मैं ही तो मोरवड़ा गांव हूं

मैं ही तो मोरवड़ा गांव हूं। हां भावों के अतिरेक में हूं तभी तो यह मैं भूल ही गया कि आप मुझे नहीं जानतें। क्योंकि मेरा इतिहास में कहीं नाम अंकित नहीं है। होता भी कैसे ?यह किन्हीं नामधारियों का गांव नहीं रहा है। मैं तो जनसाधारण का गांव रहा हूं जिनका इतिहास होते हुए भी इतिहास नहीं होता। इतिहास सदैव बड़ों का लिखा व लिखाया जाता है। छोटों का कैसा इतिहास?वे तो अपने खमीर के कारण जमीर को जीवित रखने के यत्नों में खटते हुए चलें जाते हैं।…

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इसी जमर अग्नि से तूं जलेगा

(लाछांबाई खिड़ियांणी जानामेड़ी की जमर कथा) मयूर कितना सुंदर पक्षी होता है। शायद उसे अपनी इसी सुंदरता पर गर्व भी है लेकिन जब वो अपने फटे व धूसर पैरों को देखता है तो उसे अपनी सुंदरता विद्रूप लगने लगती है, और उसे रोना आ जाता है। तभी तो यह कहावत चली है कि ‘मोरियो घणो ई रूपाल़ो हुवै पण पगां कांनी देखै जणै रोवै।’ यही बात कमोबेश चारण इतिहास संबंधी शोध करते या लिखतें समय होती है। जिन लोगों ने दूसरों पर बहुत विस्तार से लिखा लेकिन स्वयं की बातें केवल श्रुति परंपरा में संजोकर रखी। श्रुति परंपरा में एक […]

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मोरवड़ा मे सांसण की मर्यादा रक्षार्थ गैरां माऊ का जमर व 9 चारणों का बलिदान (ई. स.1921)

प्रसंग: सिरोही राज्य पर महाराव केशरीसिंह का शासन था। राज्य आर्थिक तंगी से गुजर रहा था। राज्य की माली हालात सुधारने के नाम पर खजाना भरने की जुगत में दरबार ने कई नये कर लगाकर उनकी वसूली करने का दबाव बनाया। जिन लोगों को कर वसूल करने की जिम्मेदारी दी उन्होंने पुरानी मर्यादाओं और कानून कायदों की धज्जियां उड़ाते हुए उल्टी सीधी एवं जोर जबरदस्ती से कर वसूल करना शुरू कर दिया।

इसी कर-वसूली के लिए एक जत्था मोरवड़ा गाँव मे भी आया। मोरवड़ा गाँव महिया चारणों का सांसण मे दिया गाँव था। सांसण गांम हर प्रकार के कर से एवं राजाज्ञा से मुक्त होता है। ये बात जानते हुए भी दरबार के आदमियों ने आकर लोगों को इकठ्ठा किया और टैक्स चुकाने का दबाव बनाया। गाँव के बुजुर्गों ने उन्हे समझाया कि ये तो सांसण गांव है! हर भांति के कर-लगान इत्यादि से मुक्त, आप यहाँ नाहक ही आए! यहाँ सिरोही राज्य के कानून नहीं बल्कि हमारे ही कानून चलते हें और यही विधान है।[…]

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लक्ष्मणदान कविया खैण – परिचय

…आज राजस्थानी में लिखै घणा ई है पण उणांरो लिख्यो पढां जणै सावजोग समझ सकां कै ऐ कवि वैचारिक कुंडाल़िए सूं बारै आय’र जनमन नै समझण अर उणरी कोठै में उपजी नै आपरै होठै लावण सूं शंकै। पण जनमन नै समझ’र उणरी अंतस भावना नै आपरै आखरां पिरोय बिनां हाण लाभ रै फिकर में जन जाजम माथै राखी है उणांमें लक्ष्मणदान कविया खैण रो नाम हरोल़ में है। साहित्य मनीषी कन्हैयालाल सेठिया रै आखरां में “लक्ष्मणदान कविया राजस्थानी रा लोककवि है। आंरी कवितावां जुगबोध अर जुग चेतना सूं जुड़्योड़ी है।” जिण कवि री कवितावां जुगबोध अर जुग चेतना सूं जुड़ी थकी है उवो कवि इज सही अरथां में लोककवि है।…

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भक्त कवि मुरारदानजी आशिया नोखड़ा

बीसवीं सदी में डिंगल़ रा केई सिरै कवेसर होया, जिणां आपरी सिरजणधारा सूं समाज नै नवो भावबोध अर साहित्य नै ऊंचाई दी। ऐड़ै ई विरल कवियां मांय सूं एक हा मुरारदानजी आशिया नोखड़ा। नोखड़ा आशिया चारणां रो गांम। जठै साहित्यकारां अर साहित्य सेवियां री एक लंबी श्रृंखला रैयी है। जिणांमें भैरजी आशिया, वांकजी आशिया आद कवेसर इण थल़वट में चावा हा। भैरजी रचित करनीजी रो चित इल़ोल गीत तो इतरो लोकप्रिय है कै सैंकड़ू जणां रै कंठाग्र है-

सबल़ तोरो देख सरणो, ओट लीधी आय।
भणै यूं कर जोड़ भैरूं, पड़्यो रैसूं पाय।
तो महमायजी महमाय, मोपर महर कर महमाय।।

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इयां मरै को नीं भाऊ!!

एक’र पोकरण रै आसै-पासै भयंकर काल़ पड़ियो। काल़ नै तो कीकर ई कूटर काढणो पड़सी! आ विचार नै अठै रा दो आदमी सिंध ग्या।

सिंध रै किणी गांम में पूगा, उठै उणां देखियो कै किणी धायै घर री बहुआरी गूंघटै में आपरै फल़सै रै बारलै वल़ा फूस बुहार रैयी है।

एक आदमी बोलियो ‘भइया कोई ओसाण करां ! जिको झांकल़ री ठौड़ हुवै!!’
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राजस्थानी साहित्य रा आगीवाण – डॉ. शक्तिदान कविया – विनिबंध

डिंगल काव्यशैली रा मर्मज्ञ अर राजस्थानी रा चावा-ठावा साहित्यकार डॉ. शक्तिदान कविया रो जलम 17 जुलाई 1940 (सरकारी कागजां रै मुजब) नै जोधपुर जिलै री शेरगढ तहसील रै गांव ‘बिराई’ में हुयो। आपरै पिताजी रो नाम गोविन्ददानजी कविया अर माताजी रो नाम फूलांबाई हो। गोविन्ददानजी डिंगल अर पिंगळ रा नामी विद्वान हा। काव्यपाठ रा मर्मज्ञ, सतोगुणी अर विलक्षण स्मृति रा धणी हा। चौखळै में आछी प्रतिष्ठा ही, पंच पंचायती में सखरी पैठ ही, छत्तीस ई कौम रा लोग वां री बात मानता। आपरी ग्राम पंचायत रा निर्विरोध उपसरपंच रैया। पंचायत समिति-बालेसर में सहवृत्त सदस्य रै रूप में लब्धप्रतिष्ठ व्यक्ति रै रूप में सर्वसम्मत मनोनीत हुया। 85 बरस री उमर ताई डिंगल-काव्यपाठ सारू आकाशवाणी आवता-जावता।[…]

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राजस्थानी लोक मानस में गाँधी

राजस्थानी लोक जीवन में एक लोकोक्ति प्रसिद्ध है कि ‘‘ज्यांरी सोभा जगत में, वांरो जीवण धन्न’’ अर्थात इस संसार में उन्हीं लोगों का जीवन धन्य माना जाता है, जिनकी सुकृति की शोभा लोकजिह्वा पर विराजमान रहती है। इस दृष्टि से विचार किया जाए तो विगत एक सदी में लोककंठ पर किसी एक व्यक्ति की सर्वाधिक शोभा विराजमान रही है तो वह नाम है- श्री मोहनदास कर्मचंद गाँधी। राष्ट्रपिता के विरुद से विभूषित महान व्यक्तित्व के धनी महात्मा गाँधी अपनी रहनी-कहनी की एकरूपता, उदात्त जीवन-दृष्टि, मानवीय मूल्यों के प्रति दृढ़ निष्ठा, सत्य में अडिग विश्वास, आत्मबल की पराकाष्ठा, राष्ट्र के प्रति अनुराग, वक्त की नजाकत को पहचानने के कौशल, अन्याय के प्रबल प्रतिकार और अहिंसा के सबल समर्थन इत्यादि वैयक्तिक विशिष्टताओं के कारण भारतीय लोकमानस पर अपनी अमिट छाप छोड़ने में साफल्यमंडित हुए। […]

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राजस्थानी लोककथाओं के आधुनिक रूपांतर का पर्याय: श्री बिज्जी

जब हम राजस्थानी कथा साहित्य एवं लोक साहित्य की बात करते हैं तो पद्मश्री विजयदान देथा का नाम अनायास ही हमारी जुबां पर आ जाता है। अेक व्यक्ति जिसने अपनी श्रमनिष्ठ साधना के बल पर राजस्थानी लोक साहित्य को वैश्विक ख्याति दिलाने का श्लाघनीय कार्य किया। इतिहास इस बात का साक्षी है कि कवीन्द्र रवीन्द्र नाथ ठाकुर के बाद हिंदुस्तान के किसी साहित्यकार को साहित्य के क्षेत्र में नोबल पुरस्कार नहीं मिल पाया। यद्यपि श्री विजयदान देथा जी भी नोबल पुरस्कार प्राप्त नहीं कर पाए लेकिन उन्होंने अपने रचना कर्म के बल पर नोबल पुरस्कार प्रदात्री समिति का ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया। जिसका सुखद परिणाम यह हुआ कि राजस्थानी भाषा के किसी साहित्यकार का नाम नोबल पुरस्कार हेतु नामित हुआ और वह नाम और कोई नहीं श्री बिज्जी का नाम था।[…]

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कहां वे लोग, कहां वे बातें ?

।।18।।
गुण नै झुरूं गंवार!

महात्मा ईशरदासजी बारठ ने कितना सटीक दोहा कहा था कि-

नेह सगा सोई सगा, तन सगा ना होय।
नेह विहूणी ईसरा, करै न सगाई कोय।।

अर्थात स्नेह ही सगे होने का आधार है। इसके उदाहरण प्रहलाद-हिरणाकश्यप-होलिका, व कंस-उग्रसेन आदि को हम देख सकते हैं, जिन्होंने सगे होते हुए भी अपनों के साथ क्या व्यवहार किया था[…]

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