सरस्वती वंदना

कुन्द-इन्दु सम श्वेत कलेवर, श्वेत वस्त्र तन धार!
मम जिह्वा पर आप विराजो, कविता की दातार!!1
आप को वंदन बारंबार!!

हंस वाहिनी, ज्ञान दायिनी, पहने स्फाटिक हार!
शब्दों में आ मिसरी घोलो, मिटे जगत का खार!!2
आप को वंदन बारंबार!!

कवि, ऋषि, किन्नर, सुर-मुनि पूजें, अज, विष्णु, त्रिपुरार!
ज्ञानी पंडित, करे आपकी, निशदिन जय-जयकार!!3
आपको वंदन बारंबार!!

कोर जरी की पहन कंचुकी, पहने नवलख हार!
रूप सुहावन अति मनभावन, शोभा बनी अपार!!4
आप को वंदन बारंबार!!

रत्न-जटित सिर मुकुट मनोहर, कंकण वलयाकार!
श्वेत ओढ़नी सिर पर सोहे, मोती जडी किनार!!5
आप को वंदन बारंबार!

शशि-वदनि! निज वदन चंद्र से, हरो जगत अंधार!
मनोसदन को कर दो समृद्ध, भर रचना-भंडार!!6
आप को वंदन बारंबार!!

कवि-कल्याणी! वीणापाणि, अहो! काव्य-आगार!
सात सुरों से झंकृत कर दो, उर-तंत्री के तार!7
आप को वंदन बारंबार!!
निर्मल मन दो, शुचि जीवन दो, पल-पल लाड़-दुलार!
निज आँचल से दूर न करना, हे माँ पालनहार!8
आप को वंदन बारंबार!!

छंद-गीत के दीप जलाकर, हरिये जड़-अंधियार!
जगमग-जगमग ज्योतित कर दो, माँ!रचना संसार!9
आप को वंदन बारंबार!!

शब्द-भाव में पैनापन दो, जैसे धार कटार!
श्रोता पाठक उर को भेदे, उतरे मन के पार!!10
आप को वंदन बारंबार!

दग्धाक्षर को दूर करो माँ, ! कर कृति-दोष-निवार!
कलुष-रहित हो कविता मेरी, ज्यों गंगा-जलधार!!11
आप को वंदन बारंबार!!

नवरस में नव रंग उतारो, भरो शब्द में सार!
इन्द्रधनुष भर दो कविता में, दो माँ भाव निखार!!12
आप को वंदन बारंबार!!

ग़ज़ल, नज़्म-सी बिटिया दो माँ, गीत-पुत्र सुकुमार!
रचना का आँचल भर दो, हो हरा-भरा परिवार!!13
आप को वंदन बारंबार!!

गीत, ग़ज़ल, मुक्तक दो माता! दो कविता उपहार!
कानों में पंचम सुर घोलो, सुरमय छेड़ सितार!!14
आप को वंदन बारंबार!!

लय छंदों की पहने झाँझर, मुक्तक मौक्तिक हार!
यति-गति की बिंदी सिर सोहे, अलंकार-शृंगार!!15
आप को वंदन बारंबार!!

चरण-कमल का चाकर रख लो, विनती बारंबार!
नरपत गावै सीस नमावै, हर माँ!मनोविकार!!16
आप को वंदन बारंबार!!

©Dr नरपत आशिया “वैतालिक”

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