नर लेगो नवकोट रा

मारवाड़ रो इतियास पढां तो एक बात साम्हीं आवै कै मारवाड़ रा चांपावत सरदार सामधर्मी सबसूं ज्यादा रह्या तो विद्रोही पणो ई घणो राखियो यानी रीझ अर खीझ में समवड़। मारवाड़ में चांपावतां नै चख चांपा रै विरद सूं जाणीजै। जिणांनै कवियां आंख्यां री संज्ञा दी है तो बात साव साफ है कै उणां आंख्यां देखी माथै ई पतियारो कियो-
आंख्यां देखी परसराम, कबू न झूठी होय।  अर जठै हूती दीठी उठै राज रा सामधर्मी रह्या अर जठै अणहूती दीठी उठै निशंक राज रै खिलाफ तरवारां ताणण में संकोच नीं कियो।[…]

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जंबुक ऐ क्यूं जीविया?

रोटी चीकणी जीम लैणी पण बात चीकणी नीं कैणी री आखड़ी पाल़णिया केई कवेसर आपांरै अठै हुया है। आपां जिण बात री आज ई कल्पना नीं कर सकां, उवा बात उण कवेसरां उण निरंकुश शासकां नै सुणाई जिणां रो नाम ई केई बार लोग जीभ माथै लेवता ई शंक जावता।

ऐड़ो ई एक किस्सो है महाराजा जसवंतसिंहजी जोधपुर (प्रथम) रो।[…]

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युगचेतना का प्रतिबिंब है डिंगल काव्य

राजस्थान में सांस्कृतिक चेतना व साहित्यिक संपदा को संरक्षित व संवर्धित करने में डिंगल काव्यधारा का महनीय अवदान रहा है। लेकिन प्रायः हम यह सुनते आए हैं कि डिंगल कवियों की रचनाओं में युगबोध अथवा समकालीन सोच नहीं होता है। यही नहीं इन कवियों की रचनाओं में संवेदनाओं की शुन्यता व आम आदमी की व्यथा कथा का नामोनिशान ही नहीं है। आरोपण करने वालों का कहना है कि यह काव्य केवल सामंती सोच का पक्षधर व स्तुतिपरक रचनाओं की बहुलता वाला है। यह सभी आरोप एकपक्षीय व पूर्वाग्रहों से परिपूर्ण है।[…]

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आजादी री ओट अठै…

आजादी री ओट अठै।
पल़र्या देखो झोट अठै।
अभिव्यक्ति री ओट ओल़ावै, पसर रही नित खोट अठै।।

भाषा रो पोखाल़ो कीनो।
संस्कृति नै पाणी दीनो।
भरी सभा में भलां देखलो, शिशुपाल़ रो मारग लीनो।।[…]

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हर दिल हिंदुस्तान रहेगा

ना मिलती है अनायास ही,
ना मिलती उपहारों में
ना पैसे के बल आजादी,
मिलती कहीं बाजारों में

लाखों का सिंदूर पुँछा है,
लाखों सूनी हुई कलाई
लाखों कोख चढ़ी कुर्बानी,
तब जाकर आजादी आई[…]

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