म्हारै देखतां-देखतां गमग्यो गांम!
नीं चंवरां में जाजम
नीं घेर घुमेर वड़लो!
नीं मन!
नीं मन री बातां!
करण री कोई ठावी ठौड़
फगत निगै आवै है-
झोड़ ई झोड़!
जिणरो नीं कोई निचोड़!
नीं निचोड़ काढणियो
तो पछै तोड़ कठै है?[…]
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नीं चंवरां में जाजम
नीं घेर घुमेर वड़लो!
नीं मन!
नीं मन री बातां!
करण री कोई ठावी ठौड़
फगत निगै आवै है-
झोड़ ई झोड़!
जिणरो नीं कोई निचोड़!
नीं निचोड़ काढणियो
तो पछै तोड़ कठै है?[…]
है खांडै री धार मित्रता।
सबसूं उत्तम कार मित्रता!!
रथ हांकै नै पग धो देवै।
सँभल़ै डग -डग लार मित्रता!!
डिगतै नैं कांधो दे ढाबै।
निज भुज लेवै भार मित्रता!!
बढती -घटती नहीं चांद ज्यूं।
सुख-दुख में इकसार मित्रता!![…]
अजै तो नीं आई
आधुनिकता री आंधी!
ओ तो फगत दोटो है
आधुनिकता रो!
जिणमें ई आपांरी जड़ां
जोखमीजर उखड़गी!
तो पछै कीकर झालांला?
अरड़ाट देती वा आकरी आंधी!
आपांनैं तो इण दोटै ई
चाढ दिया टोरै!
भमा दिया भोगना!
नाख दी आंख्यां में धूड़
अर
कर दिया चितबगना
म्है जद-जद ई
करिया करतो चिड़बोथिया
टाबरपणै री भोल़प में
म्हारी बैनां सूं।
म्हारी आल़ रै पाण
जद टपकता हा
उणां री आंख्यां सूं
टप टप टप
आंसू मोतीड़ा बण।
उणां रै इण
आंसूड़ां माथै पसीज
म्हारी मा
कैया करती ही कै
तूं मत किया कर
गैलायां![…]
बातां ज्यांरी स्याणी देखो।
भरी धूर्तता वाणी देखो!!
दूजां दुख में होय दूबल़ा।
कैवै काग कहाणी देखो!!
जनता नैं तो कोई खूंटलै।
समझ गाडरी लाणी देखो!!
ठग्गां घर नीं रीत दैण री।
वुस्त बठै तो जाणी देखो!!
मित्रों जब भी कविता की बात होती है तो एक बात जरूर कहना चाहता हूं कि कालजयी कविता वह होती है जो आज भी हमैं नित्य नवीन लगे।
बरसों पहले जोधपुर नरेश महाराजा मानसिंह के दरबारी कविराजा बांकीदास जी आसिया ने “सूर छत्तीसी” लिखी थी। वीर रस से लबरेज इन दोहों में कवि ने एक अमर पंक्ति का प्रयोग कर सात आठ दोहै रचे थे। पंक्ति थी “सखी! अमीणो साहिबो”
यह पंक्ति इतनी शानदार है कि यह आज के कवियों को भी प्रेरणा देती है। इसी पंक्ति से प्रेरणा लेकर आज के चारण कवियों ने कुछ दोहों के सृजन का प्रयास किया है। तो प्रस्तुत है बांकीदासजी आसिया के दोहों के साथ साथ कवि नरपत आसिया “वैतालिक” और गिरधरदान जी रतनू “दासोडी” द्वारा लिखे दोहै।[…]
मत दे इतरा धता रामजी!
मिनख मिल़ै तो बता रामजी!!
लोकतंत्र में लूखो, भूखो!
जन तो खावै खता रामजी!!
मिनख !, मिनख नै जाति पूछै!
जूत चेपनै सता रामजी!!
वोट मांगिया पैर पकड़नै!
अब तो मालक छता रामजी!![…]
तूं तो ग्यो परदेस दीकरा।
सूनो करग्यो नेस दीकरा।।
कदै आय पाती विलमाती।
अब बदल़्यो परिवेस दीकरा।।
गया ठामडा भाज दीकरा!
रांधूं कीकर आज दीकरा!
छाछ मांगनै करूं राबड़ी
नहीं घरां पण नाज दीकरा!
घर रो दारमदार दीकरी।
म्हारो सुक्रत कार दीकरी।।
तुलसी आंगणद्वार दीकरी!
पूजूं बारंबार दीकरी!
आँगण में अवतार दीकरी।
म्हारो सब संसार दीकरी।
बैठी घर रे बार डोकरी।
किणनें रही निहार डोकरी।।
थाकी बैठी आज डोकरी।
राखी घर री लाज डोकरी।।
हाथां पकड़्यो भाल डोकरी।
मोडा खाग्या माल डोकरी।।[…]