रंग रे दोहा रंग – जोगमाया को रंग

शक्ति की भक्ति का पर्व चैत्र नवरात्र अपने चरमपर है। और अभी अभी ही फागुन और बसंत बीता है। लगता है फागुन के पलाश का रंग हमारे तन मन से अभी उतरने का नाम ही नहीं ले रहा है। जैसा कि पहले ही बता चुका हूं। राजस्थानी दोहा साहित्य में रंग के दोहों की एक भव्य परंपरा रही है। यह परंपरा आज भी आप किसी सुदूर थली थार के रेगिस्तान में गांव, चौपाल, ढाणी आदि के सुबह सुबह के मेल मिलाप (रेयाण)आदि में आप को ढूंढने पर जरूर दिखाई पडेगी।[…]

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वीरां माऊ वंदना

सिरुवै जैसल़मेर रा रतनू हरपाल़जी समरथदानजी रा आपरी बगत रा स्वाभिमानी अर साहसी पुरस हा। इणां री शादी रतनुवां रा बही राव, रावजी पूनमदान नरसिंहदानजी बिराई रै मुजब गांम सींथल़ रा बीठू किशोरजी डूंगरदानजी रां री बेटी वीरां बाई साथै होई।

जद जैसलमेर रा तत्कालीन महारावल़ जसवंतसिहजी (1759-1764वि)अर भाटी तेजमालजी रामसिंहोत रै बीच अदावदी बढी उण बगत हरपालजी ई भाटी तेजमालजी रै साथै हा। महारावल़ अर भाटी तेजमालजी रै बिचाल़ै हाबूर री गेह तल़ाई माथै लड़ाई होई उण बगत भाटी तेजमालजी संजोगवश निहत्था सो वीरगति(1763वि.बैसाग 8)नै पाई। (संदर्भ जैसलमेर भाटी शासक उनके पूर्वज एवं वंशजों का क्रमबद्ध स्वर्णिम इतिहास-गोपाल सिंह भाटी तेजमालता) महारावल़ उणां री पार्थिव देह नै अग्नि समर्पित करण सूं सबां नै मना कर दिया। उण बगत रतनू हरपालजी हाबूर ऊनड़ां साथै मिल़र महारावल़ री गिनर करियां बिनां दाग दियो-

झीबां पाव झकोल़िया, उडर हूवा अलग्ग।
पह रतनू हरपाल़ रा, प्रतन छूटा पग्ग।।[…]

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गीत तेमड़ाराय रो

।।गीत-प्रहास साणोर।।
करां झूल़ तिरशूल़ ले चढै तूं केसरी,
लेसरी नहीं अब ढील लाजै।
हेर सत सेवगां सीर हरमेसरी
ईसरी नेसरी भीर आजै।।1

भगत रा देख नित मनां रा भावड़ा,
तावड़ा, छांह कर तुंही टाल़ै।
मदत तैं आजलग करी नित मावड़ा,
पेख मग आवड़ा बो ई पाल़ै।।2[…]

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रंग रे दोहा रंग – हंस और काग

हंस को प्राचीन काव्य में, खास कर लोक साहित्य में खुब महिमान्वित किया गया है। हंस को आत्मा के प्रतीक रूप में भी कई संत कवियों ने प्रयुक्त किया गया है। पुराने जमाने में साधु संतो फकीरों और दिव्यगुणों से युक्त औलिया पुरूषों के आगे परमहंस बिरूद लगाया जाता था। जैसे कि रामकृष्ण परमहंस। आज भी बड़े बड़े संत महात्मा और महामंडलेश्वर अपने आगे परमहंस का बिरूद लगाते हुए आप को मिल जाएगें।

हंस के संबोधनी-काव्य दोहा, अन्योक्तियां, प्राचीन भजन, संस्कृत सुभाषित आदि से भारतीय साहित्य भरा पड़ा है। हंस में नीर क्षीर को परखने की द्रष्टि है, कला है, जो उसे अन्य पक्षीयों से अलग करती है। हंस मां सरस्वती का वाहन है। कवि नाथू सिंह महियारिया ने अपने ग्रंथ “वीर सतसई” में हंस जो कि सदैव मोती का चारा चुगता है उस को आधार बनाकर सरस्वती की श्रेष्ठता सिद्ध करने की कोशिश करी है। दोहा कुछ यूं है।

सुरपति वाहण तरु भखै, नरपति वाहण नाज।
तौ वाहण मोती चुगै, थूं सारां सिरताज।।[…]

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रंग! रे दोहा रंग! – हंस की अन्योक्ति

आज कल सोशियल मीडिया साहित्यिक ज्ञान के आदान प्रदान का एक सशक्त माध्यम बना हुआ है। सोशियल मीडिया पर ट्वीटर पर हाल ही में प्रताप सोमवंशी साहब जो कि दैनिक हिंदुस्तान में वरिष्ठ संपादक है और देश के बहुत ही उम्दा शायरों में शुमार एक शायर हैं, नें कुछ दिन पूर्व जब एक लोक दोहा जो हंस पर था वह शेयर किया जो उन्होंनें 1959 में कुतुर्उरल एन हैदर द्वारा लिखी किताब “आग का दरिया” में पढा था। दोहा कुछ यूं था।

ताल सूख पत्थर भयो, हंस कहीँ न जाय।
पीत पुरानी कारणे, चुन-चुन कांकर खाय।।

तो इस दोहे की वजह से उनसे साहित्यिक संवाद का स्वर्णिम अवसर मिला और मुझे लगा कि क्यों न हंस पर लिखे अन्य अन्योक्ति परक प्राचीन दोहे जो मेरे संज्ञान में है सुधि पाठकों के बीच साझा किये जाएँ ?[…]

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माणस अर माछर

ओ छोटो सो जीव रंगीलो, बात होळै सी कह्वै कान में।
करै कुचरणी, नींद उड़ावै, रक्तपान नै धार ध्यान में।।
ऊमस, गरमी हुवो कितीही, भांवै सांस निकाळै आवै।
आँख लागतां पाण जुझारू, सागण जूनी तान सुणावै।।
कड़कड़ ठंड दांत कड़कावै, भांवै बरसै मूसळाधार।
ओ नीं सोवै नीं सोवण दे, ओ छोटो मोटो सरदार।।[…]

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गीत झिणकलीराय शीलां माऊ रो

।।गीत प्रहास साणोर।।
तूं शंकर रै सदन अवतार ले शंकरी,
पखो नित धार रखवाऴ पातां।
जगत में जाण जयकार मुख जापियो,
साच सुख सार ज्यां दियो सातां।।1

ताकड़ी बहै इम केहरी ताणवां,
सिमरियां भाणवां साय शीलां।
पाणवां शूऴ धर रचै हद प्रवाड़ा,
हाणवां उपाड़ै हियै हीलां।।2[…]

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म्हांरै जीवतां डंड भरावै! उणां री भुजां में गाढ चाहीजै!!

भारत रै इतिहास अर विशेषकर राजस्थान रै इतियास में चहुवांणां रो नाम ऊजल़ो। गोगदेव, अचल़ेश्वर पृथ्वीराज, कान्हड़देव, वीरमदेव, मालदेव बणवीर, हम्मीर, कान्हो डूंगरोत, सांवल़दास-करमसी जैड़ा अनेक सपूत चावा रैया है। किणी कवि कैयो है-

गोकल़ीनाथ जग जापिये, कान्हड़दे मालम करै।
ए राव सुखत्री ऊपना, चवां वंश चहुवांण रै।।

चहुवांणां री एक शाखा ‘वागड़िया चहुवांण’। इण शाखा में मुंधपाल मोटो मिनख होयो। इणी मुंधपाल री वंश परंपरा में बालो अर बालै रै डूंगरसी होयो। डूंगरसी, राणै सांगै रै मोटै सामंतां में शुमार। जिणरै बदनोर पटै। डूंगरसी कई जुद्धां में आपरी वीरता बताई।[…]

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मन अनुरागी माव रो

मन अनुरागी माव रो, रागी औ तन राम।
लागी लगनी लाल री, बजै बीण अठजाम।।१

गावूं जस गोपाल रो, रोज सुणावूं राग।
लगन लगावूं लाल सूं, पावूं प्रेम अथाग।।२

आव!आव! री रट लियां , बैठौ आंगण-द्वार।
बोलावूं बीणा बजा, झणण करे झणकार।।३

सांई!थारी साँवरा, गाई जिण गुण गाथ।
उण पाई संपत अचल, गात गात वध जात।।४[…]

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रंग रे दोहा रंग – रंग! फागण

रंगो की दुनिया का खेल ही निराला है। हर इक शख्श ने इसे होली का नाम दे डाला है। प्रकृति भी भला उससे कैसे अछुती रहती, डार डार और पात पात मनोहारी पुष्प बसंत में ऐसे लगते है मानो कोई रंगशाला है। बसंत को ऋतुराज कहा गया है। तो शृंगार रस को रसों का राजा कहा गया है। अगर मैं ब्रजभाषा के कवि “देव” के शब्दों में कहूं तो “बानि को सार बखान्यो सिंगार, सिंगार को सार किशोर किशोरी”। कहने का मतलब है कि रसों का सार शृंगार है और शृंगार का सार श्री कृष्ण और राधा रानी है। श्री कृष्ण भले ही श्याम वर्ण हो पर उनका भी एक नाम “रसराज” है। श्री कृष्ण और श्री राधा रानी की कल्पना मात्र से ही हम ब्रजमंडल की करीलकुंजों में खुद को खोया हुआ महसूस करते है। श्री कृष्ण और राधा रानी सदैव लीलालीन रहते है। वह रास, और होली, फगुवा आदि खेलते रहते है।

रँग फागण रँग राधिका, रंग कोटि रसराज।
रँग रँग कर दी कल्पना, रँग बरसे ब्रज आज।।
इस फागुन को रंग है, राधा रानी को रंग है और कोटिश:रंग रसराज श्रीकृष्ण को है जिनकी वजह से मन की कल्पनाओं में रंग भर दिया है। ब्रजमंडल में रस की झडी बरस रही है।[…]

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