गीत सोशल मीडिया रौ – पुष्पेंद्र जुगतावत वणसूर

गीत – बडो साणोर

अजब फेसबुक वाटसफ टवीटर ओपिया,
ग्राम इंस्टा गजब रचे गोटा।
सोसयल मीडिया तणा रांगड़ सजे,
मचाया मुलक में ख्याल म्होटा।।१[..]

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24 अक्टूबर 1995 का सूर्यग्रहण – पुष्पेंद्र जुगतावत वणसूर

।।गीत – प्रहास साणोर।।
विगत रयो रूढीपणा तणे वड ग्रासगत,
मिळी हिंदवांण नै आज मुगती।
वरण विग्यान रौ चहुंदिश वापर्यौ,
संचरी रिवगरण रूप सगती।।1[…]

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गाय दूय’र गिंडकां ने न्हाकी – सेणीदान देपावत

एक गाँव, गाँव में दसवीं तक रो इसकूल, इसकूल में तीन सौ टाबर पढणने आवै। हेडमास्टर समेत इग्यारे मास्टर जका टाबरां ने हेत अर लगन साथे पढाई करावे।

इसकूल रे साथेई गांव में पटवार-घर अर पंचायत-भवन भी हुया करै है। पटवारी अर गाँव सचिव आपूआप रा काम करै अर इसकूल रा मासटर आपरो।

गाँव रा लोग पटवारी अर गाँव सचिव रो तो आदर माण करे क्यां के आ हूं हरेक रो काम पड़े, काम भलाईं पईसा देर कराओ।

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रघुवरजसप्रकास – किसनाजी आढ़ा

चारण किसनाजी आढ़ा विरचित
रघुवरजसप्रकास
संपादक : डॉ.सीताराम लालस
राजस्थान प्राच्य विद्या प्रतिष्ठान, जोधपुर
वि.सं. २०१७ (ई.सं. १९६०)
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यह मंदिर मंदिर नहिं केवल, यह गौरव सौगात है

 आज प्रफुल्लित अवध धरा है, पूर्ण अधूरे काम हुए पुनः प्रतिष्ठित नव मंदिर में, भारत गौरव राम हुए सदियों की काली अंधियारी, जैसे बीती रात है। यह मंदिर मंदिर नहिं केवल, यह गौरव सौगात है।।01।। आज उल्लसित कण-तृण सारे, स्वयं पधारे रघुनंदन। लेत बलैयां झुकी लताएं, करते पादप अभिनंदन। मधुर मधुर स्वर छेड़ विहंगन, सबका हिय हरखात है। यह मंदिर मंदिर नहिं केवल, यह गौरव सौगात है।।02।। मंदिर की क्या बात राम के, मंदिर हर इक ग्राम मिले। घर घर में मंदिर भारत के, हर मंदिर में राम मिले। हर हिन्दू के स्वाभिमान का, नाता इसके साथ है। यह […]

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शिव-चालीसा

चौपाई
जय! शिव शंकर! जयति! महेशा!
आशुतोष! मृड! अनघ! उमेशा!१!
अंग-गौर-कर्पूर-सुपावन!
रूप कोटि कंदर्प लजावन!!२
भस्म-अंग-धुरजट-बिच-गंगा!
नीलकंठ! गौरी-अरधंगा!!३

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श्री गणपति चालीसा

श्री गणपति चालीसा दोहा एक रदन!करिवर वदन, सदन ज्ञान! शशि-भाल! विघ्न हरन मंगल करन, शिव गिरिजा के लाल!! १ महागणपतिम् विमल अति, यति मति गति दातार! तव पद रति रिधि सिधि पतिम्, जयति जयति सुखसार!! २ चौपाई श्रीगणेश जय!जय गणदेवा! मात भवानी पितु महादेवा!१ गणाध्यक्ष गजमुख शिवपायक! द्वैमातुर ! सुर संत सहायक!२ लंबोदर!हेरंब! विघ्नहर! शूर्पकर्ण! इक-दंत! मनोहर!३ पृथुलकाय!मोदक-आहारी! गिरितनया शिव गोद विहारी!!४ धूम्र वर्ण !मुदमंगलकारी!! पिंगल-नयन!प्रणत भय हारी!५ मूषकवाहन!षण्मुख भ्राता! श्रुति लेखक!वांछित-फलदाता!६ धन वैभव दीर्घायुष दाई! सुमति सौख्य सौभाग्य प्रदाई!!७ वक्रतुंड!गजशुंड! दयाला! लंबकर्ण! भक्तन प्रतिपाला!८ स्वस्तिक-चरण! हरण भय भारी! अशरण शरण! सुवन त्रिपुरारी !!९ बुद्धि विवेक ज्ञान शुभ दायक! गुणपति! […]

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भैरव चालीसा

चौपाई
जय भैरव! काशीपुर स्वामी!
करतल-सुलभ-सिद्धि! बहुनामी!१
त्रिभुवन-निलय !श्वान-असवारा!!
कलि-मल-संहारक! फणि-हारा!२
कापालिक! दिगवसन! अघोरा!
श्यामल गौर स्वरूप किशोरा!!३

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भैरव आरती

दोहा
पुर-काशी-वासी! बटुक!, अविनाशी! चख-लाल!
खर्पराशि! सुखराशि! विभु, नाशी भय भ्रम-जाल!!१

भैरव! भयहर! भूतपति!, रुद्र! वेश-विकराल!!
दास जानि करियो दया, व्योमकेश! दिगपाल!!२

भैरव-आरती
आरती! मधुर उचारती, भारती! भैरवनाथ तिहारी!
दुर्धर-रव! खप्पर कर! अभीरव! जय शमशान विहारी!!१[…]

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काव्य एवं इतिहास का सुभग सुमेल: गजन प्रकास

प्राक्कथन

राजस्थान वीर प्रसविनी धरा के रूप में विश्वविदित है। इसे धारा तीर्थ के धाम के रूप में जाना जाता है। जहाँ शूरमाओं ने केशरिया कर शाका किए वहीं वीरांगनओं ने अपने स्वाभिमान की रक्षार्थ जौहर की अग्नि में स्नान कर अपनी कुलीन परम्पराओं को अक्षुण्ण रखा। यहाँ के वीरों ने मातृभूमि के मान-मंडन व अरियों के दर्प खंडन हेतु रणांगण में वीरगति प्राप्त करने में मरण की सार्थकता मानकर यह घोषित किया कि ”मरणो घर रै मांझियां, जम नरकां ले जाय।[…]

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