सूरजदेव स्तुति
।।छंद – मुकंदडंबरी।।
परभात री जोत दिपै परभाकर,
नित्य नवीन करै किरणां।
उतसाह उमंग सुचंग भरै उर,
तारण नाथ सदा तरुणा।
जगचक्ख अहो जगनायक जोगिय,
काज धरा करणो करुणा।
सुण गीध सलाम सदामद सूरज,
नाम ललाम रटो निरणा।।1[…]
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।।छंद – मुकंदडंबरी।।
परभात री जोत दिपै परभाकर,
नित्य नवीन करै किरणां।
उतसाह उमंग सुचंग भरै उर,
तारण नाथ सदा तरुणा।
जगचक्ख अहो जगनायक जोगिय,
काज धरा करणो करुणा।
सुण गीध सलाम सदामद सूरज,
नाम ललाम रटो निरणा।।1[…]
मिनख नै मिनख ई मानणो भाई!
जात रो जंजाल़ नीं जाणणो भाई!!
कूड़की धजा तो कदै ई उतरगी!
अबै क्यूं चींथड़ो ताणणो भाई!![…]
जिन चारण साहित्यकारों ने व्यापक फलक पर काम किया लेकिन अपरिहार्य कारणों से उनकी पहचान सर्वत्र नहीं बन पाई।कारण कोई भी रहा हों लेकिन यह सत्य तथ्य है कि इन मनीषियों के काम की कूंत साहित्यिक जगत के समक्ष नहीं के बराबर आई है। ऐसे ही काम में अग्रणी और नाम में विश्वास नहीं रखने वालें एक मनीषी हैं, भंवरदान रत्नू ‘मधुकर’।
‘मधुकर’ एक ऐसी शख्सियत हैं जिन्होंने मौलिक लिखने के साथ अपने पूर्ववर्ती विद्वानों द्वारा प्रणीत काव्य जो आजकी पीढ़ी के लिए सुलभ तो हैं लेकिन अध्ययनाभाव के कारण उनके लिए सुगम नहीं, को बौधगम्य बनाने हेतु स्तुत्य कार्य किया है।
इनके कार्य की तरफ इंगित करूं उससे पहले इनकी साहित्यिक विरासत की तरफ थोड़ा ध्यानाकर्षण करना समीचीन रहेगा।[…]
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आज आपां अपणै आप नै आधुनिक कै विचारवान कैवण में अंकै ई नीं संकीजां पण जद कोई आपांनै पूछै कै आप में संवेदना जीवती है!!तो आपां छ दांत र मूंडो पोलो री गत में ज्यावां। ज्यूं-ज्यूं आपां आधुनिकता रो आवरण ओढण लागा बिंया-बिंया आपां में असंवेदनशीलता पग पसारण लागी। जद ई तो आपां रै पाड़ौस में एक कानी लास माथै कूका रोल़ो मचियोड़ो है तो दूजै कानी उणी लास माथै लोग आपरी रोट्यां सैकण में लागोड़ा है अर आपां बीच में कदै ई इनै मूंडो बताय भला बजां तो कदै ई बिनै मूंडो बताय चातरक बजां!!पण पैला लोगां री कैणी अर रैणी एक सरीखी होती। दूजै रै दुख में दुखी होवणो अर दूजै रै सुख मे सुखी होवणो उणां री आदत रो एक भाग हो, जिणनै छोडणो वे आपरो अभाग मानता। ऐड़ो ई एक किस्सो है चोवटियां जोश्यां रै होल़ी नीं मनावण रो।[…]
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धाट धरा (अमरकोट अर आसै-पासै रो इलाको) सोढां अर देथां री दातारगी रै पाण चावी रैयी है। सोढै खींवरै री दातारगी नै जनमानस इतरो सनमान दियो कै पिछमांण में किणी पण जात में ब्याव होवो, पण चंवरी री बखत ‘खींवरो’ गीत अवस ही गाईजैला-
कीरत विल़िया काहला, दत विल़ियां दोढाह।
परणीजै सारी प्रिथी, गाईजै सोढाह।।
तो देथां रै विषय में चावो है-
दूथियां हजारी बाज देथा।।
इणी देथां रो एक गांम मीठड़ियो। उठै अखजी देथा अर दलोजी देथा सपूत होया। अखजी रै गरवोजी अर मानोजी नामक दो बेटा होया। मानोजी एक ‘कागिये’ (मेघवाल़ां री एक जात) में कीं रकम मांगता। गरीब मेघवाल़ सूं बखतसर रकम होई नीं सो मानोजी नै रीस आई। वे गया अर लांठापै उण मेघवाल़ री एकाएक सांयढ आ कैय खोल लाया कै – “थारै कनै नाणो होवै जणै आ जाई अर सांयढ ले जाई।”[…]
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उन्नीसवों सइको राजस्थान में उथल़-पुथल़ अर अत्याचारां रो रैयो। उण काल़ खंड में केई राजावां अर ठाकरां आपरै पुरखां री थापित मरजादावां रै खिलाफ काम कियो। जिणनै केई लोगां अंगेजियो तो केइयां प्रतिकार ई कियो। उण काल़खंड में चारणां रै बीसूं सांसणां में जमर अर तेलिया होया।
चारणां नै दिरीजण वाल़ो गांम सांसण बाजतो। वो गांम हर लागबाग सूं मुक्त होवतो अर राज कोई दखल नीं दे सकतो। आ एक थापित मरजादा ही। जद जद राज मरजादावां उलांगण री हद तक आयो तो चारणां अहिंसक रूप सूं राज नै रोकण सारू धरणो(सत्याग्रह)जमर अर तेलिया किया। इण तीनूं ई स्थिति में खुद ई कष्ट पावता पण जनता कै राज संपत्ति नै किणी भांत सूं हाण नीं पूगावता।
खुद उत्सर्ग कर देता पण सरणागत कै मरजादा नै नीं डिगण देता। जदकै आज इणरै उलट है। आज केई तबका आपरै प्रदत्त अधिकारां री रक्षार्थ हिंसक होय तोड़फोड़, निर्दोषां रा भोड-भंजण सैति कितरा ई अजोगता काम करै। इणरै उलट चारण कटारियां खाय कै जमर कर सत्य समर रा अमर सेनानी बणता।
उण कालखंड रा ऐड़ा घणा किस्सा है पण एक गीरबैजोग किस्सै सूं आपनै रूबरू करावूं।[…]
जद-जद हथाई में बैठां तद-तद जोगां री बात सुणां ! बात तो नाजोगां री ई सुणां पण अंजस फखत जोगां माथै ई आवै नाजोगां माथै नीं। जोगो बणणो दोरो है। जोगो बणण सारू मन मोटो राखणो पड़ै। जिण-जिण नरां मन मोटो राखियो, वांरो सुजस संसार भाखियो। इण सुजस रै प्रताप आज ई फजर री वेल़ा में लोग वांनै याद करै। ईशरा-परमेसरा कितरी सटीक कैयी कै-
दीयां रा देवल़ चढै।
देवैला वे अमर रैवैला!! इणमें कोई मीनमेख नीं है। आज सुरतसिंह, जोगो पड़िहार अर जोगो भाटी किण जागा कै किण गांम रा होता आ लोग पांतरग्या पण वे जोगा हा !आ नीं पांतरिया। जद ई तो किणी कवि कैयो कै सुरतै जिसा सपूत, हर दिशा में एक-एक होवै तो चारण-राजपूत संबंध कदै ई जूना नीं होवता-
सुरतै जिसा सपूत, दिस-दिस में हिक-हिक हुवै।
चारण नै रजपूत, जूना हुवै न च्यार जुग।।[…]
बीकानेर रो गणगौर तिंवार चावो। इणरो उछब देखणजोग होवतो। गांम-गांम में गवर री सवारी निकल़ती अर कुए कै तल़ाब पाणी पी पाछी आवती। गैणां सूं लड़ाझूम गवर री सवारी साथै बांकड़ली मूंछां अर बूकियां में गाढ वाल़ा मरद, करद ले रक्षा में बैता।
गवर लुगायां रै कोड अर उमंग रो तिंवार सो बूढी-बाल़ा अर परणी-कुंवारी घणै हरख रै साथै मनावै-
मनचायो वर मांगती, पूजै सब गणगौर।
परणी अमर सुहाग नै, कन्या सुघड़ किशोर।।[…]
बात यूं चालै कै दिल्ली माथै तुगलक वंश रो शासन हो। हर दिल्ली रै शासक री कुदीठ नागौर माथै रैयी क्यूंकै आ धरा उपजाऊ ही
सियाल़ो खाटू भलो, ऊनाल़ो अजमेर।
नागाणो नितरो भलो, सावण बीकानेर।।
इण वास्तै इण धरा माथै घणकरोक शासन दिल्ली रो रैयो। दिल्ली शासन नै कर बीजो उगराय दिल्ली पूगतो करण सारू
उठै रै शासकां जायल रै गोपाल़जी जाट जिणां री शाखा बासट अर खिंयाल़ै रा धरमोजी जाट जिणांरी शाखा बिडियासर ही नै ओ जिम्मो दे राख्यो हो।[…]
उरड़ियो आज उतराध सूं ऐरावतपति
खरै मन उमड़ियो बहै खातो।
गहरमन नाज अगराजतो घुमड़ियो
मुरड़ियो काल़ रो देव माथो।।1
उमँग असमाण में वादल़ा आहूड़ै
मोदधर धाहूड़ै होय माता।
निपट चढ वाद में मलफिया नाहूड़ै
तीख में बाहूड़ै होय ताता।।[…]2