तंत्रोक्त रात्रिसुक्तम का भावानुवाद
रात्रि सुक्त तंत्रोक्त रा, मायड भासा मांझ।
आखर मांडूं ओपता, मेहाई महराज।।४१६
जोगण निद्रा आपरा, कथूं प्रवाडा राज।
उकती शुभ दो अंबिका, मेहाई महराज।।४१७
अखिल जगत अधिराजिनी, धारण वळै धरा ज।
उतपति थिति लय कारणी, मेहाई महराज।।४१८
अनुपम सगती इश री, नींद कहै दुनिया ज।
आवड वपु खुद अंबिका, मेहाई महराज।।४१९[…]