अभिराम छबि घनश्याम की

।।कवित्त।।

मोरपंखवारा सिर, मुकुट सु धारा न्यारा,
नंद का कुमारा ब्रज, गोप का दुलारा है।
कारा कारा देह, मन मोहता हमारा गिध,
गनिका उबारा अजामिल जिन तारा है।
वेद श्रुति सारा “नेति नेति” जे पुकारा, जसु-
मति जीव-प्यारा मैने, उर बिच धारा है।
आँखिन की कारा बिच घोर हा अँधारा, सखि !
कृष्ण दीप बारा, तातें फैला उजियारा है।।१[…]

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आंधै विश्वास तणो अंधियारो!

।।गीत जांगड़ो।।

आंधै विश्वास तणो अंधियारो,
भोम पसरियो भाई।
पज कुड़कै में लिखिया पढिया,
गैलां शान गमाई।।1

फरहर धजा बांध फगडाल़ा,
थांन पोल में ठावै।
बण भोपा खेल़ा पण बणनै,
विटल़ा देव बोलावै।।2[…]

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अरे भइया ! आ तो गधा गाल़णी धरती है!

एकर एक थल़ी रो बासण घड़णियो कुंभार आपरै गधे माथै ढांचो मेलियो अर उणमें पारी, चाडा, तामणिया, कुल़डकी, चुकली, भुड़की आद घाल’र पोकरण कानी निकल़ियो।

पोकरण पूगो पण उण सोचियो कै गांमड़ां में मजूरी ठीक हुसी सो उवो पोकरण सूं दिखणादी-आथूणी कूंट में निकल़ियो।
थोड़ोक आगै निकल़ियो तो उणनै सुणिज्यो कै लारै सूं कोई मिनख हेलो कर रह्यो है। उवो हेलो सुण’र ठंभियो। हेलो करणियो मिनख नैड़ो आयो अर खराय’र साम्हैं जोवतै पूछियो-
“कयो(कौन) है रे!”

कुंभार कह्यो – “बा ! हूं तो थल़ी कानलो फलाणो कुंभार हूं।”[…]

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भरिया सो छल़कै नहीं

राजस्थानी साहित्य, संस्कृति और चारण-राजपूत पारंपरिक संबंधों के मजबूत स्तंभ परम श्रद्धेय राजर्षि उम्मेदसिंह जी ‘ऊम’ धोल़ी आज हमारे बीच नहीं रहे।
आपके स्वर्गारोहण से उस एक युग का अवसान हो गया जिस युग में ‘चारण और क्षत्रिय’ के चोल़ी-दामण के संबंध न केवल माने जाते थे अपितु निर्वहन भी किए जाते थे।
आप जैसे मनीषी से कभी मेरा मिलना नहीं हुआ लेकिन आदरणीय कानसिंहजी चूंडावत की सदाशयता के कारण उनसे दो- तीन बार फोन पर बात हुई। फोन मैंने नहीं लगाया बल्कि उनके आदेशों की पालना में कानसिंहजी ने ही लगाया और कहा कि ‘धोल़ी ठाकर साहब आपसे बात करना चाहते हैं।”
जैसे ही मैं उन्हें प्रणाम करूं, उससे पहले ही एक 92वर्षीय उदारमना बोल पड़ा “हुकम हूं ऊमो! भाभाश्री म्हारा प्रणाम!“[…]

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बन्द करिए बापजी – गजल

हर बात को खुद पे खताना, बन्द करिए बापजी।
बिन बात के बातें बनाना, बन्द करिए बापजी।

बीज में विष जो भरा तो फल विषैले खाइए,
ख़ामख़ा अब खार खाना, बन्द करिए बापजी।

सागरों की साख में ही साख सबकी है सुनो!
गागरों के गीत गाना, बन्द करिए बापजी।

लफ़्ज वो लहज़ा वही, माहौल ओ मक़सद भी वो,
चोंक जाना या चोंकाना, बन्द करिए बापजी।[…]

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विरछ – वंदना

।।छंद – नाराच।।
लगाय नेह लोयणां, उगाय रूंख ऐम तूं।
हमेस पोख हेर-हेर, पाल़ नित्त प्रेम तूं।
सनेह नीर सीचतां, मनां हरीत मोहणा।
बणै विरच्छ बोहरंग, सो सुरंग सोहणा।।१[…]

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भगत माला रा सवेया – कवि रिड़मलदाँन बारहठ (भियाड़)

।।सवैया।।
नाँम जप्यो ध्रुव बालक नैम सु तात उताँन नही बतलायो।
लागिय धूँन अलँख धणी लग नारद मूनिय मँत्र सुणायो।
आद गुगो जुग ऐक अखँडज आसण ध्रूव अडिग थपायो।
राँम जपो नित नाँम रिड़ँमल सँतन को हरि काज सरायो।
ईस्वर सँकट मैटण आयो।।१[…]

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महात्मा ईसरदासजी री महिमा रा सोरठा – शुभकरण जी देवऴ (कूंपड़ास)

मालाणी धर मांयने, भल सांसण भाद्रेस।
जिथ सूरै घर जनमियो, (उण) ईसर ने आदेस।।

ज्वाला गिरी जोगी जबर, गिर हिम निज तन गाऴ।
सुत जनम्यौ सूरा घरै, भगतां रो भूपाऴ।।

कज हरि तो हरिरस कथ्यौ, देवी कज देवियाण।
सुंण कुंडऴियां संचरै, सूरापण सुभियांण।।

मिस निंदा अस्तुति मुणी, वऴ कथ गुण वैराट।
ईसर इण विध अलखरा, ठाह्या भगती ठाट।।[…]

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सैनांणी

छत्राण्यां इण छिति, गुमर रची जग्ग गाथा।
सुणियां अंजस सरब, माण में झुकज्या माथा।
आंण थरप इण अवन, ध्यांन सुजस दिसी धारी।
ज्यांरी कीरत जोय, साची जपै संसारी।
इल़ नांम अमर अजतक अहो, रसा अरक लग रैवसी।
बैवसी बात वसुधा परै, कवी सदाई कैवसी।।[…]

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अम्बिका इन्द्रबाई – गौरीदान जी कविया

गौरीदान जी कविया गांव कुम्हारिया रा वासी माँ करणी जी रा मोटा भगत अटूट आस्थावान विचारधार अर दृढ धारणा रा धणी माँ भगवती भव भय भंजनी रा भजन मे मगन रहिया अर सदा सर्वदा माँ री शरणागत सेवा साधना मे जीवन समर्पित राखियो, आज री चितारणी में गौरीदान रो भुजंगप्रयात छंद।

।।छंद भुजंगप्रयात।।

क्रमं युक्त दोशी कलि काल आयो।
ज्वितं पात यूथं अनाचार छायो।
धरा भार उतार वा मात ध्याई।
बिराजै तुहीं अम्बिका इन्द्रबाई।।[…]

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