Category: कविगण
जाजम जमियोड़ी बातां में–
अर हूंस थांरली
कष्ट सहण री खिमता थांरी
अबखायां सूं हंस-हंस बंतल़
करी हथाई विपदावां सूं
परड़ां वाल़ै भांग फणां नै
बूझां वाल़ो तकियो दे नै
मगरां वाल़ी सैजां ऊपर
पलक बिंसाई
खा फूंकारो
पुस्तक समीक्षा – प्रकृति-संस्कृति री ओपती सुकृति-‘रूंख रसायण’ – महेन्द्रसिंह सिसोदिया ‘छायण’
पुस्तक समीक्षा – प्रकृति-संस्कृति री ओपती सुकृति-‘रूंख रसायण’ – महेन्द्रसिंह सिसोदिया ‘छायण’
लेखक – डॉ. शक्तिदान कविया
सिरोल़ै सतरंगिये तारां
साव अजाण्यो,
धोरां मगरां
डगरां डगरां
राख छाणनै पाणी छाण्यो।
हेली रै हलकारै
जिथिये,
निरभै रैवण
बोल सांभल़्यो,[…]
प्रताप – प्रशंसा
।।गीत चित इलोल़।।
इक इकां सूं हुवा आगल़
पुणां बप्पां पूत।
माण कज रण बीच मूवा
रूक ले रजपूत।
तो रजपूतजी रजपूत रंग धर राजिया रजपूत।।१[…]
मारवाड़ के चारण कवियों की मुखरता
राजस्थानी भाषा के साहित्य का हम अध्ययन करते हैं तो हमारे सामने लोक-साहित्य, संत-साहित्य, जैन-साहित्य एवं चारण-साहित्य का नाम उभरकर आता है। इस चतुष्टय का नाम ही राजस्थानी साहित्य है। इस साहित्य के सृजन, अभिवर्धन एवं संरक्षण में चारणों का अद्वितीय अवदान रहा है। इस बात की स्वीकारोक्ति कमोबेश उन सभी विद्वानों ने की हैं जिन्होंने राजस्थानी साहित्य के अध्ययन-अध्यापन पर काम किया या कर रहे हैं।[…]
» Read moreसदा रंग समियांण
गढ सिंवाणा नै समर्पित-
इल़ भिड़ करबा ऊजल़ी, चढिया रण चहुंवांण।
बिण सातल रो बैठणो, सदा रंग समियांण।।1
खिलजी रो मद खंडियो, सज मँडियो समियांण।
कट पड़ियो हुयनै कुटक, चढ कटकां चहुंवाण।।2[…]
ठग्गां रो मिटसी ठगवाड़ो
गीत-जांगड़ो
सरपंची रो मेल़ो सजियो, भाव देखवै भोपा।
धूतां धजा जात री धारी, खैरूं होसी खोपा।।1
दूजां नै दाणो नीं दैणो, एक समरथन आपै।
वित लूटण मनसोबा बांधै, जनहित झूठा जापै।।2[…]
जिंदगी और बंदगी
कर रहा हूँ यत्न कितने सुर सजाने के लिए
पीड़ पाले कंठ से मृदु गीत गाने के लिए
साँस की वीणा मगर झंकार भरती ही नहीं
दर्द दाझे पोरवे स्वीकार करती ही नहीं
फ़िर भी हर इक साज से साजिन्दगी करती रही
ऐ जिंदगी ताजिंदगी तू बन्दगी करती रही।[…]
सरपंची सौरी कोनी है
घर में बड़तां ई घरवाळी,
बर-बर आ बात बतावै है।
जो दिन भर सागै हांडै है,
बै रात्यूँ घात रचावै है।
वो बाबै वाळो बालूड़ो,
अबकाळै आँटो चालै है।
सरपँच बणबा नैं साच्याणी,
सोहन रै सड़फां चालै है।[…]