दुर्गादास राठौड़ रो गीत तेजसी खिड़िया रो कहियो

असपत नूं लिखै नवाब इनायत, दाव घाव कर थाकौ दौड़।
मारूधरा मांहै मुगलां नूं, ठौड़ ठौड़ मारै राठौड़।।

कारीगरी न लागै कांई, घाव पेच कर दीठा घात।
किलमां नूं मारता न संकै, मरवि सूं न डरै तिलमात।।[…]

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काल कवि – डॉ. रेवंत दान बारहट

समय के महासमर में
मैंने शाश्वत शब्दघोष किया है
शब्द मेरे शस्त्र रहे हैं
शब्द शक्तियां आत्मसंयम रही हैं
मैं सनातन साक्षी हूं
असंख्य सभ्यताओं
संस्कृतियों की श्रृंखलाओं
शक्तिशाली सत्ताओं का,[…]
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जोधपुर स्थापना और पूर्व पीठीका !! – राजेन्द्रसिंह कविया संतोषपुरा

…किले की नींव का प्रथम शिलास्थापन भवभय भंजनी भगवती करनल किनियाँणी के कर कमलों द्वारा कराकर आगत अदृष्य अनिष्ट से अपने पीढीयों को आरक्षित करने के उद्देश्य से अमराजी चारण को माता जी को आंमत्रित कर के लाने हेतु भेजा व जब जगदम्बा पधारी तो उनके हाथो से वि. सं. १५१५ जेष्ठ माह की उजऴी ग्यारस को दुर्ग की स्थापना करवायी।

पन्दरा सौ पन्दरोतरै, जेठ मास जोधाण।
सुद ग्यारस वार शनि, मंडियो गढ महराण।।

मारवाड़ के प्रसिन्द इतिहासकार पं. विश्वेश्वरनाथ रेउ ने लिखा है कि ख्यातों मे लिखा है कि करनीजी नाम की चारण जाति की प्रसिध्द महिला द्वारा किले का स्थान बताया जाना व उसीके द्वारा उसका शिलारोपण होना भी लिखा है।…

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दीपै वारां देस, ज्यारां साहित जगमगै (एक) – डॉ. रेवंत दान बारहट

…राजस्थानी भाषा के इन युवा कवियों के बीच एक नौजवान और प्रगतिशील कविता की उभरती हुई बुलंद आवाज है-तेजस मुंगेरिया की।

यथा नाम तथा गुण। गिरधर दान जी के शब्दों में कहूं तो ‘बीज की बाजरी ‘ अर्थात बहुत ही अनमोल।

तेजस मुंगेरिया राजस्थानी कविता और खासकर डिंगल की उस प्राचीन विशिष्ट काव्य शैली का भरोसेमंद नाम है।…

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चारण – डॉ. रेवंत दान बारहठ

सृष्टि रचयिता ने
स्वर्ग के लिए जब पहली
बार रचे थे पांच देव –
देवता,विद्याधर,यक्ष,चारण और गंधर्व
तभी इहलोक पर रचा था केवल
एक नश्वर मनुष्य
मगर मनुष्य ने खुद को बांट दिया था
क्षत्रिय,बामण,वैश्य और शूद्र में
कहते हैं कि राजा पृथु ने
स्वर्ग के देवताओं में से
चारण गण को आहूत किया था[…]
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लहू सींच के हमने अपना ये सम्मान कमाया है – मनोज चारण ‘कुमार’

आखे ‘मान’ सुणो अधपतियाँ, खत्रियाँ कोइ न कीजे खीज।
बिरदायक मद-बहवा बारण, चारण बड़ी अमोलक चीज।।

जोधपुर महाराजा मानसिंह का ये कथन चारण समाज के बारे में एक प्रमाणिक तथ्य प्रकट करता है कि, चारण शब्द ही सम्मान करने योग्य है। वैसे तो हर जाति का अपना इतिहास है, लगभग सभी जातियों के लोग अपने-अपने इतिहास पर गर्व करते हैं और करना भी चाहिए। चारण जाति का इतिहास बहुत पुराना इतिहास है। चार वर्ण से इतर है ये जाति, जिसे कमोबेस ब्रह्मा की सृष्टि से बाहर भी माना जा सकता है।[…]

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भुज-कच्छ की ऐतिहासिक डिंगळ पाठशाला के पाठ्यक्रम एवं वहां पढ़े कवियों द्वारा रचित ग्रंथों की सूची

कच्छ के महाराव लखपति सिंह (सन १७१० – १७६१ ई.) ने गुजरात/राजस्थान की काव्य परंपरा को सुद्रढ़ एवं श्रंखलाबद्ध करने का अभूतपूर्व कार्य किया जिसका साहित्यिक के साथ साथ सांकृतिक महत्त्व भी है। उन्होंने भुजनगर में लोकभाषाओँ एवं उनके काव्य-शास्त्र के अध्ययन एवं अध्यापन के लिए सन १७४९ ई. में “रा. ओ. लखपत काव्यशाला, भुजनगर” की स्थापना की जो “डिंगळ-पाठशाला” एवं “भुज नी पोशाळ” अथवा “भुज की पाठशाला” के नाम से लोकप्रिय हुई एवं स्वातंत्र्य-पूर्व काल अर्थात सन १९४७ ई. तक कार्य करती रही।
अपने लगभग २०० वर्षों के अंतराल में भुज की पाठशाला ने काव्य जगत को सैकड़ों विद्वान् कवि दिए जिन्होंने अनेकों ग्रन्थ रचे एवं डिंगल/पिंगल काव्य परंपरा को नयी ऊँचाइयों पर पहुचाया। इस पाठशाला के पाठ्यक्रम में पढाये जाने वाले ग्रंथों की सूची एवं यहाँ से पढ़े विद्वान् कवियों के द्वारा रचित ग्रंथों की सूची नीचे दी गयी है।…

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वैश्विक महामारी “कोरोना”

वैश्विक महामारी “कोरोना” से निजात पाने के लिए सभी अपने अपने स्तर से प्रयासरत हैं। वैज्ञानिक अनुसंधान कर रहे हैं, राजनेता इस चुनौती का सामना करने के अनुरूप नीतियाँ बना रहे हैं, सरकारी कर्मचारी अथक प्रयास करके इन नीतियों को कार्य रूप में परिणित कर रहे हैं, व्यवसायी इस विषम परिस्थिति से जूझ रहे तन्त्र को आपदा राहत कोष में आर्थिक मदद कर रहे हैं, स्वयंसेवी संस्थाएं इस परिस्थिति के मारे अपार जन समुदाय को भोजन एवं रात्रि विश्राम जैसी मूलभूत सुविधाएँ उपलब्ध करने की दिशा में जमीनी स्तर पर कार्य कर रही है, चिकित्सक इस महामारी से संक्रमित मरीजों […]

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नसीहत री निसाणी – जाल जी रतनू

किसी का बिन जाणिये, विश्वास न कीजै।
गैणा गांठा बेच के, अन सूंगा लीजै।
पढवाचा कीजै नही, बिन मौत मरीजै।
ठाकुर से हेत राखके, हिक दाम न दीजै।
भांग शराब अफीम का, कोई व्यसन न कीजै।
दुसमण की सौ बीनती, चित्त ऐक न दीजै।

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गीत कुशल जी रतनू रे वीरता रो बगसीराम जी रतनू रचित

राजस्थान मे चारण कवि ऐक हाथ मे कलम तथा दूसरे हाथ मे कृपाण रखते थे। महाराजा मानसिंह जी जोधपुर के कहे अनुसार रूपग कहण संभायो रूक। ऐक बार मानसिंह जी का भगोड़ा बिहारी दास खींची को भाटी शक्तिदान जी ने साथीण हवेली मे शरण दी, इस पर मान सिह जी ने क्रुद्ध होकर फोज भेज दी। शरणागत की रक्षा हेतु भाटी शक्तिदान जी ऐवं खेजड़ला ठाकुर सार्दुल सिंह जी ने सामना किया। इस जंग मे मेरे ग्राम चौपासणी के उग्रजी के सुपुत्र कुशल जी रतनू ने पांव मे गोली लगने के बाद भी युद्व किया।
उनकी वीरता पर तत्कालीन कवि बगसीराम जी रतनू ने निम्नलिखित डिंगल गीत लिखा जो यहाँ पेश है।

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