सीस उबेल़ण आव शकत्ती।-अज्ञात

मढ हूँत बेग पलाण मखत्ती, बावन झूल सहेत बखत्ती
हेकण ताल़ी बाघ हकत्ती, सीस उबेल़ण आव शकत्ती।

साख बीससत काज सरन्नी, बेद किसो जिण जाय बरन्नी
धाबल़ लोवड़ ताय धरन्नी, कवि उबारण आव करन्नी।

शीश चाड जणा साद सुणीजे भारी हुवै कामल़ी भीजे
देबी आय बेग सुख दीजे, किनियाणी अब जेज न कीजे […]

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गीत जात अरटीयो-जगमाल सिंह ‘ज्वाला’ कृत

सोच रहयो हर रोज सीतावर, कैसा खेल रचाया।
मिळे कठे हर खोजो मंदिर,अजु समझ नही आया।1।

लोग कहे ओ मीरां ने लाधो,सुरती जाय समाणी।
आवत जात दिखी नह आँखे,पाणी मिळयो पाणी।2।

ईसर दास तो हतो खुद ईसर,घोडा समद धुमाया।
परभु य आय बांह ते पकड़ी,ले झट गळे लगाया।3। […]

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अनीति सार – जगमाल सिंह ‘ज्वाला’कृत

🌷गीत सोरठियो🌷
करनल सामेय भिड़े कानो ज,भाग थारा भाळ।
मौन होयने य सुणजोय मानव,केम खींचे काळ।1

गामेय सामो ज भगेय गीदड़,मौत नेड़ी मान।
अकल चरवान जाय ऊखरड़ेय,उलट सूझे आन।2।

रावण सरीखोंय कोइ न राजा,घाली सीता घात।
धमरोळ लंकाय दीधी धमचक,वसु अजे विख्यात।3। […]

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शक्ति बाण पर राम की मनोदशा – जगमाल सिंह ज्वाला

पाप कियो विधना तु पशुव्रत, लोक त्रिलोक ज आज सुलाने।
बांह उखाड़ लई मुझ बांधव, बाट करी मुझ काळ बुलाने।
हे ‘जगमाल’ जवाब नही अब, आगळ कोशल नंद उलाने।
काळज काढ़ रुवे करुणाकर, भ्रातज आगळ सोय भुलाने।1। […]

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महाकाळिय तुं मछराळिय मोगल-वीसाभाई महडू

परचा जग वासिय नक्ख प्रकाशिय रध्ध हुलासिय, अंग रयं।
त्रमळं गुण गासिय, सुक्ख निवासिय, उजळ आशिय, चाव अयं।
वरदाण विळासिय, दुःख विनासिय, साम चौरासिय, जग्ग सरे।
महाकाळिय तुं मछराळिय मोगल कांकण वाळिय ल्हेर करे।।1 […]

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हिंगळाज माताजी री स्तुति – कविराज शंकरदानजी जेठीभाई देथा (लींबडी)

॥छंद हरिगीत॥
प्रणमामि मातु प्रेम मूरति, पार्वती परमेशरी।
शांति क्षमामय कृपासागरि, सुखप्रदा सरवेशरी।
सेवक शिशु रा दुरित दारिद, विघ्न दोष विदारणी।
आदि शक्ति नमो अंबा, हिंगळा अघहारिणी॥1

सब देवियां शिरमौड सातांद्वीप री राजेशरी।
कोहला परवत कंदरा री निवासी निखिलेशरी।
आनंद वदनी आशुतुष्टा, कृपा मंगळ कारिणी।
नकळंक रुपा नमो अंबा, हिंगळा अघहारिणी॥2 […]

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जय मोगल मां मछराळी – कवि जीवणदानजी डोसाभाइ झीबा

॥छंद त्रिभंगी॥
परतापां पुरी, निरमळ नूरी, सतव्रत सूरी, सरसाई।
दाळद कर दूरी, क्रोध करुरी, बळ भरपूरी, थुं बाई।
भंजण दुःख भुरि, गंज गरुरी, रखण सबुरी, रढियाळी।
ओखा धर वाळी, देव डाढाळी, जय मोगल मां मछराळी॥1 […]

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चाळकनेची चामुंडा – कवि हमीरदान जी रतनू (धडोई)

॥छंद त्रिभंगी॥
वेदां वंचाणी, पढे पुराणी, क्रोड विनाणी, कतियांणी।
कै काम कमाणी, अकह कहांणी, जय सुर राणी जगजाणी।
भाखे ब्रह्माणी, तुं मन भाणी, अविरळ वांणी, उदंडा।
रव राय रवेची, मुंह माडेची, चाळकनेची, चामुंडा॥1

आशापुरा आई, देव दुगाई, महण मथाई, मंहमाई।
सतशील सदाई, जुध्ध जिताई, गाढ वडाई, गरवाई।
दैतां दुःखदाई, सुरां सहाई, खिति उपाई नव खंडा।
रवराय रवेची, मुंह माडेची, चाळकनेची, चामुंडा॥2

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श्री करनी विजय स्तुति – श्री जोगीदान जी कविया सेवापुरा

।।छन्द त्रोटक।।

करणी तव पुत्र प्रणाम करै
धरि मस्तक पावन ध्यान धरै
कलिकाल महाविकराल समै
बिन आश्रय हा तव बाल भ्रमै।१।

हम छोड़ चुके अब इष्ट हहा,
रिपु घोर अरष्टि अनिष्ट रहा।
पथ भ्रष्ट हुये जग माँहि फिरैं
घन आपत्ति के नभ भाग्य घिरैं।२। […]

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गीत भेरू जी रो – जगमाल सिंह “ज्वाला”

।।गीत सावझड़ो।।

मिणधर हाजर होय मुछाळा।
पत राखण आवे प्रतपाळा।
चंडी संग सदा चिर ताळा।
गजब दौड़ जे गोरा काळा।1।

श्वान सवारी आसन ढाळो।
टेरु तमे विघन मोय टाळो।
रेवे मात रु सदा रुखा ळो।
भगत पुकारे सामो भाळो।2। […]

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