रंग रे दोहा रंग – हंस और बगुला

हंस और मानसरोवर का लोभ संवरण करने से ज्यादातर साहित्यकार खुदको रोक नहीं पाए है। आज मैं भी हंस, सरोवर, तरूवर और बगुला आदि पात्र/प्रतीकों से रचे गढे पुराने कवियों के कतिपय दोहे रूपी मौक्तिक आप सभी गुणीजन-पाठक-मराल के लिए राजस्थानी साहित्य/लोक साहित्य के मानसरोवर से चुन चुन कर प्रस्तुत कर रहा हूं।

सुण समदर सौ जोजना, लीक छोड़ मत जाह।
छोटा छीलर ऊझल़ै, तै घर रीत न आह।।
हे! सौ योजन तक फैले समुद्र तू अपनी सीमा मत लांघ। अपनी लीक से आगे मत जा। छोटे पोखर तालाब ही छलकते है क्योंकि वह अधूरे है। छलकना तुम्हारा स्वभाव नहीं। घर तुम्हारे घर की रीति या परंपरा नहीं है।

हीलोल़ा दरियाव रा, झाझा हंस सहंत।
बुगला कायर बापड़ा, पहली लहर पुल़ंत।।
समंदर की अनगिनत लहरें तो हंस ही झेल सकता है। बगुले जैसे कायर तो पहली लहर में ही धराशायी हो जाते है। यह बगुलों के बस की बात नहीं है।[…]

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रंग रे दोहा रंग – जोगमाया को रंग

शक्ति की भक्ति का पर्व चैत्र नवरात्र अपने चरमपर है। और अभी अभी ही फागुन और बसंत बीता है। लगता है फागुन के पलाश का रंग हमारे तन मन से अभी उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है। जैसा कि पहले ही बता चुका हूं। राजस्थानी दोहा साहित्य में रंग के दोहों की एक भव्य परंपरा रही है। यह परंपरा आज भी आप किसी सुदूर थली थार के रेगिस्तान में गांव, चौपाल, ढाणी आदि के सुबह सुबह के मेल मिलाप (रेयाण)आदि में आप को ढूंढने पर जरूर दिखाई पडेगी।[…]

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रंग रे दोहा रंग – हंस और काग

हंस को प्राचीन काव्य में, खास कर लोक साहित्य में खुब महिमान्वित किया गया है। हंस को आत्मा के प्रतीक रूप में भी कई संत कवियों ने प्रयुक्त किया गया है। पुराने जमाने में साधु संतो फकीरों और दिव्यगुणों से युक्त औलिया पुरूषों के आगे परमहंस बिरूद लगाया जाता था। जैसे कि रामकृष्ण परमहंस। आज भी बड़े बड़े संत महात्मा और महामंडलेश्वर अपने आगे परमहंस का बिरूद लगाते हुए आप को मिल जाएगें।

हंस के संबोधनी-काव्य दोहा, अन्योक्तियां, प्राचीन भजन, संस्कृत सुभाषित आदि से भारतीय साहित्य भरा पड़ा है। हंस में नीर क्षीर को परखने की द्रष्टि है, कला है, जो उसे अन्य पक्षीयों से अलग करती है। हंस मां सरस्वती का वाहन है। कवि नाथू सिंह महियारिया ने अपने ग्रंथ “वीर सतसई” में हंस जो कि सदैव मोती का चारा चुगता है उस को आधार बनाकर सरस्वती की श्रेष्ठता सिद्ध करने की कोशिश करी है। दोहा कुछ यूं है।

सुरपति वाहण तरु भखै, नरपति वाहण नाज।
तौ वाहण मोती चुगै, थूं सारां सिरताज।।[…]

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रंग! रे दोहा रंग! – हंस की अन्योक्ति

आज कल सोशियल मीडिया साहित्यिक ज्ञान के आदान प्रदान का एक सशक्त माध्यम बना हुआ है। सोशियल मीडिया पर ट्वीटर पर हाल ही में प्रताप सोमवंशी साहब जो कि दैनिक हिंदुस्तान में वरिष्ठ संपादक है और देश के बहुत ही उम्दा शायरों में शुमार एक शायर हैं, नें कुछ दिन पूर्व जब एक लोक दोहा जो हंस पर था वह शेयर किया जो उन्होंनें 1959 में कुतुर्उरल एन हैदर द्वारा लिखी किताब “आग का दरिया” में पढा था। दोहा कुछ यूं था।

ताल सूख पत्थर भयो, हंस कहीँ न जाय।
पीत पुरानी कारणे, चुन-चुन कांकर खाय।।

तो इस दोहे की वजह से उनसे साहित्यिक संवाद का स्वर्णिम अवसर मिला और मुझे लगा कि क्यों न हंस पर लिखे अन्य अन्योक्ति परक प्राचीन दोहे जो मेरे संज्ञान में है सुधि पाठकों के बीच साझा किये जाएँ ?[…]

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रंग रे दोहा रंग – रंग! फागण

रंगो की दुनिया का खेल ही निराला है। हर इक शख्श ने इसे होली का नाम दे डाला है। प्रकृति भी भला उससे कैसे अछुती रहती, डार डार और पात पात मनोहारी पुष्प बसंत में ऐसे लगते है मानो कोई रंगशाला है। बसंत को ऋतुराज कहा गया है। तो शृंगार रस को रसों का राजा कहा गया है। अगर मैं ब्रजभाषा के कवि “देव” के शब्दों में कहूं तो “बानि को सार बखान्यो सिंगार, सिंगार को सार किशोर किशोरी”। कहने का मतलब है कि रसों का सार शृंगार है और शृंगार का सार श्री कृष्ण और राधा रानी है। श्री कृष्ण भले ही श्याम वर्ण हो पर उनका भी एक नाम “रसराज” है। श्री कृष्ण और श्री राधा रानी की कल्पना मात्र से ही हम ब्रजमंडल की करीलकुंजों में खुद को खोया हुआ महसूस करते है। श्री कृष्ण और राधा रानी सदैव लीलालीन रहते है। वह रास, और होली, फगुवा आदि खेलते रहते है।

रँग फागण रँग राधिका, रंग कोटि रसराज।
रँग रँग कर दी कल्पना, रँग बरसे ब्रज आज।।
इस फागुन को रंग है, राधा रानी को रंग है और कोटिश:रंग रसराज श्रीकृष्ण को है जिनकी वजह से मन की कल्पनाओं में रंग भर दिया है। ब्रजमंडल में रस की झडी बरस रही है।[…]

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મોતી

🌻ગઝલ🌻
છે સમદર ને તળિયે મોતી,
લઇ ને પાછા વળિયે મોતી.
વીજ ઝબુકતાં અમે પરોવી,
બાંધ્યું છે માદળિયે મોતી.
આ તરણાં પર ઝાકળ જાણે,
જડિયું સોના સળિયે મોતી![…]

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ગઝલ

ડેલીયો માં ડાયરો થાતો નથી.
એટલે હું ગામડે જાતો નથી.
રાસડા ,ગીતો ને છંદો ગુમ થયા,
રસ ભરી વાતો નથી,રાતો નથી.
ગામડા ને શ્હેર છે ભરખી ગયું,
ગોંદરે જણ એક દેખાતો નથી.
આમ્રવન બદલાઈ ગ્યું છે ફ્લેટ માં,
કોકિલા નો સાદ સંભળાતો નથી.[…]

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ગઝલ- સુખનવર સંગે ગઝલ છે.

કેટલું સુંદર યુગલ છે.
સુખનવર સંગે ગઝલ છે.
આપની યાદો થી નભનાં,
વાદળા સઘળા સજલ છે.
જો તમે હો સાથ માં તો,
જિંદગી મારી સફળ છે.
આંગણે મહોર્યો છે આંબો,
લાગણી નાં મીઠા ફળ છે.[…]

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ગઝલ

રસ ભરી વાતો ગઝલ માં હોય છે.
સ્નેહ નો નાતો ગઝલ માં હોય છે.
ચાંદ, તારા, ફૂલ, ઝાકળ થી સભર,
મેઘલી રાતો ગઝલ માં હોય છે.
સૂર, તુલસીદાસ, નરસી મય બની,
આતમો ગાતો ગઝલ માં હોય છે.
હા !વલોणुं થાય ઘમ્મર ગામડે
એવી પરભાતો ગઝલ માં હોય છે.[…]

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रंग रे दोहा रंग – रंग बसंत

बसंत का हमारे देश में बडा ही महत्व है। बसंत रूत में प्रकृति नवपल्लवित हो उठती है। रंग बिरंगे फूलों से वातावरण मादक हो जाता है। किंशुक, पलाश के लाल फूल पहाडियों पर बडे ही मन भावन लगते है। ऐसा लगता है जैसे किसी ने प्रकृति को गेरूए रंग में रंग दिया हो। बसंत पंचमी से होली तक लगातार बसंतोत्सव मनाया जाता है। फागुन तक अनवरत चलता यह महोत्सव भारतीयों के जीवन में घुल मिल गया है।

बसंतोत्सव मनाने के संदर्भ हमें संस्कृत साहित्य से लेकर राजस्थानी की प्राचीन कविताओं में मिलते है। मृच्छकटिकम नाटक में एक गरीब ब्राह्मण चारुदत्त और एक गणिका बसंतसेना के प्रेम का वर्णन किया गया है। इसमें बसंतोत्सव का शानदार चित्रण नाटककार छुद्रक ने किया है। महाकवि कालिदास नें भी अपने काव्य ऋतुसंहार में अन्य ऋतुऔं के साथ साथ बसंत ऋतु का बडा ही अद्भुत वर्णन किया है।[…]

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