अटल स्वातंत्र्य उपासक महाराणा प्रताप

अनूठी आन, बान एवं शान वाला यह राजस्थान प्रांत शक्ति, भक्ति एवं अनुरक्ति की त्रिवेणी माना जाता है। यहां का इतिहास शौर्य एवं औदार्य के लिए विश्वविख्यात रहा है। यहां जान से बढ़कर आन तथा प्राण से बढ़कर प्रण की शाश्वत परम्परा रही है। राजस्थान की इस तपोभूमि की कुछ ऐसी विशेषताएं रही हैं, जो अन्यत्र दुर्लभ है। यहां के वीरों ने धरती, धर्म, स्त्री एवं असहायों की रक्षार्थ मरने को मंगल माना; यहां की वीरांगनाओं ने अपनी कंचन जैसी काया का मोह त्यागते हुए अपने हाथों अपना सीस काट कर वीर पतियों को प्रणपालन का अद्वितीय पाठ पढ़ाया; यहां के संतों ने जन-जन की जड़ता को दूर करते हुए मानवधर्म की अलख जगाई; यहां के साहित्यसेवकों ने राजा से रंक सभी को कर्तव्यपथ पर अडिग डग भरने की सुभट सीख दी। जीवन से अत्यधिक मोह होते हुए भी काम पड़ने पर मरने से मुंह नहीं मोड़ कर सिंधुराग पर रीझते उन वीरों की मरदानगी की मरोड़ देखते ही बनती है। दुनिया में दूसरी जगह शायद ही ऐसा उदाहरण हो जहां वचन प्रतिपालन हेतु विवाह के ‘कांकण डोरड़े’ खोले बिना ही दूल्हे ने चंवरी में ‘राजकंवरी’ को छोड़कर ‘भंवरी’ की पीठ पर सवार हो युद्धभूमि की ओर प्रस्थान किया हो।[…]

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लाखो फूलाणी लछो!!

“ठगीजै सो ठाकर” री बात कुड़ी नीं है। हथाई रो कोड हुवै उण नै दमड़ा खरचणा पड़ै। ओ काम कोई मोटै मन रो मानवी ई कर सकै। इण में कोई जात रो कारण नीं है। ऐड़ै ई एक मोटै मन रै मिनख रो किस्सो चावो है।

पोकरण रै पाखती गांव लालपुरो। रतनूवां रै जागीरी रो गांम। इण गांम रै रतनू भोजराज री उदारता विषयक ओ दूहो घणो चावो-

लायक रतनू लालपुर गिरवर सुत बड गात।
कवि भोजै री कोटड़ी रहै सभा दिन रात।।

उल्लेखणजोग है कै सिरूवै में रतनू तेजमालजी हुया। जिणांरा माईत बाल़पणै में ई गुजरग्या हा। नेनप पड़गी। इणां रो नानाणो भाखरी रै मिकसां रै अठै। तेजमालजी री मा तेजमालजी नै लेय आपरै पीहर भायां कनै आयगी। दिन लागां तेजमालजी मोटा हुया। भाग बारो दियो। घोड़ां रा मोटा वौपारी हुया। एकर चांदसमा ठाकुर लालकरनजी इणां सूं एक घोड़ो लियो पण रकम ऊभघड़ी हुई नीं जणै ठाकुरां तेजमालजी नै कह्यो कै “आप सिरूवै क्यूं रैवो? म्हारै कनै रैवो। आवण-जावण रो पंपाल़ मिटै।”[…]

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व्रजलालजी रो विविध वरणो काव्य : विजय विनोदः गिरधर दान रतनू दासोड़ी

चारण जाति आपरी विद्वता, प्रखरता, सत्यवादिता अर चारित्रिक दृढ़ता रै पांण चावी रह्यी है। इणी गुणां रै पांण इण जाति नैं मुलक में मांण मिलतो रह्यो है। संसार रै किणी पण कूंट में अेक ई अैड़ो उदाहरण नीं मिलै कै चारणां टाळ दूजी कोई पण जाति समग्र रूप सूं आपरै साहित्यिक अवदान रै पांण ओळखीजती हुवै! चारण ई अेक मात्र अैड़ी जाति है जिणरो राजस्थानी अर गुजराती साहित्य रै विगसाव पेटै व्यक्तिगत ई नीं अपितु सामूहिक अंजसजोग अवदान रह्यो है। इणी अवदान रै पेटै लोगां इणां री साहित्यिक सेवा रो मोल करतां थकां राजस्थानी साहित्य रै इतियास रै अेक काळखंड रो नाम ‘चारण साहित्य’ तो गुजराती में इणां री प्रज्ञा अर प्रतिभा री परख कर’र इणां रै रच्यै साहित्य रो या इण परंपरा में रच्यै साहित्य रो नाम ‘चारण साहित्य’ रै नाम सूं अभिहित कियो जावै।[…]

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साँवरा!बाजी खेलो! चोपड़ ढाल़ी!

साँवरा! बाजी खेलो! चोपड़ ढाल़ी!
हारूं तो हरि दासी थोंरी, जीत्यां थें मारा वनमाल़ी!

नटनागर जाजम है ढाल़ी, बैठो आप बिचाल़े।
म्हूँ बैठूं चरणाँ रे नेड़ी, पीव पलांठी वाल़े।।
धवली कबड़ी रख धरणिधर, म्हनै दिरावो म्हारी काल़ी।।१

साँवरा! बाजी खेलो चोपड़ ढाल़ी!
हारूं तो हूं दासी थोंरी, जीत्यां थें मारा वनमाल़ी![…]

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वीरता किसी की मोहताज नहीं होती !!

डिंगल़ के सुविख्यात कवि नाथूसिंहजीजी महियारिया ने क्या सटीक कहा है-

जो करसी जिणरी हुसी, आसी बिन नू़तीह!
आ नह किणरै बापरी, भगती रजपूतीह!!

अर्थात भक्ति और वीरता किसी की बपौती नहीं होती, यह तो जो प्रदर्शित अथवा करते हैं उनकी होती है। इसमें कोई जाति का कारण नहीं है। इस बात को हम दशरथ मेघवाल के गौरवमयी बलिदान की गाथा के मध्यनजर समझ सकते हैं। जब कालू पेथड़ और सूजा मोयल (दोनो राजपूत) ने करनी जी की गायों का उस समय हरण कर लिया जब वे पूगल राव व अपने ‘धर्म भाई’ शेखा की सहायतार्थ मुलतान गई हुई थी।[…]

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उण अनमी अवनाड़ां रा सीस!!

मन री बातां करणियां रै
कांई नीं है कोई
ऐड़ी रीत,
जिणसूं ऊग जावै
कठै ई ऊंडै काल़जै
प्रीत रा पनूरा!!
कांई नीं है
वा कनै
आंशुवां रो कोई समंदर!
छौ, कोई बात नी!
संवेदनावां तो
शायद होवैली जीवती![…]

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वाह बीकाणा वाह!!

राव वीकै रै बसायै नीकै नगर रो नाम है बीकानेर। जूनो नाम जंगल़, जिणरी कदैई राजधानी होया करती जांगल़ू। जठै दइयां अर सांखलां राज कियो। इणी धरा माथै कदैई छोटा-छोटा दूजा जाट राज ई होया करता, वां सगल़ां नै आपरै बुद्धि अर आपाण रै पाण सर कर वीकै ओ सुदृढ राज थापियो अर नाम राखियो बीकानेर। जिणरी नींव करनीजी खुद आपरै हाथ सूं लगाय वीकै नै निरभै कियो अर रैयत सूं सदैव प्रेम निभावण रो सुभग संदेश दियो-

वीको बैठो पाट, करनादे श्रीमुख कैयो।
थारै रहसी थाट, म्हारां सूं बदल़ै मती।।[…]

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जंभवाणी के नीतिकथनों की वर्तमान प्रासंगिकता

आज के समाज की समग्र झांकी को ध्यान में रखते हुए गुरु जंभेस की वाणी का सम्यक विवेचन करें तो उनके नीति-कथनों की वर्तमान प्रासंगिकता कदम-कदम पर दृष्टिगोचर होती है। मैंने 20 अलग-अलग बिंदुओं में इनको संकलित करने का प्रयास किया है। ये बिंदु विश्लेषण-संश्लेषण के आधार पर घटाएं-बढ़ाए भी जा सकते हैं।
01. कर्म की प्रधानता
व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है।
उत्तम कुली का उत्तम न होयबा, कारण किरिया सारूं (26)
राजस्थानी लोकसाहित्य का ” कुंभ में सिंधु समात नहीं”
‘हक हलालूं, हक साच कृष्णो, सुकृत अहळो न जाई (70),
ब्राह्मण नाऊं लादण रूड़ा, बूता नाऊं कूता (72),
ओछी किरिया आवे फिरिया (77)[…]

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चाय – ग़ज़ल

मीठी मिसरी वाली चाय!
या हो बिलकुल काली चाय!

दूध मिलाकर पीते जब भी,
लगती तभी निराली चाय!

लेमन वाली, अदरक वाली,
मन को दे खुशहाली चाय!

हरा पुदीना इसमें डाला,
नहीं फकत यह खाली चाय![…]

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म्है दाण नीं ! प्राण देवूंला

माड़वो पोकरण रै दिखणादै पासै आयोड़ो एक ऐतिहासिक गांम है। जिणरो इतिहास अंजसजोग अर गर्विलो रैयो है। पोकरण राव हमीर जगमालोत ओ गांम अखै जी सोढावत नै दियो। जिणरी साख री एक जूनै कवित्त री ऐ ओल़्यां चावी है-

हमीर राण सुप्रसन्न हुय, सूरज समो सुझाड़वो।
अखै नै गाम उण दिन अप्यो, मोटो सांसण माड़वो।।

इणी अखैजी रै भाई भलै जी रै घरै महाशक्ति देवल रो जनम हुयो-

भलिया थारो भाग, देवल जेड़ी दीकरी।
समंदां लग सोभाग, परवरियो सारी प्रिथी।।

ओ ई बो माड़वो है जठै भगवती चंदू रो जनम हुयो जिण सांमतशाही रै खिलाफ जंमर कियो। इणी धरा रा सपूत मेहरदान जी संढायच आपरी मरट अर स्वाभिमानी चारण रै रूप में चौताल़ै चावा रैया हा।[…]

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