गद्दार तुम्हारी खैर नहीँ जो हमसे पंगा मोल लिया

मानव होकर जो पशुओं का चारा तक खा जाते हैं,
नेकी को नाचीज़ समझकर दूर बिठाकर आते हैं,
जिनके दिल से संवेदन के तारों का संपर्क कटा,
जो लाचारों की आहों पर सेंक रोटियां खाते हैं।

इस धरती पर आने वाले वहीँ लौटकर जाएंगे,
गाड़ी, बंगले, सोना, चांदी पीछे ही रह जाएंगे,
विकलांगों की वैशाखी से काला माल कमाने वाले,
तेरी कब्र खोदने हम सब बिना मजूरी आएंगे।[…]

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माटी थनै बोलणौ पड़सी – कवि रेवतदान चारण

मूंन राखियां मिनख मरैला।
धरती नेम तोड़णौ पड़सी।।
करणौ पड़सी न्याय छेड़लौ, माटी थनै बोलणौ पड़सी।

कुण धरती रौ अंदाता है, कुण धरती रौ धारणहार ?
कुण धरती रौ करता-धरता, कुध धरती रै ऊपर भार ?
किण रै हाथां खेत-खेत में, लीली खेती पाकै है ?
किण रै पांण देष री गाड़ी, अधबिच आती थाकै है ?
कहणौ पड़सी खरौ न खोटौ, सांचौ भेद खोलणी पड़सी।।
माटी थनै बोलणौ पड़सी।
मूंन राखियां मिनख मरैला।
धरती नेम तोड़णौ पड़सी।।[…]

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पितृहंता नरेश नै साच री आरसी दिखावणियो कवि, दलपत बारठ

आज आपां लोकतंत्र में आपां रै बैठायोड़ै प्रतिनिधि नै साच कैवता अर बतावता शंको खावां हां तो आप अंदाजो लगावो कै राजतंत्र री निरंकुशता सूं मुकाबलो करणो कितो खतरनाक हो? पण जिका साच नै साच कैवण री हिम्मत राखै बै डांग माथै डेरा राखै। बै नी तो घणो आबाद रैवण रो कोड करै अर नी उजड़ण सूं भय खावै। ऐड़ो ई एक किस्सो है बारठ दलपत ई़दोकली रो।
उण दिनां मारवाड़ माथै महाराजा अजीतसिंह शासन करै हा। पुख्ता होवण रै छतापण उणां आपरै उत्तराधिकारी अभयसिंह नै राज नी सूंपियो। इण सूं अभयसिंह नै ओ भय रैयो कै किणी कारणवश राज नी मिलियो तो ठीक नी रैवैला। सो कीकर ई राज लियो जावै। उणां आपरै भाई बगतसिंह नै कैयो कै “म्हारो तो हमे राज करण री इच्छा रैयी नी, जे तूं राजा बणणो चावै तो कीकर दरबार नै हटा देअर राजा बणज्या। म्हारी आ सलाह है।” राज रै लालच में आय बगतसिंह आपरै पिता अजीतसिंह नै धोखै सूं मार नाखियां।[…]

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कवि की पहचान!!

कवियन के सिरताज, भूप के सदा प्रिय,
उकती उटीपी अहो धरा यश जानिये।
किसी की न परवाह बे चाह रहै सदाई,
वरदाई शारद के गावै गुनगानिये।
महाजन से मान देसोतन के सम कहो,
चहुंदिस वंदनीय मनो गुणखानिये।
दंभ नहीं द्वेष नहीं राग -अनुराग नहीं,
गिरधर सौभाग ऐसे महाकवि मानिये।।[…]

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रीत-नीत तज राड़ करै

रीत-नीत तज राड़ करै,
बाखळ में ऊभ बोबाड़ करै,
परिवार दुखी वां पूतां सूं,
कुळ नै रिगदोळ कबाड़ करै।
सावळ कावळ रो भान नहीं,
कुळ गौरव रो अभिमान नहीं,
लालच रै लपकां लाग्योड़ा,
ऐ गिणै कोई अहसान नहीं।[…]

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बाळपणो बर-बर बतळावै – हेत-हथायां हमैं कठै

“छाती दुखै, गोडा दुखै; छाती दुखै, गोडा दुखै” इण ओळी नैं होळै-होळै बोलतां-बोलतां बां इयांकली गड़कै चाढ़ी कै आखती-पाखती बैठा लोगड़ां री बाक फाटगी। मूंढ़ै सूं आवाज निकाळणै रै साथै-साथै बै आपरै डील अर हाथ-पगां नैं ई इयां संचालित करै हा जाणै कोई सावचेती सूं कीं काम नैं सिग चाढ़तो हुवै। सगळा सोचण लाग्या डोकरां रै हुयो कांई ? अेको सांस “छाती दुखै, गोडा दुखै/छाती दुखै, गोडा दुखै/छाती दुखै, गोडा दुखै/छाती दुखै, गोडा दुखै/छाती दुखै, गोडा दुखै” री रुणकार अेक-डोढ मिनट ताणी इकसार लागती री। सुर होळै सूं तेज, और तेज, और तेज हुयो। छेवट अेकदम सूं रुणकार रुकगी, जाणै कोई “इमरजेंसी-ब्रैक” लाग्या हुवै।[…]

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भाई रे मिनखां भाई!

भाई रे मिनखां भाई!
थांरी बुद्धि रो थाग
नीं लाधै
बापड़ै बूढै विधाता नै!
बो फरोल़ो है
आपरी झीर-झीर जूनी बही रा पाना
जिणमें कठै ई
कदास लाध जावै कोई ओल़ी
कै
बी कांई लिखियो हो?[…]

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किरियावर

आप सही फरमावो हो
कै
आपरो किरियावर है
म्हारै बडेरां माथै!
म्हारै माथै!
मोटोड़ै मिनखां!
म्है कीकर विसराय सकूं
किरियावर आपरो?
आपनै तो शायद
पांतरो पड़ग्यो होवैला
पण
म्हनै चेतो है[…]

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ऐ है भारत रा भावी कर्णधार!

इण दिनां होय रैयै अंतर्राष्ट्रीय खेलां म़े भारत रै पुरष खिलाड़ियां रै प्रदर्शन नै लेय कई कवि मित्रां आपरी काव्यात्मक टिप्पणियां की। इणी कड़ी में कीं ओल़्यां आपरी निजर कर रैयो हूं पण खाली खिलाड़ियां नैं इंगित नीं कर र ऐड़ी समूली मानसिकता रै माथै-

ऐ है भारत रा भावी कर्णधार!
उठणै री आंरी पौच नहीं, माथै लैणै रो भार!!
आंख्यां में आंरै गीड झरै,
सैफड़ रा बैवै परनाल़ा।
उठतां री पींड्यां धूजै है,
आंख्यां रै आडा तिरमाल़ा।

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राखड़ी रो नेग !

राखड़ी
बांधणियै
जद जद ई
किणी रै बांधी है!
तो एक सुखद अहसास
होयो मन में !
पनपियो है भाव द्रढता रो
एक अदीठ डर सूं
भिड़ण री, बचण री
दीसी है जुगत
फगत राखड़ी रै धागै रै पाण
पनपियो है आपाण[…]

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