सरस्वती वंदना
कुन्द-इन्दु सम श्वेत कलेवर, श्वेत वस्त्र तन धार!
मम जिह्वा पर आप विराजो, कविता की दातार!!1
आप को वंदन बारंबार!!…
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कुन्द-इन्दु सम श्वेत कलेवर, श्वेत वस्त्र तन धार!
मम जिह्वा पर आप विराजो, कविता की दातार!!1
आप को वंदन बारंबार!!…
दोहा पति जयपुर जोधाण पत, भेळा होय दो भूप। सांभर की किन्हीं सला, रच्यो राड़ को रूप।।1।। कूरम भाखी कमधजां, असी करां उपाय। उभयराज राखां अठै, आख्या चौड़े आय।।2।। आप पति आमेर है, कही कमध कर जोड़। मो आफत बीती हमे, रूस रह्या राठौड़।।3।। तिण जागां इक तुरकड़ी, आई करण उपाय। बहकाई दळ देखकर, जकी सुणाई जाय।।4।। जयपुर दळ आयो जबर, हारो मत अब धीर। ताण दिया तम्बु बड़ा, नळियासर की तीर।।5।। शेख समद काजी मुगल, सुण सारा समचार। मदद बुलायो मीर खां, धीरज मन में धार।।6।। आठ दिवस आयो नहीं, मुगलन को बो मोड़। सा सांभर खाली करो, कच्छावन […]
» Read moreगीत – बडो साणोर
अजब फेसबुक वाटसफ टवीटर ओपिया,
ग्राम इंस्टा गजब रचे गोटा।
सोसयल मीडिया तणा रांगड़ सजे,
मचाया मुलक में ख्याल म्होटा।।१[..]
।।गीत – प्रहास साणोर।।
विगत रयो रूढीपणा तणे वड ग्रासगत,
मिळी हिंदवांण नै आज मुगती।
वरण विग्यान रौ चहुंदिश वापर्यौ,
संचरी रिवगरण रूप सगती।।1[…]
एक गाँव, गाँव में दसवीं तक रो इसकूल, इसकूल में तीन सौ टाबर पढणने आवै। हेडमास्टर समेत इग्यारे मास्टर जका टाबरां ने हेत अर लगन साथे पढाई करावे।
इसकूल रे साथेई गांव में पटवार-घर अर पंचायत-भवन भी हुया करै है। पटवारी अर गाँव सचिव आपूआप रा काम करै अर इसकूल रा मासटर आपरो।
गाँव रा लोग पटवारी अर गाँव सचिव रो तो आदर माण करे क्यां के आ हूं हरेक रो काम पड़े, काम भलाईं पईसा देर कराओ।
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दोहा
पुर-काशी-वासी! बटुक!, अविनाशी! चख-लाल!
खर्पराशि! सुखराशि! विभु, नाशी भय भ्रम-जाल!!१
भैरव! भयहर! भूतपति!, रुद्र! वेश-विकराल!!
दास जानि करियो दया, व्योमकेश! दिगपाल!!२
भैरव-आरती
आरती! मधुर उचारती, भारती! भैरवनाथ तिहारी!
दुर्धर-रव! खप्पर कर! अभीरव! जय शमशान विहारी!!१[…]
॥छंद त्रोटक॥
रुक वाव सियारिय बोल रही।
मतवाल उगो किरणाळ मही।
सुरंगो नभ सोसनिया सबही।
जळ धार अपार भया जबही।
धुरवा सुभराट चढै सखरो।
मतवाळ घुरै मुधरो मुधरो।।1।।[…]
।।श्री जुन्झार जी।।
सिरोही राजा सोखियो, दुश्मण लीधो देख।
जद्ध किधो महियों जबर तन मन दही न टेक।।
अहि भ्रख भूपत आदरयो, कीध भयंकर कोम।
केशर नृप उन्धी करी, सिरोही रे सोम।।[…]
।।छंद सारसी।।
रम्मवा रंगूं ऊभ अंगूं, वेस चंगूं वेवरं।
चूड़ा भळक्कूं चीर ढक्कूं, पै खळक्कूं नेवरं।
संभाय सारं चूड़ भारं, हेम झारं क्रंमये।
साते समांणी आप भांणी, माड़रांणी रम्मये।।1।।[…]
[…]जब यह बात जोमां की मा ने सुनी तो उन्होंने कहा कि-
“मैं हड़वेचा आई हुई हूं, जाई नहीं। जमर मैं नहीं करूंगी जमर मेरी बेटी जोमां करेगी। वो भी तो तो इसी उदर में लिटी है। ”
जब यह बात जोमां ने सुनी तो उन्होंने कहा कि-
“मिट्टी लेने के लिए हड़वेचा जाने की क्या आवश्यकता है? मैं खुद साक्षात हड़वेची यहां बैठी हूं तो फिर वहां जाने की क्या आवश्यकता है? वैसे भी हड़वेची मैं हूं मेरी मा नहीं! अतः जमर मेरी मा क्यों करेगी ? जमर तो मैं करूंगी।[…]