चारण साहित्य का इतिहास – आठवाँ अध्याय – चारण काव्य का नव चरण (उपसंहार) – [Part-A]
चारण साहित्य का इतिहास – भाग २ चारण-काव्य का नवचरण (उपसंहार) [सन १९५० – १९७५ई.] (१) सिंहावलोकन पिछले अध्यायों में राजस्थानी के चारण साहित्य का क्रमबद्ध विवेचन प्रस्तुत किया गया है। इस अनुशीलन से स्पष्ट है कि यह साहित्य अत्यंत विशद, गहन. एवं समृद्ध है। प्राचीन काल में इसका बीजारोपण हुआ। मध्य काल के प्रतिभा-सम्पन्न कवियों एवं लेखकों ने इसे सींचकर पल्लवित एवं पुष्पित बनाया। आधुनिक काल में यह एक विशाल वृक्ष के रूप में परिणित होकर दूर-दूर तक अपना सौरभ बिखेरने लगा। इस प्रकार प्राचीन काल से लेकर अर्वाचीन काल तक चारण काव्य परम्परा अक्षुण्ण रूप से चली आ […]
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