सखि! घर आएँगे चितचोर
आँगन द्वारे कागा बोले, थिरक उठा मन-मोर!
सखि! घर आएँगे चितचोर!
खड़ी अटरिया राह निहारूँ, कब घर आवै कंथ?
मुख-थाली में नैन-दीप धर, तकूँ पिया का पंथ!
बंद पलक कर रखूँ सजन को, कर काजल की कोर!
सखि! घर आएँगे चितचोर!
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आँगन द्वारे कागा बोले, थिरक उठा मन-मोर!
सखि! घर आएँगे चितचोर!
खड़ी अटरिया राह निहारूँ, कब घर आवै कंथ?
मुख-थाली में नैन-दीप धर, तकूँ पिया का पंथ!
बंद पलक कर रखूँ सजन को, कर काजल की कोर!
सखि! घर आएँगे चितचोर!
महाकवि पृथ्वीराज राठौड़ रचित अनुपम प्रबंध काव्य।
भावार्थ – श्री मातु सिंह राठोड़
छंद – वेलियो
।।मंगलाचरण।।
परमेसर प्रणवि, प्रणवि सरसति पुणि
सदगुरु प्रणवि त्रिण्हे तत सार।
मंगळ-रूप गाइजै माहव
चार सु एही मंगळचार।।1।।
आज चाल आकास रो, आपां देखां छोर।
म्है थांनें देख्या करूं, थें देखो मम ओर।।१
मन री गति सूं मानुनी, आवौ मम आवास।
छत पर दोन्यूं बैठ नें, देखांला आकास।।२
गिण गिण तारां रातड़ी, आज बिताद्यां, आव!
अर दोन्यूं ल्यां नाप फिर, आभ तणौ उँचाव।।३[…]
।।परित्यक्ता।।
उर में अति अनुराग सखी,
विरह की मीठी आग सखी!!
नयन भटकते दूर दूर जब
आँगन बोले काग सखी !!
अपनी ही सांसों में दो रुत,
लख कर जाती जाग सखी!![…]
यह छंद महाकवि सूर्यमल्ल रचित खंडकाव्य राम रंजाट से लिया गया है। उल्लेखनीय है कि महाकवि ने इस ग्रन्थ को मात्र १० वर्ष की आयु में ही लिख डाला था।
।।छंद – त्रिभंगी।।
सौलह सिनगारं, सजि अनुसारं, अधिक अपारं, उद्धारं।
कौरे चख कज्जळ, अति जिहिं लज्जळ, दुति विजज्जळ, सुभकारं।।[…]
जावण नी द्यूं नंद कुमार!
रोकण करसूं जतन हजार!
नैण कोटड़ी राज छुपायर, बंद पलक कर द्वार।
दिवस रैण प्हेरो हूं देवूं, काढे़ काजल़ कार!।।१
जावण नी द्यूं नंद कुमार!
रोकण करसूं जतन हजार!
रोज रीझावूं रसिक मनोहर, निज रो रूप निखार।
प्हेर पोमचो नाचूं छम छम, सज सोल़े सिणगार।।२[…]
साँवरा! बाजी खेलो! चोपड़ ढाल़ी!
हारूं तो हरि दासी थोंरी, जीत्यां थें मारा वनमाल़ी!
नटनागर जाजम है ढाल़ी, बैठो आप बिचाल़े।
म्हूँ बैठूं चरणाँ रे नेड़ी, पीव पलांठी वाल़े।।
धवली कबड़ी रख धरणिधर, म्हनै दिरावो म्हारी काल़ी।।१
साँवरा! बाजी खेलो चोपड़ ढाल़ी!
हारूं तो हूं दासी थोंरी, जीत्यां थें मारा वनमाल़ी![…]
काव्य का सृजन एक निरंतर प्रक्रिया है जो अनवरत कवि के मस्तिष्क में चलती रहती है। अच्छे कवि या लेखक होनें की प्रथम शर्त यह है कि आप को अच्छे पाठक होना चाहिए। कई बार हम अपने पूर्ववर्ती कवियों को पढते है तो उनके लेखन से अभिभूत हुए बगैर नहीं रह सकते। आज मैं मेरे खुद के लिखे ही कुछ दोहे आपको साझा कर रहा हूं जो मैंने डिंगल/राजस्थानी के प्रसिद्ध कवि बांकीदास आसिया की अमर पंक्ति “सखी! अमीणो साह्यबो” से प्रेरणा लेकर एक साल पहले लिखे थे। बांकीदास ने अपने ग्रंथ सूर छत्तीसी में “सखी! अमीणों साह्यबो” में उस काल के अनुरूप नायिका से वीर पत्नी के उद्गार स्वरूप वह दोहै कहलवाये थे।
मैं अपने बनाए दोहे यहाँ पर आप को साझा करूं उससे पहले कविराजा बांकीदास आसिया जिनकी एक अमर पंक्ति ने मुझ जैसे अकिंचन को लिखने का एक नया विषय दिया उनके दोहै साझा करता हूं।
सखी! अमीणों साह्यबो, बांकम सूं भरियोह।
रण बिगसे रितुराज में, ज्यूं तरवर हरियोह।।
वीर योद्धा की नायिका अपनी सहेली से कहती है “हे सखी मेरा प्रियतम वीरत्व से भरा हुआ है। वह युद्ध में इस प्रकार विकसित(खुश)होता है, जिस प्रकार बसंत रितु के आगमन पर पेड हरा भरा हो जाता है।[…]
ચોગરદમ ફૈલ્યુ અજવાળું
મન ના ઘર માં આજે માળુ!
ચોગરદમ ફૈલ્યુ અજવાળુ!
દીપ જલાવી કોણ ભગાડે,
અંધારું આ ભમ્મર કાળુ!
એ જ કાશ મળવા આવ્યા છે,
લાવ ઢોલિયો અંદર ઢાળુ!
સખી!સહજ શણગાર કરી લઉ,
આપ પટોળા ,મલમલ, સાળું![…]