सिध्धकुंजिकास्तोत्रम् का भावानुवाद
सिध्धकुंजिका सांतरी, करण सकळ शुभ काज।
गुरुचाबी गढवी तणी, मेहाई महराज।।२७२
चँडी जाप है चारणी, तारण भव जळ मां ज।
अवल नाम आणँद घण, मेहाई महराज।।२७३
कवच अरगला कीलकां, रो सब है मां राज।
रिधू राज राजेस्वरी, मेहाई महराज।।२७४
सुकत ध्यान अर न्यास सब, अरचन वंदन आ ज।
सरस नाम सुखरूप है, मेहाई महराज।।२७५[…]