पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – द्वितीय मयूख

द्वितीय मयूख छंद प्रकरण दोहा ना गायो जग-मीत कौं, साहित जुत संगीत। श्रूपदास जिनके न द्वै, पूंछ रु स्रंग पुनीत।।१।। जगत-बंधु (जगत का भला करने वाले) भगवान का साहित्य एवं संगीत युक्त जिसने गुणगान नहीं किया, उनके लिए कवि स्वरूपदास कहता है कि ऐसे मनुष्य, बिना पूंछ और स्रंग के नर-पशु हैं। ऐसे लोगों से तो पूंछधारी प्राणी उत्तम हैं (यह पुनीत शब्द कहने का अभिप्राय है) छंद अलंकृत रसन को, करौं सूचिका पत्र। बहु व्यापक सामान्य पख, आदिहि वर्नन अत्र।।२।। कवि कहता है कि मैं छंद, और रसों का मात्र सूचीपत्र रच रहा हूँ। कारण कि छंद-अलंकारादि अन्य ग्रंथों […]

» Read more

पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – प्रथम मयूख

प्रथम मयूख मंगलाचरण छंद – अनुष्टुप् गुणालंकारिणो वीरौ, धनुष्तोत्र विधारिणौ। भू भार हारिणौ वन्दे, नर नारायणो उभौ।।१।। उत्तम गुणों से विभूषित, धनुष एवं चाबुक को धारण करने वाले तथा पृथ्वी के भार को हरने वाले, नर-नारायण इन दोनों वीरों (अर्जुन एवं कृष्ण) का मैं वन्दन करता हूँ। दोहा ध्यान-कीरतन-वंदना, त्रिविध मंगलाचर्न। प्रथम अनुष्टुप बीच सो, भये त्रिधा शुभ कर्न।।२।। ध्यान, कीर्तन एवं वन्दना ये तीन प्रकार के मंगलाचरण हैं। प्रथम अनुष्टुप छंद में मंगल करने वालों का तीनों प्रकार से मंगलाचरण किया गया है-यथा त्रिविध पृथक्करण :- १. धनुष्तोत्र धारण करने वाले रूप-स्वरूप का वर्णन अर्थात् ‘ध्यान’ पूर्वक मंगलचरण है। […]

» Read more

पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – स्वामी स्वरुपदास

मंगलाचरण

छंद – अनुष्टुप्
गुणालंकारिणो वीरौ, धनुष्तोत्र विधारिणौ।
भू भार हारिणौ वन्दे, नर नारायणो उभौ।।१।।
दोहा
ध्यान-कीरतन-वंदना, त्रिविध मंगलाचर्न।
प्रथम अनुष्टुप बीच सो, भये त्रिधा शुभ कर्न।।२।।
नमो अनंत ब्रह्मांड के, सुर भूपति के भूप।
पांडव यशेंदु चंद्रिका, बरनत दास स्वरूप।।३।।[…]

» Read more

पुस्तक विमोचन, उत्कृष्ट सेवा एव साहित्य सम्मान समारोह

श्री केसरीसिह बारहठ चारण सेवा संस्थान के तत्वावधान में 31 अगस्त 2017 को मिनी ऑडिटोरियम सूचना केन्द्र जोधपुर में कवि गिरधर दान रतनू “दासोड़ी” लिखित पुस्तक “ढऴगी रातां ! बहगी बातां !” तथा जनकवि श्री वृजलाल जी कविया द्वारा रचित पुस्तक “विजय विनोद” के विमोचन का भव्य आयोजन हुआ। मंच पर अध्यक्ष के रूप में तकनीकी वि.वि. कोटा के डीन डॉ हाकमदानजी चारण, मुख्य अतिथि उच्च न्यायालय के न्यायाधिपति पुष्पेन्द्र सिंहजी भाटी, विशिष्ट अतिथि राजर्षि ठाकर नाहरसिंह जी जसोल, डिंगल़ के शिखर पुरुष श्रद्धेय डॉ शक्तिदानजी कविया, इतिहासज्ञ प्रो जहूर खां मेहर, डिंगल के दिग्गज कवि डूंगरदानजी आशिया, समालोचक व राजस्थानी के लोकप्रिय श्रेष्ठ कवि डॉ आईदानसिंह जी भाटी, लोकसाहित्य के मर्मज्ञ विद्वान डॉ सोहनदानजी चारण, राजस्थानी भाषा आंदोलन के पुरोधा लक्ष्मण दानजी कविया एवं डूंगर मा.वि.बीकानेर की राजस्थानी विभागाध्यक्ष डॉ प्रकाश अमरावत आसीन थे।[…]

» Read more

खोडियार माताजी री स्तुति – हेमुजी चारण

।।छंद – नाराच।।
प्रवाळ नंग धाम पें, बणे सु गोख छब्बियं।
जळे सु जोत है ऊधोत, कोटीरुप से कियं।
अरक्कजा सुधा अगे, चडे सिंदुर चाचरी।
नमो सगत्त नित, नृत्त खोडली रमे खरी।।1।।[…]

» Read more

आधशगति उमिया माताजी री स्तुति – कवि मुळदानजी तेजमालजी रोहडिया (जामथडा कच्छ)

।।छंद – सारसी।।
तुंही रुद्राणी, व्रहमाणी, विश्व जाणी, वज्जरा।
चाळळकनेची, तुं रवेची, डुँगरेची, छप्परा।
विशां भुजाळी, वक्र वाळी, त्रिशूळाळी त्रम्मया।
वेदां वदंती, सारसत्ती, आध शगति उमिया।।1[…]

» Read more

पीठवा चारण और जैतमाल राठौड़

।।दोहा।।
पावन हूवौ न पीठवौ, न्हाय त्रिवेणी नीर।
हेक जैत मिऴियां हूवौ, सो निकऴंक सरीर।।

पीठवा चारण कुष्ठ रोग से पीड़ित हो गया। इस कुष्ठ रोग से बहुत ही दुःखित होकर उससे छुटकारा पाने के लिए कितने ही तीर्थादि कर आया परन्तु उसका रोग नही गया। ज्यों ज्यों दवा की, मर्ज बढता ही गया। उसने सुना कि रावल मल्लीनाथ का छोटा भाई सिवाणां का राजा जैतमाल जो कि भगवान का बड़ा भक्त था उसके स्पर्श से कोढ रौग दूर हो सकता है।[…]

» Read more

महात्मा सिध्द अलूनाथजी द्वारा प्रसिद्ध त्यागमूर्ति बाबा गणेशदासजी गूदड़ी वालों को दृष्टि-दान !!

त्यागमूर्ति श्री गणेशदास जी विक्रमी संवत १९३३ फाल्गुन शुक्ला पंचमी को जयपुर में ब्रह्मलीन हो गए थे। इन्हे अपने निर्वाण से ऐक दशक पहले नेत्र व्याधि होकर दृष्टि सम्पुर्णतः बंद हो गई थी तथा संसार असार हो गया था। इन्है अल्लूनाथजी का इष्ट था तथा वे कभी कभार जसराणा उनकी समाधि पर भी जाया करते थे। एक बार अकस्मात वे अल्लूजी को याद करने लगे और येन केन जसराणा समाधि पर पहुंच कर भाव विभोर होकर अरदास करने लगे।[…]

» Read more

रूपग गोगादेजी रो – आढा पहाड़ खान

।।छंद – मोतीदाम।।
वडवार उदार संसार वषाण।
जोधार जूंझार दातार सुजाण।
दला थंभ वीरम तेज दराज।
साजै दिन राजै ऐ सूर समाज।।[…]

» Read more

सिध्द सन्त महात्मा ईसरदासजी

अमरेली के बजाजी सरवैया के कुंवर करणजी सरवैया के विवाह के दौरान सर्पदंश से हुई असामयिक मौत पर उनके घर से अर्थी उठाकर शमशान भूमि यात्रा पर जाते समय रास्ते में विवाह समारोह में शामिल होने के लिए आते हुए महात्मा ईसरदासजी मिले। यह अणचींती बात सुनकर उनको बहुत ही आघात लगा और उन्होने अपने योग सिध्दी और तपस्याबल से कुंवर को पुनः जीवित करने का संकल्प कर अर्थी को जमीन पर रखवा कर हठयोग साधना द्वारा निम्नांकित गीत कहा:[…]

» Read more
1 30 31 32 33 34 56