सखा श्रवण को श्रद्धांजलि

अरे वा’रे जगत जहान रखवारे तेरे,
अटल अन्यारे कार पार मैं न पा सक्यो।
विरुद गोपाल धारे काम नाम सारे कारे,
गाय के पुकारे हाय रेल ना रुका सक्यो।
गूजरी के जाये को पठाए झट धेनु काज,
कहे ‘गजराज’ हाय! श्याम तू न आ सक्यो।
न्याय पे तिहारे करें काय पतियारे कृष्ण,
गाय को बचाने वारे को न तू बचा सक्यो।।[…]

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मा देवनगा

।।छंद – गयामालती।।
मही मेदपाटं विदग मंडण,
धर पसूंदं तूं धणी।
तप त्याग दिनकर ध्यान तारां,
जपै माल़ा जोगणी।
वन बाहर विचरण बाघ वाटां,
गुढै नदियां गाजणी।
अई देवनगा नमो आढी, भगतजन दुख भंजणी।।1[…]

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तरस मिटाणी तीज

भलो थल़ी में भादवो, रमूं सहेली रीझ।
हड़हड़ती हँसती हरस, तरस मिटाणी तीज।।

हरदिस में हरयाल़ियां, भोम गई सह भीज।
भल तूं लायो भादवा, तरस मिटाणी तीज।।

भैंसड़ियां सुरभ्यां भली, पसमां घिरी पतीज।
मह थल़ बैवै मछरती, तकड़ी भादव तीज।।[…]

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सबसूं है मोहन सिरमोड़ !

गीत – वेलियो
मोहन बल़ तणी बात आ महियल़,
लखियो नकूं कोई लवलेश।
डिगतो बह्यो डांग कल़ डोकर,
अधपतियां करियो आदेश।।1

बीजो बुद्ध अवतरियो बसुधा,
अहिंसा तणो उपासक आप।
गुणधर पांण विनाशक गोरां,
पराधीनता काटण पाप।।2[…]

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रैणायर दुरगो रतन!

सामधरम रो सेहरो, मातभोम रो मांण।
आसै रै घर ऊगियो, भलहल़ दुरगो भांण।।1

आभ मरूधर आस घर, ऊगो अरक उजास।
जस किरणां फैली जगत, दाटक दुरगादास।।2

नर-समंद मुरधर नमो, इल़ पर बात अतोल।
रैणायर दुरगो रतन, आसै घरै अमोल।।3

चनण तर दुरगो चवां, सुज धर पसर सुवास।
निमल़ कियो घर नींब रो, सूरै सालावास।।4[…]

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पहले राष्ट्र बचाना होगा

साथ समय के आना होगा
सच को गले लगाना होगा
फिर जो चाहे भले बचाना,
पहले राष्ट्र बचाना होगा।

समय-शंख का स्वर पहचानो!
राष्ट्रधर्म निभाना होगा
तेरी मेरी राग छोड़कर
हिंद-राग को गाना होगा[…]

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कलंक री धारा ३७०

पेख न्यारो परधान, निपट झंडो पण न्यारो। सुज न्यारो सँविधान, धाप न्यारो सब ढारो। आतँक च्यारां ओर, डंक देश नै देणा। पड़िया छाती पूर, पग पग ऊपरै पैणा। पनंगां दूध पाता रह्या, की दुरगत कसमीर री। लोभ रै ललक लिखदी जिकां, तवारीख तकदीर री।। कुटल़ां इण कसमीर, धूरतां जोड़ी धारा। इल़ सूं सारी अलग, हेर कीधो हतियारां। छती शांती छीन, पोखिया ऊ उतपाती। घातियां घोपीयो छुरो मिल़ हिंद री छाती। करता रैया रिल़मिल़ कुबद्ध, परवा नह की पीर री। वरसां न वरस बुरिगारियां, की दुरगत कसमीर री।। कासप रो कसमीर, उवै घर अरक उजासै। केसर री क्यारियां, बठै वनराय विकासै। […]

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काव्यशास्त्र विनोद का अनूठा मंच काव्य-कलरव पटल

हमारे काव्यमनीषियों ने लिखा कि विद्वान एवं गुणी लोग काव्यशास्त्र विनोद में अपना समय सहर्ष व्यतीत करते हैं जबकि मुर्ख व्यक्ति का समय या तो नींद लेने में बीत जाता है या फिर परिजनों एवं परममित्रों से कलह करने में ही मुर्ख व्यक्तियों का समय बीतता है।-

काव्यशास्त्र विनोदेन कलोगच्छति धीमताम
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रहया कल्हेनवा। 

आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में जब लोग साहित्य तथा स्वाध्याय से कटने को विवश है तथा यदि कोई संस्कारवश रुचि भी रखता है तो उसे सद साहित्य की संगत मिलना बहुत मुश्किल भरा काम है।[…]

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सुरराज आरजी सुणै साहिब!

।।छंद-गयामालती।।
काढियो मुरधर काल़ कूटै,
एक थारी आस में।
इण झांख साम्हीं आंख काढी,
बात रै विसवास में।
ओ बीतियो ऊनाल़ इणविध,
छांट हेकन छेकड़ी।
सुरपाल़ अरजी सुणै साहिब,
पूर गरजी आ पड़ी।।1[…]

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मेट आरत मेह कर

।।छंद – सारसी।।
बरखा बिछोही शुष्क रोही,
और वोही इण समैं।
मघवा निमोही बण बटोही,
हीय मोही लख हमैं।
बलमा बिसारी धण दुखारी,
जीव भारी कष्टकर।
पत राख सुरपत दर बिसर मत,
मेट आरत मेह कर।
जिय देर मत कर मेह कर।[…]

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