ग़ज़ल – सांई
ग़ज़ल – सांई
जीत दो या हार सांई!
है मुझे स्वीकार सांई!
फूल हो या ख़ार सांई!
आप का है प्यार सांई!
आप जाकर दूर बैठे,
सात सागर पार सांई![…]
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ग़ज़ल – सांई
जीत दो या हार सांई!
है मुझे स्वीकार सांई!
फूल हो या ख़ार सांई!
आप का है प्यार सांई!
आप जाकर दूर बैठे,
सात सागर पार सांई![…]
जब मुझे तेरा ध्यान होता है।
औलिया का गुमान होता है।।१
इश्क ज्यों ज्यो जवान होता है।
उसका जल्वा अमान होता है।।२
मन में खुश्बू बिखेर दे हर सू,
प्यार गुगल लोबान होता है।।३[…]
मोरपंखवारा सिर, मुकुट सु धारा न्यारा,
नंद का कुमारा ब्रज, गोप का दुलारा है।
कारा कारा देह, मन मोहता हमारा गिध,
गनिका उबारा अजामिल जिन तारा है।
वेद श्रुति सारा “नेति नेति” जे पुकारा, जसु-
मति जीव-प्यारा मैने, उर बिच धारा है।
आँखिन की कारा बिच घोर हा अँधारा, सखि !
कृष्ण दीप बारा, तातें फैला उजियारा है।।१[…]
।।गीत जात बुध चित्त विलास।।
रे बाजे समदर तीरां!
मादल़ डफ चंग झांझ मंजीरा!
नवलख संग नित रास रमे रव गूंजे गगन गंभीरा!
घरर घरर समदर घुघवाटे,निरमल़ उछल़त नीरा!
समदर तीरा![…]
इक टक उन को जब जब देखा।
हम ने उन मे ही रब देखा।।१
लोग पुकारे “निकला चंदा”
छत पर उनको कल शब देखा।।२
साँझ सकारे त़का उन्ही को,
आन उन्हीं के कुछ कब देखा?३
“मय के प्याले लगे छलकने”,
माह जबीं का जब लब देखा!!४[…]
आज चाल आकास रो, आपां देखां छोर।
म्है थांनें देख्या करूं, थें देखो मम ओर।।१
मन री गति सूं मानुनी, आवौ मम आवास।
छत पर दोन्यूं बैठ नें, देखांला आकास।।२
गिण गिण तारां रातड़ी, आज बिताद्यां, आव!
अर दोन्यूं ल्यां नाप फिर, आभ तणौ उँचाव।।३[…]
।।छंद त्रिभंगी।।
हे हरि मन हरणं, अशरण शरणं, राधा रमणं, गिरिधरणं।
आपद उद्धरणं, नित प्रति स्मरणं, सुधा निझरणं, बरु चरणं।
ब्रजधाम विचरणं, कुंडल़ करणं, वारिद वर्णं, जगवंद्या।
माधव मुचकुंदा!, नागर नंदा!, बालमुकुंदा! गोविंदा!!१!![…]
नजर नें छू लिया जिस दम तो मेरे दिल ने ये सोचा,
यहाँ पर हर किसी का चाँद सा चेहरा नहीं होता।
मगर फिर भी मुझे वो चाँद का ही अक्स लगता है,
नहीं तो इस कदर मह दीद को ठहरा नहीं होता।१
जेहन में जिक्र आता है जब उस रूखसार का मुझको,
तो दिल मेरा पुकारे है वो गहरी झील सा होगा,
पतंगा बन मेरा मन जलने को बेताब सा होगा,
और वह भी इश्क में मेरे जला कंदील सा होगा।।२[…]
।।दोहा।।
आज मँड़ी सावण झड़ी, बड़ी पडी बरसात,
नड़ी नड़ी नाची सखी, खड़ी खड़ी हरखात।।१
बरसे नभ में वादल़ी, घूंघट बरसे नैण।
तरुणी पिव बिन तरसती, सावण घर नीं सैण।।२
वठै झबूकै बीजल़ी, अठै झबूकै नेण।
बरसो घन ह्वै बालमा!, सावण में सुखदेण।।३
बीज पल़क्कै बिरह री, नैण छलक्कै नीर।
रैण ढल़क्कै राज! बिन, धारूं किण विध धीर।।४[…]