चारन की बानी – डूंगरदानजी आसिया

स्वर्ण की डरीसी शुद्ध साँचे में ढरीसी मानो,
इन्द्र की परीसी एही सुन्दर सयानी है।
विद्या में वरीसी सरस्वती सहचरी सी,
महाकाशी नगरीसी सो तो प्रौढ औ पुरानी है।
जीवन जरीसी वेद रिचाऐं सरीसी गूढ
ग्यान गठरीसी अति हिय हरसानी है।
सांवन झरीसी मद पीये हू करीसी सुधा
भरी बद्दरी सी ऐसी चारन की बानी है।।१

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डिंगल़ वाणी में भगवती इंद्र बाई

माँ भगवती लीलाविहारिणी इन्द्रकुँवरी बाईसा का जन्म संवत १९६४ में हुआ था उनके भक्त कवि हिंगऴाजदानजी जागावत ने अवतरण की ऐक प्रसिध्द रचना चिरजा सृजित की है जिसमें विक्रम संवत १९६३ के आश्विन नवरात्रो में माँ हिंगऴाज के स्थान पर सभी देवियों की पार्षद भैरव सहित परिषद लगती है, उस परिषद में भैरव माँ को ज्ञापित करते हैं कि मरूधर देश में अवतार की आवश्कता है, भगवती हिंगऴाज अपनी अनुचरी आवड़ माँ को आदेश देकर सही स्थानादि बताकर मरूधरा में अवतार के लिए प्रेरित करती है व भगवती आवड़ अवतरित हो भक्तवत्सला बनती है अद्भूत कल्पना व शब्दों का संयोजन है रचना में यथाः…..

।।दोहा।।
सम्वत उन्नीसै त्रैसट्यां, साणिकपुर सामान।
शुक्ल पक्ष आसोज में, श्री हिंगऴाज सुथान।।

इसके ठीक नवमास बाद आषाढ शुक्ला नवमी को भगवती का अवतरण निर्दिष्ट स्थान पर हो जाने के बाद विभिन्न कवेसरों ने सहज सुन्दर व सरस सटीक वर्णन किया है यथा कुछ दृष्टान्त:[…]

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आईनाथ(तैमड़ै राय)री ओलग – कवि स्व. भँवरदान जी वीठू “मधुकर” (झणकली)

पग पग ओरण डग डग परचा, सब जग सुजस सुणावै हो।
आद भवानी मात आवड़ा, अवलु थारी आवै हो।
दैवी हैलो दै।।(1)

वेद विधाता शेंष सुरसती, गणपत किरत गावै हो।
भुचर खेचर बावन भेरू, थारो हुकम वजावै हो।
दैवी हैलो दै।।(2)

ऊंचो देवल धजा ऊधरी, हरदम होरां खावै हो।
घोर नगारों निर्मल घाटी, गगन घुरावै हो।
दैवी हैलो दै।।(3)[…]

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देशनोक-दर्शन – भलदान जी चारण

।।छप्पय।।
पोखर मथुरापुरी, सेत बंधण रामेसर।
कर बदरी केदार, अधिक आबू अचलेसर।
पापां गमण प्रयाग, गया गंगा गोमती।
मुकतिदेण सुरमात, सकल महिमा सुरसत्ती।
कुरूक्षेत्र नाथ कासी सकल,
जात घणा जुग जीविया।
करनला आप दरसण कियां,
कवि केता तीरथ किया।।[…]

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🌺शब्दालंकार सवैया – ब्रह्मानंद स्वामी🌺

या मगरी मग री तगरी, नगरी न गरी सगरी बगरी हे;
वाट परी डगरी डगरी, खगरी खगरी कगरी अगरी हे;
सीस भरी गगरी पगरी, पगरी घुघरी  उगरी भु गरी हे;
ब्रह्ममुनि द्रगरी दगरी, लगरी लगरी फगरी रगरी हे।।

में अटकी अटकी नटकी, चटकी चटकी मटकी फटकी हु;
घुंघटकी घटकी रटकी, लटकी लटकी तटकी कटकी हु;
ज्यों पटकी थटकी थटकी, खटकी खटकी हटकी हटकी हुं;
ब्रह्म लज्यो झटकी झटकी, वटकी वटकी जटकी जटकी हुं।।

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चारणों के गाँव – थेरासणा

ई.स.1755 में मेवाड की राजधानी उदयपुर की गद्दी पर महाराणा जगतसिंह जी विराजमान थे। उस समय उदयपुर के राजकवि ठा.सा. श्री गोपालसिंह जी सिंहढायच थे। उनका परिवार कुम्भलगढ के पास मण्डा नामक गाँव में रहता था (यह गाँव जोधपुर के राजा नाहरराव ने ठा.सा.श्री नरसिंह जी सिंहढायच को जागीर में दिया था) उस समय ईडर के राजा राव रणमल थे और ईडर के राजकवि श्री सांयोजी झुला थे। वो ईडर से उत्तर दिशा मे श्री भवनाथ जी के मंदिर के पास कुवावा नामक गाँव है में रहते थे। सांयोजी बहुत बडे संत और कृष्ण भक्त थे। इनके बृज की यात्रा के लिए निकलने की बात ईडर के राव रणमल जी को पता लगी तो वे भी उनको मिलने हेतु उनके पीछे यात्रा पे निकल पड़े। […]

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छप्पय आशापुरा माताजी रा – भारमलजी रतनू “घडोई”

।।छंद-छप्पय।।
तुं माता तुं पिता, तुंहिज बंधव तुं बाइ।
तुं साजण तुं शेण, साथ पण तुंज सदाइ।
तुं उत्तम आधार, वाट ओ घाट वहंते।
देवी तुं दिवाण, कवित गुण गीत कहंते।
सही थोक दिये तुंही सदा, कर जोडे तुनां कहां।
माहरा देव परदेश मां, मन डर मत आधार मां।।1[…]

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बोलत नाह ऊचारत फूं फूं – कविराजा बांकीदास आसिया

यह काव्य महलों में एक महारानी जी सें सम्बन्धित है। एक राणी जी अपनै पति कै दर्शन करके ही दंत मंजन करती थीं। उन्होंने हमेशा की तरह अपने पति के जागने का इतजार करतै हुए अपनी नज़रों को पति के मुख पर केन्द्रित करते हुए दासी सें दंत मंजन का कटोरा मांगा। उस दिन दासी नयी थी सो उसनै भूल सै चूनै से भरा कटोरा आगे कर दिया। राणी जी नै चूना लेकर मुह में बिना देखै डाल दिया जिससे मुह में अत्यधिक जलन होनै लगी जिस कारण वो बार-बार मुह में पानी डाल कर गरारै करने लगी। जब यह यह द्रश्य राजा साहब नै दैखा तब उन्होंने एक काव्य की पंक्ति बोली। “बोलत नाह ऊचारत फूं फूं। “ इस काव्य को कवि बांकीदास नै बनाया था। ओर राजा मान सिंह ने इसका उच्चारण किया था।[…]

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भरतपुर अंग्रेज संग्राम और कविराजा बांकीदासजी आसिया – राजेन्द्रसिंह कविया

कविराजा बांकीदासजी आसिया पहले राष्ट्रीय भावना के प्रबल पक्षधर व स्वदेशप्रेम भावना से ओत-प्रोत कवि थे। कविराज नें डिंगऴ काव्य में अंग्रेजी शासनके खिलाफ बिगुल बजा दिया तथा तात्कालीन राजन्यवर्ग को रजपूती (वीरत्व) रखने के लिए निम्न प्रकार से प्रेरित किया:-

।।दोहा।।
महि जातां चींचाता महऴां, ऐ दुय मरण तणां अवसाण।
राखौ रे कैंहिक रजपूती, मरद हिन्दू की मुसऴमान।।

पुर जोधांण उदैपुर जैपुर, पह थारा खूटा परियांण।
आंकै गई आवसी आंकै, बांकै आसल किया बखांण।।[…]

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मेहाई-महिमा – हिगऴाजदान जी कविया

।।आर्य्या छन्द।।
पुरूष प्रराण प्रकती, पार न पावंत शेष गणपती।
श्रीकरनी जयति सकत्ती, गिरा गो अतीत तो गत्ती।।1।।

।।छप्पय छन्द।।
ओऊंकार अपार, पार जिणरो कुण पावै।
आदि मध्य अवसाण, थकां पिंडा नंह थावै।
निरालम्ब निरलेप, जगतगुरू अन्तरजामी।
रूप रेख बिण राम, नाम जिणरो घणनामी।
सच्चिदानन्द व्यापक सरब,
इच्छा तिण में ऊपजै।
जगदम्ब सकति त्रिसकति जिका,
ब्रह्म प्रकृति माया बजै।।2।।[…]

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