चारण साहित्य का इतिहास – आठवाँ अध्याय – चारण काव्य का नव चरण (उपसंहार) – [Part-A]

चारण साहित्य का इतिहास – भाग २ चारण-काव्य का नवचरण (उपसंहार) [सन १९५० – १९७५ई.] (१) सिंहावलोकन पिछले अध्यायों में राजस्थानी के चारण साहित्य का क्रमबद्ध विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इस अनुशीलन से स्पष्ट है कि यह साहित्य अत्यंत विशद, गहन. एवं समृद्ध है। प्राचीन काल में इसका बीजारोपण हुआ। मध्य काल के प्रतिभा-सम्पन्न कवियों एवं लेखकों ने इसे सींचकर पल्लवित एवं पुष्पित बनाया। आधुनिक काल में यह एक विशाल वृक्ष के रूप में परिणित होकर दूर-दूर तक अपना सौरभ बिखेरने लगा। इस प्रकार प्राचीन काल से लेकर अर्वाचीन काल तक चारण काव्य परम्परा अक्षुण्ण रूप से चली आ […]

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चारण साहित्य का इतिहास – सातवाँ अध्याय – आधुनिक काल (द्वितीय उत्थान) – [Part-C]

५. श्रृंगारिक काव्य:- इस काल में आकर श्रृंगार रस की धारा विकास की ओर उन्मुख हुई और उसमें भिन्न-भिन्न प्रकार की रचनायें होने लगीं। सूर्यमल्ल, शिवबख्श, ऊमरदान, फतहकरण, किशोरसिंह, अमर सिंह देपावत प्रभृति कवियों के मुक्तक काव्य में यह प्रवृति पाई जाती है। सूर्यमल्ल ने करुण घटनाओं को सँजोकर वियोग का मार्मिक चित्रण किया है। नायक की युद्धवीरता में श्रृंगार का पुट देना उनके जैसे पहुँचे हुए कवियों का ही काम था। एक युद्ध के बाद ज्योंही प्रियतम के घाव भरने को आते त्योंही दूसरा युद्ध छिड़ जाता। इस प्रकार योद्धा के स्वस्थ होने पर नायिका यौवन का उपभोग करने […]

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चारण साहित्य का इतिहास – सातवाँ अध्याय – आधुनिक काल (द्वितीय उत्थान) – [Part-B]

(ख) आलोचना खण्ड: पद्य साहित्य १. प्रशंसात्मक काव्य (सर):- क्षत्रिय जाति के उज्जवल नक्षत्रों का गुण-गान करना चारण कवियों की वंश परम्परागत विशेषता है और इस काल के अधिकांश कवियों में यही प्रवृत्ति पाई जाती है। कहीं वीरता की प्रशंसा है तो कहीं दानशीलता की, कहीं तेजस्विता का वर्णन है तो कहीं प्रसुता का, कहीं आभार प्रदर्शन है तो कहीं शील निरूपण, कहीं धर्मवीरता है तो कहीं काव्य-अनुराग। इन विविध गुणों की व्यंजना करना ही कवियों का ध्येय रहा है। व्यक्तिगत स्वार्थ पूर्ति के लिए कोई रचना लिखी हुई नहीं दिखाई देती। कतिपय कवियों ने अपने समकालीन प्रसिद्ध कवियों, लेखकों […]

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चारण साहित्य का इतिहास – सातवाँ अध्याय – आधुनिक काल (द्वितीय उत्थान) – [Part-A]

चारण साहित्य का इतिहास – भाग २ आधुनिक काल, द्वितीय उत्थान [सन १८५० – १९५०ई.] (१) काल विभाजन आधुनिक चारण साहित्य का द्वितीय उत्थान १९वीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध से आरम्भ होकर स्वतंत्रता प्राप्ति तक प्रवाहमान होता है। विदेशी संस्कृति के सम्पर्क में आकर राजस्थान ने जितना खोया उतना पाया नहीं। देशव्यापी प्रतिक्रिया होने से यहाँ भी अनेक अभूतपूर्व आंदोलन हुए जिनको दृष्टि-पथ पर रखते हुए आलोच्य काल को ‘क्रांति-युग’ की संज्ञा दी जा सकती है। राष्ट्रीयता एवं समाजवाद की भावनाओं का विकास होने लगा। राजनीतिक हलचलों एवं सामाजिक क्रांतियों का प्रभाव साहित्य पर भी पड़ा। कवियों का ध्यान राज-मार्ग से […]

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चारण साहित्य का इतिहास – छटा अध्याय – आधुनिक काल (प्रथम उत्थान) – [Part-C]

५. श्रंगारिक काव्य:- आलोच्य काल में केवल वांकीदास एवं मानजी ही ऐसे कवि हुए हैं जिनमें श्रंगार की प्रवृत्ति पाई जाती है। इस दृष्टि से वांकीदास कृत ‘झमाल राधिका सिख नख वर्णन’ एवं ‘हेमरोट छत्तीसी’ नामक रचनायें उल्लेखनीय हैं। नायक-नायिका के नख-शिख वर्णन करने की पद्धति पुरातन काल से ही चली आ रही है किन्तु इसे स्वतन्त्र विषय बनाने का श्रेय वांकीदास को ही है। कवि ने यत्र-तत्र अलौकिकता का पुट अवश्य दिया है किन्तु चित्र लौकिक ही हैँ। पूज्य भावना के अभाव में राधा तो सामान्य नायिका के स्तर पर उतर आई है। उपमान रूढ़िगत भी है और नवीन […]

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चारण साहित्य का इतिहास – छटा अध्याय – आधुनिक काल (प्रथम उत्थान) – [Part-B]

(ख) आलोचना खण्ड : पद्य साहित्य १. प्रशंसात्मक काव्य (सर):- आलोच्य काल में प्रशंसात्मक काव्य को (सर) कहा जाने लगा। ‘सर’ आदर-सूचक अंग्रेजी शब्द है जिसका अर्थ है- ‘श्रीमान’। इसका प्रचलन पाश्चात्य शिक्षा के कारण हुआ। इसके रचयिताओं ने विशिष्ट राजाओं, जागीरदारों एवं महापुरुषों के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित की है। राजाओं एवं जागीरदारों के विषय में जहां एक ओर वीरता, दानशीलता, कृतज्ञता, तेजस्विता एवं प्रभुता के दृष्टान्त मिलते हैं वहां दूसरी ओर व्यक्तिगत स्वार्थ-भावना के वशीभूत होकर भी छंद-रचना की गई है। इसके अतिरिक्त कुछ कवि ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने अपने गुरुजनों के श्रीचरणों में नत मस्तक होकर […]

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चारण साहित्य का इतिहास – छटा अध्याय – आधुनिक काल (प्रथम उत्थान) – [Part-A]

चारण साहित्य का इतिहास – भाग २ आधुनिक काल, प्रथम उत्थान [सन १८०० – १८५०ई.] (१) – काल विभाजन राजस्थानी के चारण साहित्य में १९ वीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध परिवर्तन-काल माना जायगा। पश्चिम में ज्ञान-विज्ञान का एक नया सितारा चमक उठा था जिसके दर्शन राजस्थान ने इस समय में किये। फलत: क्षत्रिय नरेशों ने अँग्रेजों का आधिपत्य स्वीकार कर संधियों पर हस्ताक्षर किये। पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति के संस्पर्श से इस काल में सर्वप्रथम आधुनिकता का अभ्युदय हुआ जिससे अनेक परिवर्तन हुए। विदेशी विचार-धारा का प्रभाव जीवन के प्रत्येक क्षेत्र पर पड़ा। फोर्ट विलियम कॉलेज, कलकत्ता की स्थापना से शिक्षा […]

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चारण साहित्य का इतिहास – पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल (द्वितीय उत्थान) – [Part-B]

(ख) आलोचना खण्ड : पद्य साहित्य १. प्रशंसात्मक काव्य:- चारण कवियों की प्रशंसा पद्धति प्राय: समान है। अत: विगत काल के सदृश इस काल में भी राजा-महाराजाओं एवं जागीरदारों की वीरता, दानशीलता, धर्म-वीरता, प्रभुता, तेजस्विता, कृतज्ञता एवं राग-रंग का ही वर्णन अधिक मिलता है। यह काव्य राजवंशों से सम्बद्ध एक विशेष पद्धति का द्योतक है। कतिपय कवि ऐसे भी हुए हैं जिन्होंने साधु-महात्माओं का यशोगान किया है। इन समस्त कवियों ने फुटकर कवितायें लिखी है। क्षत्रिय नरेशों की वीरता चारण कवियों की प्रशंसा का अनिवार्य गुण है। इस दृष्टि से पता, गिरधर, सुजाणसिंह, बखता, भीकमचंद, श्री एवं श्रीमती करणीदान कविया, […]

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चारण साहित्य का इतिहास – पांचवाँ अध्याय – मध्यकाल (द्वितीय उत्थान) – [Part-A]

मध्यकाल (द्वितीय उत्थान) (सन् १६५०-१८०० ई.) (१) – काल-विभाजन मध्यकाल (प्रथम उत्थान) से आगे चलकर हम एक ऐसे युग में प्रवेश करते है जो इतिहास में मुगल-साम्राज्य का ‘पतन-काल’ कहा जाता है हिन्दी-साहित्य के लेखक जिसे रीति-काल (१६४३-१८४३ ई.) कहते हैं, डॅा. मेनारिया उसे राजस्थानी साहित्य के उत्तरकाल की संज्ञा देते हैं। यह काल सम्राट् औरंगजेब के सिंहासनारूढ़ होने के समय से (१६५८ ई.) सम्राट् शाहआलम तक (१८०३ ई.) अंग्रेजों के दिल्ली पर अधिकार करने तक प्रवाहमान होता है। चारण-काव्य की दृष्टि से यह युग पृथक महत्व रखता है क्योंकि परिवर्तित राजनैतिक, सामाजिक, धार्मिक एवं साहित्यिक परिस्थितियों से प्रभावित होकर […]

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चारण साहित्य का इतिहास – चौथा अध्याय – मध्यकाल (प्रथम उत्थान) – [Part-B]

(ख) आलोचना खण्ड : पद्य साहित्य १. प्रशंसात्मक काव्य: इस युग का प्रशंसात्मक काव्य दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। प्रथम, जिसमें आश्रयदाता की वीरता, दानशीलता, कृतज्ञता, तेजस्विता एवं कला-प्रियता का प्रकाशन किया गया है और द्वितीय, जिसे किसी विशेष उद्देश्य की पूर्ति के लिए लिखा गया है। प्रथम प्रकार के कवियों ने संसार में जितने भी विरुद हैं, उनसे अपने चरितनायकों को अलंकृत करने का प्रयत्न किया है। यहां जीवन के उत्तम गुण एकत्रित हो गये हैं। कहीं-कहीं तो ये गुण ऐसे घुल-मिल गये हैं कि जिन्हें पृथक नहीं किया जा सकता। इन कवियों में अत्युक्ति भी […]

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