वर्षा ऋतू वर्णन – कवि श्री दुला भाया “काग”

।।छंद – सारसी।।
आषाढ घमघम धरा धमधम, वरळ चमचम वीजळी,
जीय वरळ चमचम वीजळी।।

गडहडिय सज दळ, आभा वळकळ, मंद प्रबळा मलकती,
दीपती खड खड, हसी नवढा, श्याम घुंघट छुपती;
अबळा अकेली, करत केली, व्योम वेली लळवळी,
आषाढ घमघम धरा धमधम, वरळ चमचम वीजळी,.
जीय वरळ चमचम वीजळी।।१[…]

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कवि जालण सी – दूलेराय काराणी (अनुवाद: ठा. नाहर सिंह जसोल)

कच्छ के महारावदेसलजी की बहिन विजयवंतीबा का ब्याह ईडर के राव कल्याणमल के साथ हुआ। राव कल्याणमल न्यायप्रिय शासक, साहित्य पे्रमी,विद्वानों के गुण ग्राहक, कवियों के अश्रयदाता और स्वयं एक अच्छे कवि। उनकी ख्याति सुनकर अनेक कविजन, विद्वान उनके दरबार में आते, काव्य पाठ करते, साहित्य चर्चा करते और मान-सम्मान के साथ विदा होते।
सभी गुणों से परिपूर्ण होते हुए भी उन्होंने एक सुथारण महिला को अपनी रखैल रखकर अपने ऊपर एक काला धब्बा लगा लिया। उससे वे इतने रीझ गये कि ब्याहता पत्नि कच्छ की राजकुमारी विजयवंतीबा को भी भूल गये। राज्य के अनेक कामों में उस सुथारण का हस्तक्षेप होने लगा।[…]

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भक्तकवि महात्मा नरहरिदास बारहट

भक्त कवि श्री नरहरिदासजी बारहट महान पिता के महान पुत्र थे। इनके पिता लखाजी बारहट भी अपने समय के प्रसिद्ध कवि एवं विद्वान् थे जिन्हें मुगल सम्राट अकबर ने बहुत मान दिया। जोधपुर के महाराजा सूरसिंह जी के ये प्रीतिपात्र थे। लखाजी के दो पुत्र थे। ज्येष्ठ गिरधरदासजी एवं कनिष्ठ नरहरिदासजी। इनका जन्म १५९१ ई. में राजस्थान के नागौर जिले के मेड़ता उपखंड में स्थित टहला ग्राम में हुआ। नरहरिदासजी बाल्यावस्था से ही बड़े होनहार एवं तेजस्वी थे। प्रारम्भ से ही नरहरिदासजी को अपने पूर्व के संस्कारों के कारण, भगवान की कथाओं और पौराणिक शास्त्रों में बहुत रूचि थी। वे […]

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जोग माया रो गीत सपाखरु – कविराज लांगीदास जी

देवी झंगरेची, वन्नरेची, जळेची, थळेची देवी;
मढेची, गढेची देवी पादरेची माय।
कोठेची वडेची देवी सेवगाँ सहाय करे,
रवेची चाळक्कनेची डूँगरेची राय।।1[…]

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गीत घोड़ी री तारीफ रो – महादानजी महडू

।।गीत सपाखरु।।
दिनां थोड़ी चौड़ी उरां घोड़ी वेग बधै दौड़ी,
तोड़ी फेट लागां गढां कोड़ी मोल तेण।
मोटोड़ी चसम्मा साळग्राम जेड़ी गजां मोड़ी,
भाणवा आछोड़ी घोड़ी बरीसी भीमेण।।1।।[…]

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प्रतापसिंह बारहठ प्रशस्ति – ठा. उम्मेदसिंह जी धोल़ी “ऊम”

अमर कविराज आपही, भारत अम्मर भाल।
अमर आप चेतावणी, अमर राण फतमाल।।1।।

अंगरेजां सु डरियो नह, शुत्रुवां रो उरसाल।
भारत मा रो लाडलो, खरवा रो गोपाल।।2।।

जोड़ बारठ राव जबर, भारत अजादि धार।
संगठन बण्यो सूरमा, भारत रा जूंझार।।3।।

कर्जन दल्ली दरबार हि, अंगरेजां री शान।
भूप उदेपर ढाबतां, मिटेज यां रो मान।।4।।

रांण उदेपर रामजी, जांणे बंशज हांन।
भेळा दरबार न मिले, (तो) फिकि अंगरेजां शान।।5।।[…]

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शहीद कुंवर प्रताप सिंह जी माथै गीत चित इलोल़ – कवि वीरेन्द्र लखावत

।।गीत – चित इलोल़।।
केहरी सुत परताप किनां, जंग जबरा जा’र।
विख्यात हुयगो वीर वसुधा, शा’पुरौ सिरदार।।
(तो)बलिहार जी बलिहार जावै हिन्द औ बलिहार।।1।।

अखरियौ वौ जुल़स अलबत, रपटतौ कर रोल़।
प्रण लियौ परताप फैंकण, बम्ब बढ़ चढ़ मोल।।
(तो)टंटोल़ जी टंटोल़ ठायी बैंक वौ टंटोल़।।2।।[…]

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काश हम भी प्रताप बने होते – “रुचिर”

मुझसे उसने पूछा होता,
मैं मस्तक पर तिलक लगाती।
घोड़ी पर बिठलाकर उसका,
चुम्बन लेती विदा कराती।
पर वह स्वतन्त्रता का राही माँ से चुप चुप चला गया।
बिन पूछे ही चला गया।।[…]

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जनकवि उमरदान जी लाळस – जीवन परिचय

जनकवि ऊमरदान का नाम राजस्थानी साहित्याकाश में एक ज्योतिर्मय नक्षत्र की भांति देदीप्यमान है। उनके व्यक्तित्व और कृतित्व की पृथक पहचान है। पाखण्ड-खंडन, नशा निवारण, राष्ट्र-गौरव एवं जन-जागरण का उद्घोष ही इस कवि का प्रमुख लक्ष्य था। इसकी रचनाओं में सामाजिक व्यंग की प्रधानता के साथ ही साहित्यिकता, ऐतिहासिकता एवं आध्यात्मिकता की त्रिवेणी सामान रूप से प्रवाहमान है। मरू-प्रदेश की प्राकृतिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक छवियों के चितांकन में यहाँ के लोक-जीवन की आत्मा की अनुगूंज सुनाई देती है। डिंगल एवं पिंगल के विविध छंदों की अलंकृत छटा, चित्रात्मक शैली और नूतन भावाभिव्यंजना सहज ही पाठक का मन मोह लेती है।[…]

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