चार लाख रु. का लालच भी नहीं भुला सका मित्र की यादें

जैसलमेर के रावत लूणकरणजी की पुत्री उमा दे का विवाह जोधपुर के राव मालदेव से हुआ था। दहेज में उमा दे के साथ उनकी दासी भारमली भी जोधपुर आ गयी। भारमली रुप-लावण्य तथा शारीरिक-सौष्ठव में अप्सराओं जैसी अद्वितीय थी।  विवाहोपरान्त मधु-यामिनी के अवसर पर राव मालदेव को रंगमहल में पधारने का अर्ज करने हेतु गई दासी भारमली के अप्रतिम सौंदर्य पर मुग्ध होकर मदमस्त राव जी रंगमहल में जाना बिसरा भारमली के यौवन में ही रम गये। इससे राव मालदेव और रानी उमा दे में “रार” ठन गई, रानी रावजी से रुठ गई। यह रुठन-रार जीवनपर्यन्त रही, जिससे उमा दे “रुठी राणी” के […]

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कविता की करामात

कवि अपनी दो पंक्तियों में भी वह सब कह देता है जितना एक गद्यकार अपने पुरे एक गद्य में नहीं कह पाता, राजा महाराजाओं के राज में कवियों को अभिव्यक्ति की पूरी आजादी हुआ करती थी और वे कवि अपने इस अधिकार का बखूबी निडरता से इस्तेमाल भी करते थे।चारण कवि तो इस मामले बहुत निडर थे राजा कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो उसकी गलत बात पर ये चारण कवि अपनी कविता के माध्यम से राजा को खरी खरी सुना देते थे।शासक वर्ग इन कवियों से डरता भी बहुत था कि कहीं ये कवि उनके खिलाफ कविताएँ न बना […]

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कवि की दो पंक्तियाँ और जोधपुर की रूठी रानी

इतिहास में रूठी रानी के नाम से प्रसिद्ध जैसलमेर की उस राजकुमारी उमादे जो उस समय अपनी सुन्दरता व चतुरता के लिए प्रसिद्ध थी को उसका पति राव मालदेव जो जोधपुर के इतिहास में सबसे शक्तिशाली शासक रहा ने क्या कभी उसे मनाने की कोशिश भी की या नहीं और यदि उसने कोई कोशिश की भी तो वे क्या कारण थे कि वह अपनी उस सुन्दर और चतुर रानी को मनाने में कामयाब नहीं हुआ। रूठी रानी उमादे की दासी भारमली के चलते ही रानी अपने पति राव मालदेव से रूठ गई थी। शादी में रानी द्वारा रूठने के बाद राव […]

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बांका पग बाई पद्मा रा

राजस्थान में एक कहावत है “बांका पग बाई पद्मा रा” अर्थात यदि आपको किसी बात पर किसी व्यक्ति पर पूरा शक है कि ये गलती इसी की है तो कह दिया जाता “बांका पग बाई पद्मा रा” अर्थात कसूर तो इसका ही है। संदर्भ कथा – आज से कोई चार सौ वर्ष पहले मारवाड़ राज्य के एक गांव में मालाजी सांदू नाम के एक बारहठ जी रहते थे उनके एक पद्मा नाम की बहन थी। राजस्थान में चारण जाति के लोग हमेशा से बहुत बढ़िया कवि रहे है। पद्मा भी बहुत अच्छी कविताएँ कहने में माहिर थी एक अच्छी कवियत्री होने […]

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कविराज करणीदान कविया

जयपुर नरेश जयसिंह व जोधपुर के महाराजा अभय सिंह तीर्थ यात्रा पर पुष्कर पधारे थे, दोनों राजा पुष्कर मिले और अपना सामूहिक दरबार सजाया, दरबार में पुष्कर में उपस्थित दोनों के राज्यों के अलावा राजस्थान के अन्य राज्यों से तीर्थ यात्रा पर आये सामंतगण शामिल थे, दरबार में कई चारण कवि, ब्राह्मण आदि भी उपस्थित थे, दोनों राजाओं के चारण कवि अपने अपने राजा की प्रशंसा में कविताएँ, दोहे, सौरठे सुना रहे थे, तभी वहां एक कवि पहुंचे जो निर्भीकता से अपनी बात कहने के लिए जाने जाते थे। महाराजा अभयसिंह जी ने कवि का स्वागत करते कहा – बारहठ […]

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कवि ने सिर कटवाया पर सम्मान नहीं खोया

अक्सर लोग चारण कवियों पर आरोप लगा देते है कि वे राजपूत वीरों की अपनी रचनाओं में झूंठी वीरता का बखाण करते थे पर ऐसा नहीं था| राजपूत शासन काल में सिर्फ चारण कवि ही ऐसे होते थे जो निडर होकर अपनी बात अपनी कविता में किसी भी राजा को कह डालते थे| यदि राजा ने कोई भी गलत निर्णय किया होता था तो उसके विरोध में चारण कवि राजा को हड़काते हुए अपनी कविता कह डालते थे| ऐसे अनेक उदाहरणों से इतिहास भरा है | ऐसा ही एक उदाहरण यहाँ प्रस्तुत है जो जाहिर करता है कि चारण कवि […]

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कविराजा श्यामल दास

महामहोपाध्याय कविराजा श्यामलदास के पूर्वज मारवाड़ के मेड़ता परगने में दधिवाड़ा ग्राम के रहने वाले देवल गोत्र के चारण थे। इस गांव में रहने के कारण ये दधिवाड़िया कहलाये। इनके पूर्वज जैता जी के पुत्र महपा (महिपाल) जी को राणा सांगा ने वि.स. 1575 वैशाख शुक्ला 7 को ढोकलिया ग्राम सांसण दिया जो आज तक उनके वंशजों के पास है। महपाजी की ग्यारहवीं पीढ़ी में ढोकलिया ग्राम में वि.सं. 1867 के जेष्ठ माह में कम जी का जन्म हुआ। बड़े होने पर वे उदयपुर आ गये। वे महाराणा स्वरूपसिंह व शम्भुसिंह के दरबार में रहे जहां उन्होंने दोनों राणाओं से […]

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स्वाभिमानी कवि नरुजी बारहट का आत्म बलिदान

दिल्ली पर बादशाह ओरंगजेब का राज था।  औरंगजेब बहुत ही कट्टर शासक हुआ।  जिसके राज्य में हज़ारों मंदिरों को तोड़ कर मस्जिदों में बदल दिया गया। इससे भी संतुष्टि नहीं हुई तो औरंगजेब ने विक्रम संवत 1736 की वैशाख सुदी द्वितीया (2 अप्रैल 1679) को एक फरमान जारी कर के हिन्दुओ पर जजिया नामक कर लगा दिया। वह कर बड़ी ही कठोरता से वसूल किया जाने लगा,  जिसके फलस्वरूप अन्दर ही अन्दर हिन्दू प्रजा में इसके विरोध में आग सुलगने लगी, पर खुले रूप में इसका विरोध करने का साहस किसी ने नही किया।  इस विकट परिस्थिति में महाराणा राजसिंह प्रथम ने पहल करते हुए जजिया के विरोध में एक पत्र […]

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जब ठाकुर साहब ने की कविराज की चाकरी

संवत १७४० के आसपास मेवाड़ के सूळवाड़ा नामक गांव में चारण जाति के कविया गोत्र में कवि करणीदान जी का जन्म हुआ वे राजस्थान की डिंगल भाषा के महाकवि तो थे ही साथ ही पिंगल, संस्कृत व ब्रज भाषा के भी विद्वान थे इन भाषाओँ में उन्होंने कई ग्रन्थ लिखे। उनके लिखे “सुजस प्रकास” व “बिडद सिणगार” ग्रन्थ बहुत ख्यात हुए। उस जमाने में लोगों के जातिय ढोंग व आचरण देख उन्होंने “जतोरासो” नामक ग्रन्थ लिखा जिसमे समाज के ऊपर तीखे कटाक्ष थे, पर एक साधू के कहने पर वो ग्रन्थ उन्होंने खुद ही जला डाला। उस वक्त की राजनीती […]

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निर्भीक कवि और शक्तिशाली सर प्रताप

सर प्रतापसिंह जी जोधपुर के महाराजा तख़्तसिंह जी के छोटे पुत्र थे, वे जोधपुर के राजा तो नहीं बने पर जोधपुर राज्य में हुक्म, प्रतिष्ठा और रोबदाब में उनसे आगे कोई नहीं था। उनके जिन्दा रहते जोधपुर के जितने राजा हुए वे नाम मात्र ही थे असली राज्य सञ्चालन तो सर प्रताप ही करते थे थे वे जसवंतसिंह जी से लेकर महाराजा उम्मेदसिंह जी तक जोधपुर के चार राजाओं के संरक्षक रहे। जर्मनी के युद्ध में उन्हें अदम्य वीरता दिखा बहुत नाम कमाया था। सर प्रताप खुद अनपढ़ थे पर मारवाड़ राज्य में उन्होंने शिक्षा व समाज सुधर के लिए […]

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