીના પ્રવાહ સાથે ઢસડાઇને અહીં ઠલવાય છે અને અહીંનો કાપ દરિયા ભેળો થાય છે.[…]

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दासोड़ी मीठो दरियाव!!

लारलै सईकै रै सिरै डिंगल़ कवियां में बगतावरजी मोतीसर रो नाम चावो है। बगतावरजी रो जनम गांम सींथल़ में होयो। मोतीसर चारणां रै सारु पूजनीक अर श्रद्धेय जात। लच्छीरामजी बारठ (गोधियाणा)रै आखरां में-

ज्यांसूं भेद कदै नह जांणूं,
हर कर आंणूं चीत हुलास।
मावल भला बणाया मांगण,
आयां आंगण हुवै उजास।।

बगतावरजी आपरी बगत रा नामी डिंगल़ कवि। जिणां री करणी सुजस प्रकास, पाबू गुण प्रकास, गंगेस रो गौरव, सेति मोकल़ी रचनावां चावी।
बगतावरजी रो गांम दासोड़ी में घणो आघमान। एकर बगतावरजी मेवाड़ गया। ढोकलिया ढूका उठै दो चार दिन रैया। पाछा आपरै गांम संभिया जणै दधवाड़ियां कैयो कै अबै आप डोढ दो महीणा अठै ई विराजो क्यूंकै इतरै दिनां पछै कविराज री बाईसा री शादी है अर जान जोधपुर कविराजजी रै अठै सूं आवैली।[…]

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वैर सगतो किनियो लेवैला!!

एक किस्सो है ‘किनियां री बस्ती’ (किनियां रो गांम, बीकानेर) रो। घणै वरसां पैली किनियां री बस्ती रा चेलोजी किनिया आपरै घोड़े चढिया खेतां सूं गांम कानी जावती बगत आपरो घोड़ो एक नाडियै माथै पावण लागा तो उणां नै अचाणचक एक ओपरी छाया दीसी।

विशालकाय छाया मिनख वाणी में बोली कै ‘चेला तूं लांठो मिनख है भाई ! म्हनै पाणी पा ! वरसां सूं तिस मर रैयो हूं !’

एकर तो चेलेजी रै समझ में नीं आई पण दूजै पल बे समझग्या कै कोई भूता चाल़ो है। चेलोजी बिनां डरियां बोलिया ‘ओ नाडियो थारै आगे पड़ियो, पीवै नीं पाणी। कुण हाथ झालै ?’

‘म्हैं इंयां पाणी नीं पी सकूं, पाणी तो तूं पगां हेठकर फेंकेला जद म्हैं पी सकूंला। ‘ बा छाया बोली।[…]

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ज्यूं-ज्यूं लाय लपरका मारे!!

500-1000 के पुराने नोटों के नहीं चलन की घोषणा के बाद मजदूरों, व अध्यापकों के सिवाय सभी जगह मायूसी छाई नजर आ रही है। आजसे पहले जब धन या धनवानों पर अध्यापकों की दृष्टि जाती तो वे भी झिझक महसूस करते थे कि काश हम भी इनके रिस्तेदार या रिस्तेदारी में होते तो कितना अच्छा रहता ! लेकिन जैसे ही मोदीजी ने कहा कि कोयलों की दलाली करने वालों के हाथ ही नहीं, मुंह भी काला होगा !! तो इस वर्ग ने बड़ी राहत महसूस की और मन ही मन में कहा कि भई हम तो ‘घणो खावां न को कुवेल़ा जावां।’ घाटा भी सुखदायक और आनंदित करने वाला होता है इसका अहसास माननीय मोदीजी ने करवाकर मजदूरों व अध्यापकों में जोश का संचार कर दिया। […]

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म्है देता कै लेता ?

मेवाड़ रै महाराणा जगतसिंह जी रै भरियै दरबार में आय खारोड़ा (अमरकोट, सिंध) रा चारण नेतसी देथा अर खेतसी देथा महाराणा नैं मुजरो कियो अर अरज करी कै ‘म्हें तीन घोड़ा लाया हां।’ दरबार पूगतो सम्मान देय आपरै राजकवि रै समरूप सम्मानित खेमसूरजी सौदा सूं ओल़खाण कराई। खेमसूरजी मेवाड़ रै महाराणा रा मानीता कवि। हाथ में स्वर्ण जड़ित चुटियो राखै। कोई पण चारण उणांं सूं जंवारड़ा करण नैं हाथ आगो करतो तो खेमसूरजी आपरा हाथ नीं मिलाय र आपरी चुटियो उण चारण रै हाथ सूं लगायर आपरो मोटापणो दरसावता, अर चारण ई महाराणा रा मानैतड़ अर मोटा मिनख मानर आपरा हाथ चुटियै रै लगायर जंवारड़ां रो संतोष मानता।[…]

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वीर मेहा मांगल़िया संबंधी भ्रामक धारणाएं व निराकरण

पाबू हरभू रामदे, मांगल़िया मेहा।
पांचू पीर पधारिया, भड़ गोगा जेहा।।

इस लोक रसना पर अवस्थित दोहे में मध्यकालीन पांच जननायकों के सुयश की सौरभ गांव-गांव, ढाणी-ढाणी में अपनी सुवास लिए आज भी संचरित हो रही है। उल्लेखनीय यह बात है कि गोगाजी, पाबूजी, रामदेवजी, आदि का जहां प्रामाणिक जीवन परिचय यहां की ख्यातों, बातों, लोक काव्य व डिंगल काव्य में उपलब्ध है वहीं मेहाजी मांगलिया का जीवन परिचय बातों, ख्यातों व लोक काव्य में कम ही प्राप्त होता है, परंतु डिंगल काव्य में जरूर मिलता है लेकिन वो भी प्रचुर मात्रा में नहीं। यही कारण है कि इस जननायक के विषय में जितना भी लिखा गया उसमें इनसे संबंधित जानकारी नहीं देकर मेहराज सांखला से संबंधित जानकारी दी जाती रही है। मेहाजी मांगलिया पर लिखने वाले तमाम लेखकों ने कमोबेश आम पाठक के मन मे यह भ्रामक धारण सुदृढ़ करने का काम किया कि मेहराज सांखला ही मेहा मांगलिया के नाम से प्रसिद्ध हुए हैं। मेहाजी मांगलिया अपने समय के उदार क्षत्रिय, वीर पुरुष, और प्रणवीर थे। राजस्थान के महान पांच जननायकों अथवा ‘पंच पीरों’ की अग्र पंक्ति के लोकमान्य नायकों में शुमार हैं, ऐसे में आम पाठक को इनकी सही और प्रामाणिक जानकारी होनी ही चाहिए, इसी बात को दृष्टिगत रखते हुए इनकी जानकारी देना समीचीन रहेगा।[…]

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हुकम!ओ ई चंदू रो भतीजो है!!

कोई पण जिण रेत में रमै अर जिण कुए सूं काढ पाणी पिवै उणरो असर कदै ई जावै नीं। इणगत रा पुराणा दाखला आपांरी मौखिक बातां अर ख्यातां में पढण अर सुणण नै मिल़ै। ऐड़ी ई एक रेत अर पाणी रै असर री मौखिक कहाणी सुणणनै मिल़ै जिकी आप तक पूगती कर रैयो हूं। ठिरड़ै (पोकरण) रो गाम माड़वो आपरी वीरत अर कीरत रै पाण चारण समाज में ई नीं अपितु दूजै समाजां में चावो रैयो है। इणी धरा माथै हिंगल़ाज सरूपा देवल रो जनम होयो तो देवल सरूपा चंदू माऊ जनमी, जिणरै कोप सूं पोकरण ठाकुर सालमसिंह मरियो-

जमर चंदू थूं जल़ी, तैंसूं कूण त्रिसींग।
पोढी हंदो पाटवी, सोख्यो सालमसींग।
चंदूबाई परचो चावो रे, आयल म्हारै हेलै आव।।
~~जगमालजी मोतीसर

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आप गिनायत हो! नीतर मांगता सो हाजर

कवि अर कविता री कूंत रो अद्भुत प्रसंग

किणी कवि कविता नै संबोधित करतां कविता नै चारणां रैअठै हालण रो सटीक कारण बतायो है, कै चारण प्राकृतिक रूप सूं काव्य रा प्रेमी होवै सो कविता अधूरी है तो पूरी करावैला अर जे पूरी है तो मुक्तकंठ सूं प्रशंसा करेला-

हाल दूहा उण देसड़ै, जठै चारण बसै सुजाण।
करै अधूरा पूरती, पूरां करै बखाण।।

ऐड़ो ई एक काव्य प्रेम रो अजंसजोग प्रसंग है ऊजल़ां रै गुलजी ऊजल़ (गुलाबजी) रो। ठिरड़ै रो गाम ऊजल़ां आपरी साहित्यिक अर सांस्कृतिक विरासत रै पाण चावो रैयो है। मोगड़ा रा संढायच गोपालजी रै तीन बेटा 1रानायजी 2सोढजी 3ऊदलजी (शायद ऊदलजी रो ई नाम ऊजल़जी होवैला) इणी ऊदलजी री वंश परंपरा में लालैजी नोखावत नै गोविंद नारावत ऊजलां गाम सांसण इनायत कियो। इणी गौरवशाली वंश परंपरा में[…]

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जैतो-कूंपो, मरग्या कै जीवै!!? (जनता रै अद्भुत विश्वास री कहाणी)

मारवाड़ नर-नाहरां री खाण रैयो है। एक सूं एक सूरवीर, सधीर, अर गंभीर नर पुंगव अठै जनमियां, जिणां रै पाण ओ कैताणो चावो होयो कै ‘मारवाड़ नर नीपजै, नारी जैसलमेर।’ राव रिड़मलजी री ऊजल कुल़ परंपरा में बगड़ी री बांकी धरा रा सपूत जैतो अर कूंपो आपरै अदम्य आपाण (साहस) निडरता, देशभक्ति, स्वामीभक्ति अर उदारता रै ताण मुलक में जिको माण पायो बो अपणै आप मे अतोल है। राव रिड़मलजी रै मोटै बेटे अखैजी रै बेटे पंचायण रै घरै जैता रो अर छोटे बेटे महराज रै घरै कूंपा रो जनम होयो। जद कूंपो 11वर्षां रो हो जद वि.सं.1570 में गायां रै हेत महावीर महराज रणखेत रैयो, जिणरी साख रा डिंगल़ में गीत उपलब्ध है। कवि भरमसूरजी रतनू लिखै कै पांडव श्रेष्ठ किसन रै अंतेवर (जनाना) री रुखाल़ी नीं कर सकियो अर मरण सूं डरग्यो जदकै गायां री रुखाल़ी सारु महावीर महराज वीरगति वरी-

पांडव मरै न सकियो भिड़ि भुंई, रूकै चढै मुवौ राठौड़।
किसन तणी अंतेवरि कारणि, महिर धेन काज कुल़ मौड़।।[…]

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सांस्कृतिक संबंधां रो साकार सरूप ठाकुर नाहरसिंहजी जसोल

राजस्थानी रा सिरै कवि रायसिंहजी सांदू मिरगैसर आपरी रचना “मोतिया रा सोरठा” में ओ सोरठो जिण महामनां नै दीठगत राखर लिखियो उणां में नाहरसिंहजी हर दीठ सूं खरा उतरै-

राखै द्वेष न राग, भाखै नह जीबां बुरो।
दरसण करतां दाग, मिटै जनम रा मोतिया।।

किणी मध्यकालीन कवि ठाकुर सुरतसिंह री उदार मानसिकता नै सरावतां कितो सटीक लिखियो हो-

सुरतै जिसै सपूत, दिस दिस मे हिक हिक हुवै।
चारण नै रजपूत, जूना हुवै न च्यारजुग।।

आज जद आपां नाहरसिंहजी जसोल नै देखां तो बिनां किणी लाग लपट उण मध्यकालीैन क्षत्रिय मनीषियां री बातां अर अंजसजोग काव्य ओल़ियां याद आ जावै जिकी इणां चारण कवियां री स्वामी भक्ति, सदाचरण, साहित्य रै प्रति समर्पण, सांस्कृतिक चेतना, सत्य रो समर्थन साच कैवण रो साहस अर सही सलाह रै उदात्त गुणां नै देखर कैयी।[…]

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