पांडव यशेन्दु चन्द्रिका – द्वितीय मयूख
द्वितीय मयूख छंद प्रकरण दोहा ना गायो जग-मीत कौं, साहित जुत संगीत। श्रूपदास जिनके न द्वै, पूंछ रु स्रंग पुनीत।।१।। जगत-बंधु (जगत का भला करने वाले) भगवान का साहित्य एवं संगीत युक्त जिसने गुणगान नहीं किया, उनके लिए कवि स्वरूपदास कहता है कि ऐसे मनुष्य, बिना पूंछ और स्रंग के नर-पशु हैं। ऐसे लोगों से तो पूंछधारी प्राणी उत्तम हैं (यह पुनीत शब्द कहने का अभिप्राय है) छंद अलंकृत रसन को, करौं सूचिका पत्र। बहु व्यापक सामान्य पख, आदिहि वर्नन अत्र।।२।। कवि कहता है कि मैं छंद, और रसों का मात्र सूचीपत्र रच रहा हूँ। कारण कि छंद-अलंकारादि अन्य ग्रंथों […]
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