राष्ट्राराधना का गौरवमय काव्य: क्रांतिकारी केहर केसरी

“इदम् राष्ट्राय, इदम् न ममः” की अमर सूक्ति को यत्र-तत्र-सर्वत्र सुनने-सुनाने का सुअवसर पाकर भी हम अपने आपको धन्य मानते हैं लेकिन असल में उन हूतात्माओं का जीवन धन्य है, जिन्होंने इस महनीय आदर्श को अपने जीवन एवं आचरण से चरितार्थ किया है। राष्ट्रहितार्थ अपना सर्वस्व न्योच्छावर करके भावी पीढ़ी के लिए मिसाल कायम करने वाले असंख्य प्रातःस्मरणीय भारतीय चरित्रों में से एक अति विशिष्ट चरित्र है- क्रांतिकारी केसरीसिंह बारहठ। वीर वसुंधरा के विरुद से विभूषित भरतभूमि का इतिहास ऐसे असंख्य वीरों के शौर्य की गाथाओं से परिपूर्ण है, जिनको स्मरण करके हर भारतीय को गौरव की अनुभूति होती है।[…]

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रहसी रै सुरताणिया!

वीरता अर वीर आज ई अमर है तो फखत कवियां या कविता रै पाण। क्यूंकै कवि री जबान माथै अमृत बसै अर उण जबान माथै जिको ई चढ्यो सो अमर हुयो। भलांई उण नर-नाहरां रो उजल़ियो इतियास आज जोयां ई नीं लाधै पण लोकमुख माथै उण सूरां रो सुजस प्रभात री किरणां साथै बांचीजै।

ऐड़ो ई एक वीर हुयो सुरताणजी गौड़। हालांकि कदै ई गौड़ एक विस्तृत भूभाग माथै राज करता पण समय री मार सूं तीण-बितूण हुय थाकैलै में आयग्या।

इणी गौड़ां मांय सूं ई ऐ सुरताणजी गौड़ हा।[…]

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प्रीत पुराणी नह पड़ै

हिंदी-राजस्थानी के युवा प्रखर कवि व लेखक डॉ.रेवंतदान ‘रेवंता’ की आदरणीय डॉ.आईदानसिंहजी भाटी पर सद्य संस्मरणात्मक प्रकाशित होने वाली पुस्तक के लिए ‘फूल सारू पांखड़ी’—-

मैं यह बात बिना किसी पूर्वाग्रह के कह रहा हूं कि राजस्थानी लिखने वाले तो ‘झाल’ भरलें उतने हैं परंतु नवपौध को सिखाने वालों की गणना करें तो विदित होगा कि ये संख्या अंगुलियों के पोरों पर भी कम पड़ जाए। या यों कहें तो भी कोई अनर्गल बात नहीं होगी कि राजस्थानी में उन लेखकों की संख्या पांच-दस में ही सिमट जाती हैं जिनसे नई पीढ़ी प्रेरित होकर उनका अनुसरण करें।[…]

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मूऴजी करमसोत रो मरसियो – लाऴस उमरदानजी रो कह्यौ

गाँव धणारी के राठौड़ मूऴजी करमसोत, जोधपुर महाराजा जसवन्तसिंह द्वितीय के समय नागौर के हाकिम थे, वे बहुत उदारमना एंव काव्य-प्रेमी तथा चारणों का अति-विशिष्ठ सम्मान करने वाले व्यक्ति थे। उन्हे नागौर किले में गड़ा हुआ धन मिला था, अतः उन्होने अपनी दाढी छंटाने के उत्सव पर 151 ऊँट तत्कालीन प्रसिध्द चारण कवियों को भेंट-स्वरूप उनके घर पर भेजे थे। “वीरविनोद” (कर्णपर्व) के रचयिता महाकवि स्वामी गणेशपुरीजी महाराज ने भी इस दानवीर की प्रशंसा में यह दोहा कहा था-

।।दोहा।।
सांगै री कांबऴ सही, हाड दाधिच कहाय।
करहा मूऴ कमंध रा, जातां जुगां न जाय।।[…]

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कहाँ वे लोग कहाँ वे बातें (गाँव सींथल का एक वृतांत) – सुरेश सोनी (सींथल)

आज आपके सींथल का एक वृतान्त पेश करता हूं –
सींथल गांव किसी भी कालखंड में परिचय का मोहताज नहीं रहा है, क्योंकि हर युग ने इस गांव की उर्वरा भूमि पर प्रतिभावानों, बुद्धिमानों, व्यापारियों, समर्थों व श्रेष्ठों की उत्पत्ति मन लगाकर की है।
यहां के हजारों किस्से बीकानेर, शेखावाटी, मारवाड़ व मेवाड़ तक के गांवों की हथाइयों में आज भी कहे जाते हैं और उन किस्सों के नायक आज भले ही इतिहास के अंग बन गए हैं, मगर लोगों की जुबानों पर आज भी भली-भांति जिन्दा हैं।
बात उस जमाने की है, जब मेरा तो जन्म भी नहीं हुआ था। गांव के किसरावतों के बास में रहने वाले कालूदानजी ‘बडोजी’ गांव के मौजीज आदमी हुआ करते थे।[…]

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पुस्तक-प्रेम, पुस्तकालय-संस्कृति एवं पठनीयता के समक्ष चुनौतियां

विगत दिनों किसी मित्र ने बताया कि उसका पुत्र अंग्रेजी माध्यम के विद्यालय एवं महाविद्यालय से शिक्षा ग्रहण करके अभी अमेरिका में “व्यक्तित्व-विकास” की कक्षाएं लगाता है, जिनमें हजारों विद्यार्थी आते हैं। वहां बौद्धिक के साथ-साथ शारीरिक विकास हेतु सूक्ष्म-योगा भी करवाया जाता है। कक्षा प्रारंभ होने के समय एक युवती, जो कोई पुस्तक पढ़ रही थी, योग हेतु लगाई गई चटाई पर आने से पहले उसने अपने जूते उतारे तथा उस पुस्तक को अपने जूतों पर ही उलटा रख दिया ताकी वापस आने पर वहीं से पुनः पढ़ना प्रारंभ कर दे। कक्षा में सभी विद्यार्थी अमेरिकी थे, बस योग-शिक्षक भारतीय था। जैसे ही उस भारतीय की दृष्टि जूतों पर रखी पुस्तक पर पड़ी तो वो दौड़ कर गया और पुस्तक को उठाया। उसे सीस झुका कर प्रणाम किया तथा ससम्मान मेज पर रखा। जैसे ही विद्यार्थियों से मुखातिब हुआ तो उस लड़की ने आश्चर्य से पूछा “सर! यह क्या कर रहे हैं आप?[…]

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श्री इंन्द्रबाईसा अन्दाता के जन्म-दिवस पर – राजेन्द्रसिंह कविया संतोषपुरा सीकर

संम्वत गुनी’सै त्रैसटियां, साणिकपुर सामान।
शुकल पक्ष आसोज मे, श्री हिंगऴाज सुथान।।

चराचर जगत की हलचल की हर भांति की गतिविधियां अपने अपने नियत निर्धारित परिसंचरण तंत्राधिन सक्रिय सहयोग कर ब्रह्माण्ड संचालन में परम सत्ता के प्रति उत्तरदायित्व का परिपोषण करती है। इसी नियम से ही आसुरी शक्तियों के उद्भव को पराभूत पराजित करने के लिए श्रृष्टि चक्र मे अवतार अवतरण की सनातन परम्परा चलती आ रही है, जिसमें शक्ति अवतार की श्रृंखला भी समय समय पर सदा-सर्वदा चलती रही है।[…]

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जद छूटै जालोर!

दूहा लोहा सरिस दुहुं, वडौ भेद इक एह।
दूहो वेधै चित्त नै, लोहा भेदे देह।।

यानी दोहा अर लोहा री मार एक सरीखी। एक चित्त नै वेधै तो दूजो देह नै। पण लोह तो हरएक रै घाव कर सकै पण दूहो फखत समझै उणनै ईज सालै। इतिहास में ऐड़ा अनेकूं दाखला मिलै कै दूहे इतिहास बदल़ दियो। लोगां री दिनचर्या बदल़दी।[…]

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पाण्डुलिपि संरक्षण – कवि गंगाराम जी बोगसा

गंगारामजी बोगसा महाराजा तखतसिंह जी जोधपुर के समकालीन व डिंगल़ के श्रेष्ठतम कवियों में से एक थे। खूब स्तुतिपरक रचनाओं के साथ अपने समकालीन उदार पुरुषों पर इनकी रचनाएं मिलती है। आज जोधपुर में मेरे परम स्नेही महेंद्रसा नरावत सरवड़ी जो पीएचडी के छात्र व अच्छे कवि भी हैं। ये पांडुलिपियां लेकर हथाई करने आए। महेंद्रसा, गंगारामजी के चौथी पीढ़ी के वंशज हैं। अपने पर-पितामह की पांडुलिपियों का संरक्षण कर रहे हैं।[…]

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कविता रो प्रभाव

दूहो दसमो वेद,
समझै तैनै साल्है।

काव्य मर्मज्ञां दूहै नै दसमे वेद री संज्ञा दी अर कह्यो कै ओ फखत उणरै काल़जै नै ईज छूवै जिको इणरो मर्म जाणतो हुवै !नीतर आंधै कुत्तै खोल़ण ही खीर वाल़ी बात है। जिणांरै सातै सुआवड़ी हुवै उणांरै दूहे रो मर्म नैड़ैकर ई नीं निकल़ै पण जिकै रै नैड़ैकर निकल़ै, उणनै ओ चित नै चकित करै तो साथै ई चैन ई देवै। आ ई नीं ओ उणरै दिल में दरद उपावै तो साथै ई दवा पण करै-

दूहो चित चक्रित करै, दूहो चित रो चैन।
दूहो दरद उपावही, दूहो दारू ऐन।।[…]

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