चारण को जानें – प्रश्नोत्तरी – 2025

चारण को जानें – ऑनलाइन प्रश्नोत्तरी – 2025 वर्तमान मेरिट – शीर्ष 15 प्रतिभागी नोट: यदि किन्हीं दो प्रतिभागियों के समान अंक हैं तो सबसे नए जुड़े प्रतिभागी को वरीयता क्रम मे ऊपर रखा गया है। प्रश्नोत्तरी में भाग लेने के लिए निम्न लिंक को क्लिक करें। <<<चारण को जानें – प्रश्नोत्तरी -2025 (यहाँ क्लिक करें)>>>   नियम चारण परंपरा, चारण साहित्य एवं चारण इतिहास विषयक प्रश्न पूछे जाएंगे। इसमे कोई भी भाग ले सकता है। पात्रता के लिए किसी प्रकार की कोई शर्त नहीं है। कुल 100 वस्तुनिष्ट प्रश्न होंगे जिसके लिए ओसतन 90 मिनट (डेढ़ घंटे) का समय […]

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बरसाळो – दो दिवसीय कलरव कवि-सम्मेलन

काव्य कलरव अंतरराष्ट्रीय व्हाट्सएप समूह दिनांक समय लिंक पैलो दिन 26 जुलाई, 2025 शनिवार सिंझ्या 08.00 बज्यां फेसबुक रो लिंक (पैलो दिन): https://www.facebook.com/charans.org/videos/1671881790143202 यूट्यूब रो लिंक (पैलो दिन): https://youtube.com/live/OtN5bxpjw-Q दूजो दिन 27 जुलाई, 2025 रविवार सिंझ्या 08.00 बज्यां फेसबुक रो लिंक (दूजो दिन): https://www.facebook.com/charans.org/videos/1027327892587361 यूट्यूब रो लिंक (दूजो दिन): https://youtube.com/live/6mOfp5HiLmQ   सरस काव्य रसास्वादन सारू आप सबनैं घणैमान नूंतो है।

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रघुवरजसप्रकास [6] – किसनाजी आढ़ा

— 105 — अथ चौटीबंध छप्पै लछण दूहौ आद कहै सौ अंत में, नांम गणत नरबाह। सिरै कवित बंधै सिखा, चौटीबंध सराह।।२४६ अथ चौटीबंध छप्पै उदाहरण सूरजपणौ सतेज, स्रवण अम्रत हिमकर सम। उर दाहक सम आग, तौर सुर-राज राज तिम।। सत हरचंद समांन, प्रगट दरियाव अथघपण। सुर तर आस सपूर, जांण पारस सेवक जण।। रवि अमी आग इंद चंद हरि, दूध सुरतरमण आद ले। परभाव आठ निज कांम पर, एक रांम तन ऊझळै।।२४७ अथ हीराबेधी छप्पै लछण दूहौ एकण हीरौ विहरियां, दूजौ हीरौ थाय। हीराबेधी कवित जिम, दोय अरथ दरसाय।।२४८ अथ हीराबेधी छप्पै उदाहरण नारंगी संसार नीम, ऊंबर कर अंबह। […]

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रघुवरजसप्रकास [5] – किसनाजी आढ़ा

— 73 — अथ गाथा उदाहरण गिरिस गिरा गौ गौरी, हर गिर हिम हंस हास सिस हीरा। सुसरि सेस सुरेसं ए, स्रीरांम क्रत आरख्यं।।१३० अथ गाथा गुण दोस कथन छंद बेअखरी निज आखै किव ‘किसन’ निरूपण, सुणौ गाहा गुण दोस सुलछण। सात चतुरकळ अंत गुरु सज्ज, देह छठे थळ जगण तथा दुज।।१३१ बांधव पूरब अरध एण बिध, यम हिज जांण जगण उत्तरारध। काय छठे थळ यक लघु कीजै, दुसट विखम थळ जगण न दीजै।।१३२ मत्त सतावन स्रब गाथा मह, कळातीस पूरबा अरध कह। वीस सात कळ उतर अरध विच, रेणव अेम छंद गाथौं रच।।१३३ पाय प्रथम पढ़ हंस गमण पर, […]

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रघुवरजसप्रकास [4] – किसनाजी आढ़ा

— 41 — अथ मात्रा व्रत्ति वरणण दूहा मत्त व्रत्त में सुकव मुण, मात्र प्रमांण मुकांम। आवै समता आखिरां, वरण व्रत्त जिण ठांम।।१ मत्त व्रत हिक अह मुणी, पढ़ि सौ च्यार प्रकार। मत्त छंद उप छंद पद, असम सुदंडक धार।।२ छंद चंद्रायणौ* लग मत्ता चौवीस छंद मत्त लेखजै। सुज यां अधिका मत उपछंद विसेखजै।। वरण मत सम नहीं असम पद जांणजै। बे छंदां मिळ दंडक मत्त बखांणजै।।३ अथ मात्रा छंद तंत्र गमक छंद पंच मत, गमक सत। सीत बर, रांम रर।।४ छंद बांम छ मात्रा छ मत ‘बांम’ समरि स्यांम। झूठ धंध, मन म बंध।।५ १. मुकांम-स्थान। आखिरां-अक्षरों में। ठांम-स्थान। […]

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रघुवरजसप्रकास [3] – किसनाजी आढ़ा

— 17 — अथ मात्रा स्थांन विपरीत कड़ौट फेर प्रस्तार लछण। दूहौ अंत गुरु तळ लघु धरौ, आगै पंत समांण। ऊबरे सौ गुरु लघु धरौ, पाछै एह प्रमांण।।५७ अथ मात्रा स्थांन विपरीत कौ प्रकारांतर। चौपई अंत निकट लघु सिर गुरु धरौ, अधर पंत सम अग्र विचारौ। ऊबरे सौ पाछै लघु आवै, कळा थांन विपरीत कहावै।।५८ अथ मात्रा संख्या विपरीत कौ प्रकारांतर दोनूं भेळा कहै छै। चंद्रायणौ आद अंत लघु संनिध तळ गुरु आंणजै। जेम प्रकारांतर गुरु सिर लघु जांणजै।। धुर सम पछ लघु गुरु लघू फिर कीजिये। संख्या बिहुं प्रकार उलट्ट सुणीजियै।।५९ वारता संख्या विपरीत का आद लघु का अंतकौ […]

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रघुवरजसप्रकास [1] – किसनाजी आढ़ा

— i — भूमिका संस्कृत साहित्य में छंदशास्त्र का विशेष स्थान है। वेद के छः अंगों (१ छंद, २ कल्प, ३ ज्योतिष, ४ निरुक्त, ५ शिक्षा और ६ व्याकरण) में छंदशास्त्र भी एक महत्वपूर्ण अंग है। इसका स्थान पाद (चरण) माना गया है। कारण कि इसके बिना गति-क्रिया किसी की सम्भव नहीं, अतः वेद में भी छन्दस्तु वेदपाद: कहा गया है। यह कहना कोई अत्युक्ति नहीं कि हमारे पूर्वाचार्यों ने काव्य-रचना में छंदशास्त्र की उतनी ही आवश्यकता मानी है जितनी व्याकरण की। कालान्तर में अनेक भाषाओं का प्रादुर्भाव संस्कृत भाषा से हुआ जैसे कि प्राकृत, अपभ्रंश आदि। इन भाषाओं के […]

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गीता रौ राजस्थानी में भावानुवाद-पैलो अध्याय

पैलो अध्याय – अर्जुनविषादयोगः ।।श्लोक।। धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सुव:। मामका: पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत सञ्जय।।१।। ।।चौपाई।। भाळ धरा कुरुखेत धुजाई लड़ण भिड़ण री लोय लगाई। मम सुत अर पाण्डव रा जाया संजय हुय की देख बताया।।१।। (लोय= लड़ण री इच्छा ) (बताया=बताना) ।।भावार्थ।। संजय सूं धृतराष्ट्र कैवै-हे संजय! म्हनै आ बता कै धर्म री धरा कुरुक्षेत्र में म्हारा अर पाण्डव रा बेटा युद्ध करण खातर गया है उण ठौड़ इण बगत कांई होय रह्यौ है थारी दिव्य दीठ सूं देख ‘र बता। ।।श्लोक।। दृष्ट्वा तु पाण्डवानीकं व्यूढं दुर्योधनस्तदा। आचार्यमुपसड़्गम्य राजा वचनमब्रवीत्।।२।। ।।चौपाई।। दळ पाण्डव देखत हुय दोरौ प्रळय मचण रौ लाग्यौ ब्योरौ। […]

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