चाळराय चाळकनेची रो डिंगळ गीत – कवि केसरदानजी खिडिया

॥गीत – प्रहास साणोर॥
चरै मां संदशा करै डसण विधि चोगणी,
खसण विध नोगणी धरै खूनां।
सोगणी खितारै धाक चढि आसुरां,
जोगणी चितारै वयण जूनां॥1॥

आज म्है आविया माढ पग अबरखे,
डबर कै छांडि पग मती डागो।
दीसहत खबर कै घणो जग देखसी,
बीसहथ जबर कै देखि बागौ॥2॥[…]

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गूदड़ी वाले बाबा गणेशदास जी !!

आज से लगभग अस्सी नब्बे वर्ष पहले एक महान संत जयपुर के आसपास विद्यमान थे, जो गूदड़ीवाले बाबा के नाम से जाने जाते थे। उनका नाम गणेशदासजी था। वह दादूपंथी महात्मा थे। उस समय में जयपुर के प्रसिध्द गणमान्य लोगौं में बाबा की बड़ी मान्यता व स्वीकार्यता थी, तथा बाबा भी बड़े त्यागी-तपस्वी मनीषी थे। उस समय के संस्कृत के उद्भट विद्वान पं.वीरेश्वरजी शास्त्री ने बाबा का स्तवन इस प्रकार किया था:

निर्द्वंन्द्वो निःस्पृहः शान्तो गणेशः साधुतल्लजः
सानन्दः सर्वदा कन्थाकौपीनामात्रसंग्रहः
अर्थातः बाबा गणेशदास कैसे है निर्द्वन्द्व अर्थात ब्रह्मैक्यभाव-प्राप्त, सुख दुःखादि रहित व किसी प्रकार की इच्छामुक्त, शान्त वृति के साधुजनो में परमश्रेष्ठ व ब्रह्मानन्द में मगन रहते हैं व मात्र[…]

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महाराणा प्रतापसिंहजी की वीरोचित उदारता! – राजेंद्रसिंह कविया संतोषपुरा सीकर

हल्दीघाटी रा समर होवण में ऐक दोय दिनां री ढील ही, दोनों ओर री सेनावां आपरा मौरचा ने कायम कर एक बीजा री जासूसी अर सैनिक तैयारियां री टौह लेवण ने ताखड़ा तोड़ रैयी ही। जंगी झूंझार जौधारां रो जोश फड़का खावण ने उतावऴो पड़रियो हो। राणाजी रा मोरचा तो भाखरां रै भीतर लागियोड़ा हा नै मानमहिप रा खुलै मैदानी भाग मे हा। लड़ाई होवणरै दो दिन पहली मानसिंहजी शिकार खेलण थोड़ाक सा सुभट साथै लैय पहाड़ां रै भीतरी भाग मे बड़ गिया। राणाजी रा सैनिक जायर राणाजी ने आ कही कि हुकुम इण हूं आछो अवसर कदैई नहीं मिऴेला अबार मानसिंहजी ने मारदेवां का कैद कय लेवां। इण बात पर राणाजी आपरी वीरता री उदारता दिखाय आपरा सुभटां ने पालर कैयो क आंपणै औ कायरता रो करतब नीं करणो है। आंपा धर्म रा रक्षक हां अर भगवानरा भगत हां जणैई आंपांरी बिजै हुवै है। महाराणाजी री ई उदारता रो बरणाव कवि केसरीसिंहजी सौदा रा मुख सूं।[…]

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बाई पद्मा अर वीर अमर सिंह

बीकानेर रा राजाजी रायसिंह जी रा भाई अमर सिंह जी हा उण बखत अकबर अर आमै खटपट व्हैगी ईण खातर अमरसिंह नै पकड़ण सारूं बादसा अकबर आरबखां नै अमरसिंह नै पकड़ लावा रो हुकम दीधो। अमरसिंह रा बड़ा भाई पिरथीराजी अकबर रै दरबार में हाँ। वां ओ हुकम सुण बादसा ने अरज कीधी।
“म्हारौ भाई अमरु हजरत रे वेमुख है जिण री तो उण ने सजा मिलणी चावै। पण वो यां रै हाथे हरगिज नीं आवैलां। ऐ पकड़वा वाळा मारिया जावेला। आ तावेदार री अरज, हजरत गांठ बांध लिरावै।”
अकबर बोल्यो “म्है ईणनै गिरफ्तार कर दिखाऊंला।”

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🌺श्रीदेवल माता सिंढायच🌺

देवल माता का जन्म पिंगलसी भाई ने सवंत १४४४ माघ सुद्धी चौदस के दिन बताया है। लेकिन वि सं 1418 में घडसीसर तालाब की नींव इन्होने दी थी जिसका शिलालेख वहां मौजूद है। ऐसा उल्लेख जैसलमेर की ख्यात व तवारीख में आता है। अत इस प्रकार इनका जन्म 14 वी शताब्दी में माघ सुदी चवदस के दिन होना सही लगता है। देवल माता हिंगलाज माताजी की सर्वकला युक्त अवतार थी। देवल माता ने भक्त भलियाजी और भूपतजी दोनों पर करुणा कर के एक के घर पुत्री और दुसरे के घर पुत्र वधु बनकर दोनों वंश उज्जवल किए। इनका जन्म माडवा […]

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गीत कोठारियां री अनीति रौ – जनकवि ऊमरदान लाळस

ऐक गीत उमरदानजी लाऴस री दबंगता दरसावतो, जिणमें तीन कोठारी बाणियां रा माजाया भाई, चारणां रा मुंदियाड़ ठिकाणा में घणी रापटरोऴ मचाय लूटणो शुरु करियो अर बठां रा ठाकुर साहब चैनसिंहजी बारहठ ने घणा दुखी करिया। सेवट आ बात उमर कवि कनै पूगी। कवि मारवाड़ रा तत्कालीन मुसाहब आला सर प्रताप रा खास मानिता हा, वै निडरता दिखावता थका बाणियां रो हूबोहूब गीत बणाय सर प्रतापसा ने खऴकायो अर कोठारियां री कामदारी ने खोस जेऴ में न्हाक मुंदियाड़ ने बचाई।

।।गीत – बड़ी सांणौर।।
पुत्र वणक त्रहुं भ्रात अन्याव रा पूतळा,
छिद्र कलकता तक न को छांनां।
जुलम री करी वातां जिके जणावूं
कळपतरु सुणीजे पता कांनां।।1।।[…]

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कलरव रा कमठाण

आछो नरपत, आसियो, चारण वरण चकार।
गाँव गाँव गुंजाय दी, डिंगल री डणकार।।1।।
आछो नरपत आसियों, खरो गुणों री खांण।
कव चारण घण कोडसू, विध विध करे बखाण।।2।।
घटाटोप नभ गरजणा, गांजे डिंगल गाज।
महि बोले कवि मोरिया, नरपत ऊपर नाज।।3।।
नपसा तो नाइस लिखे, ख्वाइश पूरे खूब।
साहित तणै समुद्रमें, दिलजावत हे डूब।।4।।
कोहीनूर नरपत कवि, वैतालिक विद्ववान।
जगमग हीरा जातरां, गिरधर अर गजदान।।5।[…]

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आशिया प्रभुदानजी भांडियावास !

आशिया प्रभसा रो जसौल ठिकाणै म सदा सनातनी सीर, रावऴसा व बाजीसा एक बीजा रा दुख सुख रा साथी, बाजीसा न देखियां बिना रावऴसा ने चैननंई मिऴै अर बाजीसा रो बीजी जागां मन नीं लागे।
एकर प्रभसा सियाऴा रा दिना आपरै घरै एक तगड़ो तियार हुयैड़ो खाजरु, संधीणा री सोच अर करियो अर आपरा कीं साथियां ने भी निमतिया, साथी वांरी कूंत हूं घणा पूगग्या, बीं मां सूं आधे सूं घणो तो रात ने ई जिमकायगा व बचियौड़ा ने एक ऊंची जागां टांक दियौ अर बै लोग निंशंक सोयग्या, रातै एक मिनड़ी आयर बचियौड़ा भाग ने खायगी, प्रभसा रै संधीणा री मनसा मन में ई रैयगी, भाई सैण पाड़ोसी तथा भायला बाजीसा ने संधीणा रा ताना देवण लागा।प्रभसा ईरा उपाय में जसोल रावऴसा कने एक गीत लिखर ऊंठ सवार रे साथै भेजियो।

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माटी थनै बोलणौ पड़सी – कवि रेवतदान चारण

मूंन राखियां मिनख मरैला।
धरती नेम तोड़णौ पड़सी।।
करणौ पड़सी न्याय छेड़लौ, माटी थनै बोलणौ पड़सी।

कुण धरती रौ अंदाता है, कुण धरती रौ धारणहार ?
कुण धरती रौ करता-धरता, कुध धरती रै ऊपर भार ?
किण रै हाथां खेत-खेत में, लीली खेती पाकै है ?
किण रै पांण देष री गाड़ी, अधबिच आती थाकै है ?
कहणौ पड़सी खरौ न खोटौ, सांचौ भेद खोलणी पड़सी।।
माटी थनै बोलणौ पड़सी।
मूंन राखियां मिनख मरैला।
धरती नेम तोड़णौ पड़सी।।[…]

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जांभा सुजस – कवि भंवरदान माडवा “मधुकर”

।।छंद – त्रिभँगी।।
जन मन जयकारा, धन तन धारा, अवन उचारा अवतारा।
पिंपासर प्यारा, दीन दुलारा, पुन प्रजारा, परमारा।
तपस्या तन तारा, भव पर भारा, भल भंयकारा भूप भया।
परगट परमेश्वर, जय जांभेशवर, निज अवधेश्वर रूप नया।।

नव विसी न्याती, धर्म धराती, वर्ण विनाती विख्याती।
जम्भ देव जमाती, कर्म कराती, मेहनत भाती मन थाती।
खिति पर धन ख्याती, परमल पाती, जबरी जाती सूंप जयो।
परगट परमेश्वर, जय जांभेश्वर, निज अवधेश्वर रूप नयो।।[…]

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