भरतपुर अंग्रेज संग्राम और कविराजा बांकीदासजी आसिया – राजेन्द्रसिंह कविया

कविराजा बांकीदासजी आसिया पहले राष्ट्रीय भावना के प्रबल पक्षधर व स्वदेशप्रेम भावना से ओत-प्रोत कवि थे। कविराज नें डिंगऴ काव्य में अंग्रेजी शासनके खिलाफ बिगुल बजा दिया तथा तात्कालीन राजन्यवर्ग को रजपूती (वीरत्व) रखने के लिए निम्न प्रकार से प्रेरित किया:-

।।दोहा।।
महि जातां चींचाता महऴां, ऐ दुय मरण तणां अवसाण।
राखौ रे कैंहिक रजपूती, मरद हिन्दू की मुसऴमान।।

पुर जोधांण उदैपुर जैपुर, पह थारा खूटा परियांण।
आंकै गई आवसी आंकै, बांकै आसल किया बखांण।।[…]

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मेहाई-महिमा – हिगऴाजदान जी कविया

।।आर्य्या छन्द।।
पुरूष प्रराण प्रकती, पार न पावंत शेष गणपती।
श्रीकरनी जयति सकत्ती, गिरा गो अतीत तो गत्ती।।1।।

।।छप्पय छन्द।।
ओऊंकार अपार, पार जिणरो कुण पावै।
आदि मध्य अवसाण, थकां पिंडा नंह थावै।
निरालम्ब निरलेप, जगतगुरू अन्तरजामी।
रूप रेख बिण राम, नाम जिणरो घणनामी।
सच्चिदानन्द व्यापक सरब,
इच्छा तिण में ऊपजै।
जगदम्ब सकति त्रिसकति जिका,
ब्रह्म प्रकृति माया बजै।।2।।[…]

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क्रांतिकारी कुँ. प्रताप सिंह बारहठ – उम्मेद सिंह देवल

चलतो रथ रवि रोकियो, पवन थामियो साँस।
कह जननी सूरो जन्यो कह सुर धरा प्रकाश।।
तन-मन दोन्यू ऊजला, सिर केसरिया पाग।
हरियाली हिरदै बसी कुँवर तिरंगों राग।।
~~स्वरचित

वीर प्रसूता गौरवमयी मेवाड़ की मॉंटी के उदयपुर में ज्येष्ठ शुक्ला ९ वि. सं. १९५० दिनांक 24 मई 1893 को स्वनाम धन्य वीरवर ठाकुर केसरी सिंह बारहठ की धर्म-पत्नी यथा नाम तथा गुणा माणिक कँवर की कोख से एक पुत्र-रत्न ने जन्म लिया। ”होनहार बिरवान के होत चीकने पात ”-पिता की पारखी नज़रों ने बालक के शुभ शारीरिक लक्षणों से तत्काल ही पहचान लिया कि कुल कीर्ति में वृद्धि करने वाला यह वीर विलक्षण प्रतिभा का धनी है, उसके प्रबल पराक्रम को पहचान पुत्र का नाम रखा-प्रताप। प्रताप का जन्म पिता की ओजस्विता, माता की धीरता एवं स्वयं की वीरता का अद्भुत् त्रिवेणी संगम था।[…]

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भूरजी बलजी के कवित्त – महाकवि हिंगऴाजदान जी कविया

चढ्यो जोधपुर तैं रसाला बीर चाला चहि,
तालन में चालत चंदोल जल तुच्छ पै।
चित्त में घमंड ब्रह्मंड लखैं चकरी सो,
अकरी अदा ते आये सेखाधर स्वुच्छ पै।
पोते राव वीर बनरावन पै दिट्ठि परी,
परी दिट्ठ हूरन की फूलन के गुच्छ पै।
डाकी डाकुवन कूं बकारे किधौं डारे कर,
बाघन के मुच्छ, पांव नागन के पुच्छ पै।।1।।[…]

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प्रसिध्द ऐतिहासिक चिरजा – कवि हिंगऴाजदान जी जगावत

।।दोहा।।
मंयकअंक पख मांगसिर, सिध्दियोग शनिवार।
कृष्ण पक्ष की चौथ कौ, ले देव्यां घण लार।।

।।चिरजा।।
जंग नृप जैत जिताबा, लागी असवारी लोवड़ वाऴ री।।टेर।।

शोभित आप शक्ति संग केती,
(अरू) जो जोगण जगमांय।
आसव लेण बेर हिय आंरै,
ना कारो मुख नांय।।1।।[…]

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करणी माता रा छप्पय – कविराजा बांकीदास आसिया

।।छप्पय।।
सुक्रम रुपां शुध्ध, तत्व रुपां जग तारण।
सद रुपां साख्यात, मोद रुपां दुःख मारण।
विद रुपां चंडीका विस्व रुपां जग वंदत।
निगम सरुपां नित्त, ईश सेवक आणंदत।
सोहत त्रगुण रुपां सदा, जय रुपां खळ जारणी।
ईश्वरी शिवा रुपां अकळ, करणी मंगळ कारणी।।1।।[…]

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श्री चाळकनेची रे रास रमण रा छप्पय – कवि कृपाराम जी खिडीया

।।छंद आर्या।।
मद मदिरा रस मत्ती, अत्ती आपाण अंक अहरती।
करत विलास सकत्ती, चाळराय मंढ चाळकना।।1।।

।।छप्पय।।
बन समाज अति विपुल, सदा रितुराज छ रित सुख।
लता गुल्म तरु तरल, माल मिलि मुखर सिलीमुख।
सुरभि धनष गव शशक, सूर चीता पंचाणण।
एण विविध मृग रवण, भवण भावण भिल्ली गण।
निश्वास निकुर निर्दलणियत, तै आधौ फर बेत तळ।
चाळ्ळकराय अदभूत रमै, थटि नाटक मनरंगथळ।।1।।[…]

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करणी माता रा त्रिभंगी छंद – कवि डुंगर दानजी आशिया (बाळाउ)

।।छंद – त्रिभंगी।।
जय जय जग जरणी भव भय हरणी खळ दळ दरणी खग धरणी।
भू जळ खेचरणी पय निझरणी शंकर घरणी चख अरणी।
सेवक कज सरणी किरपा करणी मात प्रसरणी भुज लंबा।
तारण भव तरणी वेदां वरणी जय जग जरणी जगदंबा।
जिय जय मां करणी जगदंबा।।1।।[…]

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सालगिरह शतक – महाकवि हिंगऴाजदान जी कविया

।।गीत – झमाऴ।।

[१]
करत निरंतर निकट कट, झंकारव अलि झुंड।
विधु ललाट बारण बदन, सिंदूरारूण सुंड।।
सिंदूरारूण सुंड, धजर बिख-धारणै।
हद उजवल रद हेक, बदन रै बारणै।।
कर-मोदक करनल्ल, जनम जस गाणनूं।
जग जाहर घण जाण, नमो गणराज नूं।।

भावार्थ: जिनकी कनपटी के पास लगातार भौंरों के झुंड झंकार की ध्वनि करते रहते हैं, जिनके ललाट पर चंद्रमा है, हाथी के मुंह वाले जिनकी सूंड सिंदुरी रंग की है। सूंड सांप के फ़न की भांति शोभायमान है, जिनका एक ही दांत, जो मुँह के द्‌वार पर है, बहुत उजवल हैं। जिनके हाथ में लड्‌डू है। उन जगत-विख्‌यात व बहुविज्ञ गणनायक गणेश जी को मैं करनीजी के जन्मोत्सव का यशगान करने के लिये नमस्कार करता हूँ।[…]

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जोगीदास भाटी की कटारी

…..इनके पुत्र जोगीदास भाटी बड़े वीर पुरुष हुए थे और महाराजा के बड़े विश्वस्त रहे थे तथा साहस में अपने पिता से भी बढकर हुऐ थे। वि.सं.१६६८ में बादशाह जहाँगीर की फौजे दक्षिण भारत की और कूच कर रही थी, जिसमें सभी रियासतों की सेनाएं भी शामिल थी। आगरा से दक्षिण में एक जगह पड़ाव में एक विचित्र घटना घटी। आमेर के राजा मानसिंह के एक उमराव का हाथी मदोन्मत हो गया और संयोग से जोगीदास भाटी का उधर से घोड़े पर बैठकर निकलना हो गया। उस मतगयंद ने आव देखा न ताव लपक कर जोगीदास को अपनी सूंड में लपेटकर घोड़े की पीठ से उठाकर नीचे पटका और अपने दो दांतों को जोगीदास की देह में पिरोकर उपर की तरफ उठा लिया।
“जोगीदास भाटी नें हाथी के दांतों में बिंधे और पिरोये हुये शरीर से भी अपनी कटारी को निकालकर तीन प्रहार कर उस मदांध हाथी का कुंभस्थल विदीर्ण कर डाला” […]

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