माता
प्रेम को नेम निभाय अलौकिक,
नेम सों प्रेम सिखावती माता।
त्याग हुते अनुराग को सींचत,
त्याग पे भाग सरावती माता।
जीवन जंग को ढंग से जीत के,
नीत की रीत निभावती माता।
भाग बड़े गजराज सपूत के,
कंठ लगा दुलरावती माता।।1।।
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प्रेम को नेम निभाय अलौकिक,
नेम सों प्रेम सिखावती माता।
त्याग हुते अनुराग को सींचत,
त्याग पे भाग सरावती माता।
जीवन जंग को ढंग से जीत के,
नीत की रीत निभावती माता।
भाग बड़े गजराज सपूत के,
कंठ लगा दुलरावती माता।।1।।
कल की अशोभनीय खबर का खेद प्रकट करते हुए आज राजस्थान पत्रिका ने लिखा है कि उन्होंने ‘ऐसा मुहावरे के तौर’ पर लिखा है। जहां तक हमारी जानकारी है हिंदी शब्दकोश या मुहावरा-लोकोक्तिपरक कोशों में ऐसा कोई मुहावरा नहीं जो कल के समाचार में लिखे मंतव्य को बयां करता हो। और जहां तक जातिसूचक मुहावरों या लोकोक्तियों की बात है तो बहुत से ऐसे मुहावरे हो सकते हैं लेकिन क्या किसी मुहावरे को मनचाहे ढंग से कहीं भी प्रयुक्त करना सही है। यदि ऐसा है तो मैं ऐसे अनेक शब्दों की जानकारी राजस्थान पत्रिका एवं लेखक मि. वर्मा को उपलब्ध […]
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राजस्थान पत्रिका जैसे राष्ट्रीय ख्यातिलब्ध समाचारपत्र में ‘तथाकथित रूप से अतिख्याति प्राप्त पत्रकार’ महोदय श्री आनन्द स्वरूप वर्मा की ‘चारण’ समाज के प्रति अभद्र टिप्पणी को पढ़कर अत्यंत वेदना हुई।
आदरणीय वर्मा साहब! वैसे तो किसी जाति या परंपरा पर बिना सोचे समझे टीका-टिप्पणी करने वाले लोग किसी समाज के प्रतिनिधि नहीं हो सकते लेकिन फिर भी आपसे यह जानने की इच्छा जरूर है कि चारण तो जैसे थे या हैं, वैसे ठीक हैं पर आपकी जाति, जो भी है, उसमें कितने तथा किस तरह के साहित्यकार एवं कलाकार रहे हैं, जरा उनका परिचय करवाइए ताकि साहित्य के इतिहासों से‘चारण-साहित्य’, चारण-काल, चारण-युग, चारण-प्रवृत्तियां आदि के स्थान पर आप द्वारा निर्दिष्ट नाम लिखकर समाज का उचित मार्गदर्शन करें। उनके साहित्य की उपादेयता एवं उल्लेखनीय प्रवृत्तियों से भी अवगत करवाएं। इससे हम जैसे लोगों को यह फायदा होगा कि हम भी कहीं सही मायने में कलाकार एवं साहित्यकार बन सकें।
यह संसार सामाजिक संबंधों का जाल है, जिसमें हर व्यक्ति एक-दूसरे से किसी न किसी रिश्ते से जुड़ा हुआ है। अरस्तु ने तो यहां तक लिखा है कि बिना समाज के रहने वाला व्यक्ति या तो पागल है या फिर पशु है यानी कि व्यक्ति के लिए समाज का होना अत्यावशक है। समाज की एक सशक्त कड़ी है – परिवार। परिवार ही वह आधारशिला है, जहां रिश्तों का ताना-बाना बुना जाता है, रिश्तों की फसलों को सींचने तथा सहेजने-संवारने का काम यहीं से होता है। परिवार रूपी बगिया में खिलने वाला हर पुष्प रिश्तों के मिठास का जल पाकर सुरभित […]
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जद भोर भयंकर भूंडी है
अर सांझ रो नाम लियां ही डरां।
इसड़ै आं सूरज चंदां रो
किम छंदां में गुणगान करां।।
कळियां पर काळी निजरां है
सुमनां री सौरभ सहमी है।
उर मांय उदासी उपवन रै
जालिम भंवरा बेरहमी है।। […]
किणी देस-समाज री पूरी अर परतख पिछाण उणरी संस्कृति सूं इज हुवै। संस्कृति रो मूळ संस्कार हुवै। संस्कारां रै सिगै ई किणी मिनख, समाज अर देस री रीत-नीत, माण-मरजादा, लेण-देण, आचार-विचार आद रो ठाह लागै। भारतीय संस्कृति मांय मिनख रै जलम सूं लेय छेहलै पड़ाव ताणी जीवण री जुगत सिखावण सारू संस्कारां, मान्यतावां, रीत-रिवाजां अर कमनीय कल्पनावां री भरमार है। इण संस्कृति मांय कांई है, इणरै साथ कांई व्हेणो चाईजै, इणरी बात पुरजोर ढंग सूं करीजी है। मिनख नैं पग-पग माथै उत्तम जीवण जीणै री प्रेरणा देवण सारू आपणी संस्कृति मांय देवी-देवता, संत-ओलियां, पीर-भोमियां, सूरां-जुझारां रै उल्लेखणजोग अर अनुकरणजोग जीवण […]
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सतियां रै सत री गाथावां
पतियां रै पत री घण बातां।
जतियां रै जंगी जूझारू
जीवण री जूनी अखियातां।।
संतां री वाणी सीख भरी
सूरां रा समर अनै साका।
वीरां वरदाई बड़भागण
मोटी मरजादण मरुभाषा।। […]
गाँव बदळग्यो देख कोटड़ी
छिण में छळग्यो देख कोटड़ी
जिणरै तप सूं जगत कांपतो
(वो) सूरज ढळग्यो देख कोटड़ी।
अम्बर अड़तो रोब अनूठो
पग उठग्यो सो पड़्यो न पूठो
मरजादा राखण मर मिटती
खुद्दारी रो तूं ही खूंटो। […]
पत्ती ने जिस दिन पौधे की जड़ को जड़ कह कर धमकाया।
फूलों ने खुद को पौधे का भाग्य विधाता बतलाया।
इठलाकर निज रूपरंग पर फुनगी ने डाली को टोका।
लहरों ने सागर से मिलने को आतुर नदिया को रोका।
सागर से यूं नदिया जब-जब, सहमी-सहमी दूर हुई है।
तब-तब मेरी कलम लहू से लिखने को मजबूर हुई है।। 01।।
||गीत सोहणो||
मनवा तूं दर पिछतावो मत कर
भलै काम रो अंत भलो
खूटल कर खोटा खुट जासी
चेत हेत री राह चलो
अंतस राख उसूल अटूटा
खुल़िया खूंटां मती खसै
अवसरवाद जाण मत आछो
धोल़ां नाही धूड़ धसै […]